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बुधवार, 20 मई 2026

गौर ब्लॉक : जहाँ भ्रष्टाचार “स्वर्णाक्षरों” में लिखा जा रहा है

 गौर ब्लॉक : जहाँ भ्रष्टाचार “स्वर्णाक्षरों” में लिखा जा रहा है

वी के तिवारी, संवाददाता 


गौर ब्लॉक इन दिनों विकास नहीं, बल्कि कथित कमीशनखोरी और मनमानी कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है। आरोप यह हैं कि ब्लॉक क्षेत्र में इंटरलॉकिंग, खड़ंजा और अन्य विकास योजनाओं के नाम पर भुगतान की प्रक्रिया ऐसी बना दी गई है जिसमें बिना “प्रतिशत” दिए कोई कार्य आगे नहीं बढ़ता। स्थानीय चर्चाओं में यह तक कहा जाने लगा है कि यदि किसी ने कमीशन देने से इंकार किया, तो उसका भुगतान रोक देना यहाँ की “व्यवस्था” बन चुकी है।

क्षेत्रीय जनचर्चाओं में यह आरोप लगातार उभर रहा है कि एक ही ईंट-भट्ठे से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि अन्य गुणवत्ता वाले विकल्पों की अनदेखी हो रही है। विकास योजनाओं का उद्देश्य गाँवों को सुविधा देना होता है, परंतु यदि वही योजनाएँ कमीशन और दबाव की राजनीति का माध्यम बन जाएँ, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं।

कथित रूप से “25 प्रतिशत” और “10 प्रतिशत” जैसे शब्द अब ग्रामीणों के बीच विकास योजनाओं की तकनीकी भाषा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के प्रतीक बनते जा रहे हैं। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि यह सब केवल अफवाह नहीं बल्कि वास्तविकता है, तो क्या प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह मौन दर्शक बना रहेगा?

इट बहरा से सरदाहा शुक्ल तक लगभग 1500 मीटर सड़क निर्माण, मसही और सीट कोहर जैसे क्षेत्रों में हो रहे कार्यों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि विकास कार्यों में गुणवत्ता से अधिक “समीकरण” देखे जा रहे हैं। यदि यह स्थिति बनी रही, तो गौर ब्लॉक का नाम विकास मॉडल के रूप में नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा।

कभी ब्लॉक प्रमुखों की पहचान जनसेवा, पारदर्शिता और क्षेत्रीय विकास से होती थी। परंतु यदि जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के नाम पर कमीशन संस्कृति का आरोप चस्पा होने लगे, तो इतिहास उन्हें उपलब्धियों से नहीं, बल्कि आरोपों से याद करता है। यही कारण है कि आज क्षेत्र में लोग कटाक्ष करते हुए कह रहे हैं—

“बस्ती के ब्लॉक प्रमुखों में यदि भ्रष्टाचार का इतिहास लिखा जाएगा, तो गौर का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा।”

लोकतंत्र में सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब जनता विकास कार्यों को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगे। सड़कों की लंबाई, इंटरलॉकिंग की ईंटें और सरकारी भुगतान यदि जनविश्वास के बजाय भ्रष्टाचार की चर्चा का विषय बन जाएँ, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक पतन का संकेत है।

अब आवश्यकता केवल जांच की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है। क्योंकि विकास योजनाएँ किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं, जनता के टैक्स का धन हैं। और जनता यह जानना चाहती है कि उसके गाँव की सड़कें वास्तव में विकास की राह बन रही हैं या कमीशनखोरी की इबारत।

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