“कुरुक्षेत्र से अंत्योदय तक : भारतीय राजनीति का सांस्कृतिक पथ” - कौटिल्य का भारत

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मंगलवार, 19 मई 2026

“कुरुक्षेत्र से अंत्योदय तक : भारतीय राजनीति का सांस्कृतिक पथ”

 “कुरुक्षेत्र से अंत्योदय तक : भारतीय राजनीति का सांस्कृतिक पथ”

कुरुक्षेत्र में खड़े पार्थ को मैं समझने निकला हूँ, घायल पड़े जटायु को मैं गोद उठाने निकला हूँ।

मैं निकला हूँ शबरी की कुटिया में दीप जलाने को, पत्थर पड़ी अहिल्या को मान-सम्मान दिलाने निकला हूँ।



 त्र्यंबक त्रिपाठी

भारत की राजनीति को यदि केवल सत्ता, चुनाव और रणनीति के चश्मे से देखा जाए, तो उसका वास्तविक स्वरूप कभी समझ में नहीं आएगा। भारत की राजनीति का गहरा संबंध उसकी सभ्यता, सांस्कृतिक स्मृति और समाज के अंतिम व्यक्ति से जुड़ा रहा है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी स्वयं को केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक वैचारिक-सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करती है। आज जब विश्व पहचान के संकट से जूझ रहा है, तब भारत अपनी जड़ों की ओर लौटने का प्रयास करता दिखाई देता है। यह लौटना केवल मंदिरों का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का पुनर्जागरण है। यही कारण है कि भारतीय राजनीति में राम, कृष्ण, शबरी, अहिल्या और जटायु जैसे प्रतीक केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि सामाजिक दर्शन के जीवंत सूत्र बनकर उभरते हैं।

कुरुक्षेत्र में खड़ा अर्जुन : आज का संशयग्रस्त भारत#भगवद गीता का अर्जुन केवल महाभारत का पात्र नहीं है; वह हर उस समाज का प्रतीक है जो सत्य जानते हुए भी निर्णय के द्वंद्व में खड़ा हो जाता है।आज का भारत भी अनेक प्रश्नों के बीच खड़ा है,आधुनिकता और परंपरा के बीच,विकास और संस्कृति के बीच,अधिकार और कर्तव्य के बीच। ऐसे समय में भारतीय जनता पार्टी स्वयं को उस वैचारिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है जो भारत को उसकी सभ्यतागत चेतना से जोड़ना चाहती है।राम मंदिर, काशी, महाकाल, केदारनाथ — ये केवल निर्माण परियोजनाएँ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति के पुनर्जागरण के प्रतीक हैं।यह राजनीति कहती है कि जिस राष्ट्र की स्मृति जीवित रहती है, वही राष्ट्र भविष्य का नेतृत्व करता है।जटायु : त्याग और राष्ट्रधर्म का प्रतीक#रामायण में जटायु एक वृद्ध पक्षी हैं, परंतु उनका संघर्ष बताता है कि राष्ट्र और नारी सम्मान की रक्षा में आयु नहीं, साहस मायने रखता है।भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में सैनिक सम्मान, राष्ट्र सुरक्षा और बलिदान की संस्कृति पर विशेष बल दिखाई देता है।यह केवल राष्ट्रवाद का राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस भारतीय भावभूमि का विस्तार है जहाँ त्याग को सर्वोच्च मान दिया गया।जटायु यह संदेश हैं कि कभी-कभी हारकर गिर जाने वाला भी इतिहास में विजेता बन जाता है, यदि उसका संघर्ष धर्म और राष्ट्र के लिए हो।शबरी की कुटिया : अंत्योदय का वास्तविक “कुरुक्षेत्र से अंत्योदय तक : भारतीय राजनीति का सांस्कृतिक पथ”

कुरुक्षेत्र में खड़ा अर्जुन : आज का संशयग्रस्त भारत#भगवद गीता का अर्जुन केवल महाभारत का पात्र नहीं है; वह हर उस समाज का प्रतीक है जो सत्य जानते हुए भी निर्णय के द्वंद्व में खड़ा हो जाता है।आज का भारत भी अनेक प्रश्नों के बीच खड़ा है—आधुनिकता और परंपरा के बीच,विकास और संस्कृति के बीच,अधिकार और कर्तव्य के बीच।ऐसे समय में भारतीय जनता पार्टी स्वयं को उस वैचारिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है जो भारत को उसकी सभ्यतागत चेतना से जोड़ना चाहती है।राम मंदिर, काशी, महाकाल, केदारनाथ — ये केवल निर्माण परियोजनाएँ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति के पुनर्जागरण के प्रतीक हैं।यह राजनीति कहती है कि जिस राष्ट्र की स्मृति जीवित रहती है, वही राष्ट्र भविष्य का नेतृत्व करता है।

जटायु : त्याग और राष्ट्रधर्म का प्रतीक#रामायाण में जटायु एक वृद्ध पक्षी हैं, परंतु उनका संघर्ष बताता है कि राष्ट्र और नारी सम्मान की रक्षा में आयु नहीं, साहस मायने रखता है।भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में सैनिक सम्मान, राष्ट्र सुरक्षा और बलिदान की संस्कृति पर विशेष बल दिखाई देता है।यह केवल राष्ट्रवाद का राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस भारतीय भावभूमि का विस्तार है जहाँ त्याग को सर्वोच्च मान दिया गया।जटायु यह संदेश हैं कि कभी-कभी हारकर गिर जाने वाला भी इतिहास में विजेता बन जाता है, यदि उसका संघर्ष धर्म और राष्ट्र के लिए हो।

