कुरुक्षेत्र से लोकतंत्र तक : गीता के छठे–सातवें श्लोक का समकालीन राष्ट्रीय चिंतन
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय केवल युद्ध का आरम्भ नहीं, बल्कि मनुष्य, सत्ता, संगठन और मानसिकता का शाश्वत दस्तावेज है। छठे और सातवें श्लोक में जो संवाद उपस्थित होता है, वह आज की राजनीति, सामाजिक संघर्ष, वैचारिक युद्ध और नेतृत्व के चरित्र को समझने की कुंजी बन जाता है।
श्लोक
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥
यहाँ दुर्योधन अपनी सेना और उसके महारथियों का परिचय देते हुए द्रोणाचार्य से संवाद करता है। सामान्य दृष्टि से यह केवल युद्ध-पूर्व परिचय है, किंतु गीता का प्रत्येक शब्द सत्ता की मनोवृत्ति का उद्घाटन करता है।शक्ति प्रदर्शन की राजनीति : तब भी, अब भी दुर्योधन जानता था कि युद्ध केवल शस्त्रों से नहीं, मनोबल से जीता जाता है। इसलिए वह बार-बार “महारथियों” की चर्चा करता है। यह वही मानसिकता है जो आज लोकतांत्रिक राजनीति में दिखाई देती है — जहाँ दल अपने प्रभावशाली नेताओं, जातीय समीकरणों, संसाधनों, मीडिया शक्ति और जनसमर्थन का प्रदर्शन करते हैं।
आज चुनावी सभाएँ, टीवी बहसें, सोशल मीडिया अभियानों और वैचारिक ध्रुवीकरण में वही दुर्योधन-मानस दिखाई देता है। प्रत्येक पक्ष अपने “विशिष्ट योद्धाओं” को सामने रखकर जनता को प्रभावित करना चाहता है। यह शक्ति का मनोवैज्ञानिक प्रदर्शन है। किन्तु गीता यहाँ एक गहरा संकेत देती है —जिस शक्ति को बार-बार सिद्ध करना पड़े, उसके भीतर कहीं न कहीं असुरक्षा अवश्य होती है।दुर्योधन की वाणी में आत्मविश्वास कम, भय अधिक छिपा था। क्योंकि वह जानता था कि धर्म उसके पक्ष में नहीं है।संगठन बनाम सत्य,आज के युग में भी संगठन अत्यंत महत्वपूर्ण है। राष्ट्र निर्माण बिना अनुशासित संगठन के संभव नहीं। परंतु गीता यह स्पष्ट करती है कि संगठन यदि केवल सत्ता प्राप्ति का साधन बन जाए और उसके भीतर नैतिकता, सेवा और राष्ट्रधर्म न रहे, तो उसका पतन निश्चित है।
दुर्योधन के पास विशाल सेना थी, भीष्म जैसे महायोद्धा थे, द्रोण जैसा गुरु था, कर्ण जैसा दानी और वीर था — फिर भी विजय नहीं मिली। क्यों?क्योंकि युद्ध केवल संख्या से नहीं जीता जाता, बल्कि सत्य की आंतरिक शक्ति से जीता जाता है।आज भी समाज में अनेक शक्तिशाली समूह, वैचारिक गिरोह और आर्थिक साम्राज्य दिखाई देते हैं, किंतु यदि उनका आधार केवल स्वार्थ और अहंकार है, तो वे टिकाऊ नहीं हो सकते।
आधुनिक समाज का “कुरुक्षेत्र”#आज भारत सहित सम्पूर्ण विश्व वैचारिक कुरुक्षेत्र में खड़ा है।एक ओर राष्ट्रचेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और सभ्यता की रक्षा का संघर्ष है; दूसरी ओर उपभोक्तावाद, विखंडनकारी विचार और स्वार्थ आधारित राजनीति का विस्तार।दुर्योधन की तरह आज भी अनेक शक्तियाँ समाज को केवल संख्या, प्रचार और प्रभाव से संचालित करना चाहती हैं। वे मानती हैं कि मीडिया, धन और भीड़ ही अंतिम सत्य हैं। किंतु गीता का संदेश स्पष्ट है—“धर्महीन शक्ति अंततः आत्मविनाश का कारण बनती है।” नेतृत्व का शाश्वत सूत्र है सातवें श्लोक में दुर्योधन अपने “नायकों” का परिचय देता है। यह बताता है कि किसी भी संघर्ष में नेतृत्व निर्णायक भूमिका निभाता है। समाज उसी दिशा में जाता है जिस दिशा में उसके नायक उसे ले जाते हैं।यदि नायक त्यागी हों तो राष्ट्र उन्नत होता है।यदि नायक स्वार्थी हों तो समाज विघटित होता है। आज भारत के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता केवल कुशल प्रशासकों की नहीं, बल्कि चरित्रवान नेतृत्व की है — ऐसा नेतृत्व जो सत्ता को साध्य नहीं, साधन माने।गीता का यही संदेश आज के युवाओं के लिए अत्यंत प्रासंगिक है कि जीवन का लक्ष्य केवल सफल होना नहीं, बल्कि सार्थक होना है।
अंतर्द्वंद्व की पहचान है #इन श्लोकों की सबसे गहरी व्याख्या मनोवैज्ञानिक है। दुर्योधन बाहर से जितना शक्तिशाली दिखता है, भीतर उतना ही अस्थिर है। यही हर उस व्यक्ति की स्थिति होती है जो सत्य से दूर होकर केवल बाहरी शक्ति पर भरोसा करता है।आज व्यक्ति भी अपने जीवन में यही करता है —पद, प्रतिष्ठा, सम्पत्ति और प्रभाव को अपनी शक्ति मान लेता है; किंतु भीतर शांति नहीं होती। गीता कहती है कि वास्तविक विजय बाहरी नहीं, आंतरिक होती है।
धर्म ही अंतिम शक्ति है#श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय हमें चेतावनी देता है कि समाज जब केवल शक्ति की भाषा समझने लगे और नैतिकता को दुर्बलता मानने लगे, तब विनाश निकट होता है।दुर्योधन के पास महारथी थे, पर धर्म नहीं था।अर्जुन के पास संशय था, पर श्रीकृष्ण थे।यही अंतर इतिहास बनाता है।आज के भारत और विश्व के लिए इन श्लोकों का संदेश स्पष्ट है—संगठन आवश्यक है, पर धर्म से जुड़ा हुआ।
नेतृत्व आवश्यक है, पर चरित्रयुक्त।शक्ति आवश्यक है, पर मर्यादित।विजय आवश्यक है, पर न्यायपूर्ण।कुरुक्षेत्र हर युग में बदलता है,पर धर्म और अधर्म का संघर्ष शाश्वत रहता है।
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