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मंगलवार, 19 मई 2026

“साइमन फारूकी : स्थानीय पत्रकारिता का मौन संत”

 


“साइम न फारूकी : स्थानीय पत्रकारिता का मौन संत”
















बस्ती
आज जब दुनिया चमकते चेहरों, बड़े मंचों और प्रचार की कृत्रिम रोशनी में उलझती जा रही है, तब भी समाज के भीतर कुछ ऐसे लोग जीवित हैं जो बिना किसी शोर के अपने कर्म को ही पूजा मानकर जीवन बिताते हैं।
ऐसे ही विरल व्यक्तित्व का नाम है  साइमन फारूकी। शहर की सुबह जब अभी पूरी तरह जागी भी नहीं होती, जब अधिकांश लोग नींद और सपनों के बीच होते हैं, तब साइमन फारूकी अपने दायित्व के साथ निकल पड़ते हैं।
हाथों में अखबारों के बंडल होते हैं, पर वास्तव में वे केवल कागज़ नहीं उठाते , वे समाज की चेतना, विचार और संवाद को घर-घर पहुँचाते हैं।
रेल से जेल तक, शहर  की गलियों तक, छोटे कार्यालयों से दूरस्थ ठिकानों तक — जहाँ कहीं स्थानीय समाचार पत्रों को पहुँचना होता है, वहाँ साइमन फारूकी का श्रम मौन रूप से उपस्थित दिखाई देता है।स्थानीय समाचार पत्रों के प्रकाशकों के लिए वे केवल वितरक नहीं, बल्कि जीवनरेखा की तरह हैं।
आज बड़े मीडिया घरानों की चर्चा बहुत होती है, परंतु स्थानीय पत्रकारिता की असली रीढ़ वे लोग हैं जो बिना नाम और सम्मान की अपेक्षा किए समाचारों को पाठकों तक पहुँचाते हैं। साइमन फारूकी उन्हीं गुमनाम प्रहरियों में से एक हैं।उन्होंने समाचार पत्र बाँटने के कार्य को कभी “रोज़गार” भर नहीं माना। उन्होंने इसे अपने सम्मान, अपने धर्म और अपने जीवन की सच्चाई बना लिया।
शायद यही कारण है कि आर्थिक संघर्षों, अभावों और कठिनाइयों के बावजूद उनके भीतर कभी शिकायत का शोर नहीं दिखता।
वर्षों पहले जब उन्होंने यह कार्य प्रारंभ किया था, तब भी परिस्थितियाँ सामान्य थीं।
आज जब उनकी आयु पचास और साठ के बीच पहुँच चुकी है, तब भी उनकी स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया।
समय बदल गया, तकनीक बदल गई, समाचार मोबाइल की स्क्रीन पर आने लगे, पर साइमन फारूकी का समर्पण नहीं बदला। यह समाज का विडंबनापूर्ण सत्य है कि जिन लोगों के कंधों पर व्यवस्थाएँ खड़ी होती हैं, अक्सर वही सबसे अधिक उपेक्षित रह जाते हैं।
स्थानीय पत्रकारिता को जीवित रखने वाले इस कर्मयोगी को भी शायद वैसा सहयोग कभी नहीं मिला, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। किन्तु उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अभाव ने उनके स्वभाव को कभी कठोर नहीं बनाया। उनकी सादगी आज भी वैसी ही है, जैसी वर्षों पहले थी।
उनके चेहरे पर संघर्ष की रेखाएँ अवश्य दिखाई देती हैं, परंतु मन में कटुता नहीं।
वे अपने धर्म के अनुसार अल्लाह को मानते हैं, परंतु समाज उन्हें केवल “साइमन” के नाम से जानता है।यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है ,इंसानियत।
हर वर्ष वे छोटे-छोटे आयोजन करते हैं।
न वहाँ भीड़ की चिंता होती है,न प्रचार की लालसा,न संख्या का अहंकार।यदि कुछ लोग आएँ तो भी वही सहज मुस्कान, और यदि सैकड़ों लोग आ जाएँ तो भी वही विनम्रता।
आज के प्रदर्शन प्रिय युग में यह सरलता किसी तपस्या से कम नहीं।
उनके आयोजनों में एक अद्भुत भारतीय आत्मा दिखाई देती है — सर्वधर्म समभाव।
वहाँ धर्म दीवार नहीं बनता, संबंध बनता है।
वहाँ व्यक्ति पहले इंसान होता है, बाद में किसी जाति या मजहब का। जब समाज छोटी-छोटी बातों पर बँटता दिखाई देता है, तब साइमन फारूकी जैसे लोग बिना भाषण दिए भारत की आत्मा को जीवित रखते हैं।
वे यह सिद्ध करते हैं कि भारत केवल संविधान से नहीं चलता; भारत उन लोगों के व्यवहार से जीवित रहता है जिनके भीतर मानवता अभी भी साँस ले रही है।
साइमन फारूकी को देखकर ऐसा लगता है मानो वे स्वयं एक चलता-फिरता संपादकीय हों ,शांत, संयमी, संघर्षशील और समाज को जोड़ने वाला।
उन्होंने कभी मंचों से बड़े विचार नहीं दिए, पर उनका जीवन स्वयं एक विचार है।
उन्होंने कभी सम्मान की माँग नहीं की, पर उनका कर्म स्वयं सम्मान का पात्र है।
उन्होंने कभी प्रसिद्धि नहीं चाही, पर उनकी सादगी उन्हें असाधारण बना देती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज ऐसे लोगों को केवल देखे नहीं, पहचाने भी।
क्योंकि सभ्यताएँ केवल बड़े नेताओं और बड़े भाषणों से जीवित नहीं रहतीं; वे उन साधारण लोगों के मौन त्याग से बची रहती हैं जो बिना चर्चा के अपना जीवन समाज को दे देते हैं।
सुबह जब किसी घर के दरवाजे पर स्थानीय समाचार पत्र पहुँचता है, तब उसके पीछे केवल वितरण व्यवस्था नहीं होती; वहाँ साइमन फारूकी जैसे कर्मयोगियों का अनुशासन, ईमानदारी और वर्षों का संघर्ष खड़ा होता है।और शायद यही कारण है कि साइमन फारूकी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि स्थानीय पत्रकारिता की धड़कनों को जीवित रखने वाला एक मौन संत प्रतीत होते हैं।
“कुछ लोग इतिहास में नाम लिखवाते हैं,
और कुछ लोग चुपचाप समाज की आत्मा को जीवित रखते हैं।
साइमन फारूकी उन्हीं विरल लोगों में से एक हैं।” 

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