शबरी की कुटिया : अंत्योदय का वास्तविक दर्शन#दीनदयाल उपाध्याय ने “अंत्योदय” का जो विचार दिया, वह भारतीय राजनीति में केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दर्शन है।समाज का अंतिम व्यक्ति — वही राष्ट्र की वास्तविक परीक्षा है।शबरी भारत के उस उपेक्षित समाज का प्रतीक हैं जिसे सदियों तक मुख्यधारा से दूर रखा गया।जब श्रीराम उनकी कुटिया में जाते हैं, तब भारतीय संस्कृति यह घोषणा करती है कि सम्मान जन्म से नहीं, भाव से मिलता है। प्रधानमंत्री आवास, उज्ज्वला, आयुष्मान, हर घर जल जैसी योजनाएँ इसी अंत्योदय दर्शन की राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं।यह राजनीति कहती है कि विकास तब तक अधूरा है, जब तक शबरी की झोपड़ी में दीपक न जले।

अहिल्या : नारी सम्मान का सांस्कृतिक पुनर्जागरण#अहिल्या केवल एक पौराणिक पात्र नहीं; वे उस नारी की प्रतीक हैं जिसे समाज ने परिस्थितियों के कारण उपेक्षित कर दिया।श्रीराम का उनका उद्धार करना केवल धार्मिक घटना नहीं, बल्कि नारी गरिमा की पुनर्प्रतिष्ठा है।भारतीय राजनीति में नारी शक्ति जागरण आज एक केंद्रीय विषय बन चुका है।महिला आरक्षण, तीन तलाक पर कानून, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ — ये केवल योजनाएँ नहीं, बल्कि उस वैचारिक दिशा के संकेत हैं जिसमें नारी को करुणा नहीं, शक्ति के रूप में देखा जा रहा है।भारत की संस्कृति में नारी “पूज्य” कही गई, परंतु आधुनिक समाज में उसे वास्तविक सम्मान देने का संघर्ष अभी भी जारी है।ऐसे में अहिल्या का प्रतीक आज भी अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है।

सामाजिक समरसता : राजनीति से ऊपर भारतीयता#भारतीय जनता पार्टी की राजनीति का सबसे बड़ा दावा यह है कि उसका राष्ट्रवाद सांस्कृतिक एकता पर आधारित है।“सबका साथ, सबका विकास” केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का संदेश बनने का प्रयास करता है।भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, परंतु उसकी आत्मा उसकी एकात्मता में है। यदि राजनीति समाज को केवल जाति और संप्रदायों में बाँटती है, तो वह राष्ट्र को कमजोर करती है।किन्तु यदि राजनीति समाज को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ती है, तो वही राष्ट्र विश्व में नेतृत्वकारी भूमिका निभाता है।

 राजनीति नहीं, सभ्यता का पुनर्जागरण#भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को केवल चुनावी समीकरणों से नहीं समझा जा सकता।उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में है कि वह भारतीय महाकाव्यों और सांस्कृतिक प्रतीकों को आधुनिक सामाजिक-राजनीतिक विमर्श से जोड़ने का प्रयास करती है।कुरुक्षेत्र का अर्जुन आज का भारत है। जटायु राष्ट्र के लिए संघर्ष करने वाला हर त्यागी नागरिक है।शबरी समाज का अंतिम व्यक्ति है।और अहिल्या वह नारी है जो सम्मान और पुनर्जागरण की प्रतीक्षा में है।यदि राजनीति इन सबको साथ लेकर चलती है, तभी वह केवल शासन नहीं, राष्ट्र निर्माण बनती है।“भारत तब शक्तिशाली नहीं बनेगा जब केवल उसके शहर चमकेंगे;भारत तब विश्वगुरु बनेगा जब शबरी की कुटिया में दीप जलेगा,अहिल्या को सम्मान मिलेगा,जटायु के बलिदान को स्मरण किया जाएगा,और कुरुक्षेत्र में खड़े अर्जुन को पुनः धर्म का मार्ग दिखाई देगा।”

दीनदयाल उपाध्याय ने “अंत्योदय” का जो विचार दिया, वह भारतीय राजनीति में केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दर्शन है।समाज का अंतिम व्यक्ति — वही राष्ट्र की वास्तविक परीक्षा है।शबरी भारत के उस उपेक्षित समाज का प्रतीक हैं जिसे सदियों तक मुख्यधारा से दूर रखा गया।जब श्रीराम उनकी कुटिया में जाते हैं, तब भारतीय संस्कृति यह घोषणा करती है कि सम्मान जन्म से नहीं, भाव से मिलता है।प्रधानमंत्री आवास, उज्ज्वला, आयुष्मान, हर घर जल जैसी योजनाएँ इसी अंत्योदय दर्शन की राजनीतिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं।यह राजनीति कहती है कि विकास तब तक अधूरा है, जब तक शबरी की झोपड़ी में दीपक न जले।

अहिल्या : नारी सम्मान का सांस्कृतिक पुनर्जागरण#अहिल्या केवल एक पौराणिक पात्र नहीं; वे उस नारी की प्रतीक हैं जिसे समाज ने परिस्थितियों के कारण उपेक्षित कर दिया।श्रीराम का उनका उद्धार करना केवल धार्मिक घटना नहीं, बल्कि नारी गरिमा की पुनर्प्रतिष्ठा है।भारतीय राजनीति में नारी शक्ति जागरण आज एक केंद्रीय विषय बन चुका है।महिला आरक्षण, तीन तलाक पर कानून, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ — ये केवल योजनाएँ नहीं, बल्कि उस वैचारिक दिशा के संकेत हैं जिसमें नारी को करुणा नहीं, शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। भारत की संस्कृति में नारी “पूज्य” कही गई, परंतु आधुनिक समाज में उसे वास्तविक सम्मान देने का संघर्ष अभी भी जारी है।ऐसे में अहिल्या का प्रतीक आज भी अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है।

सामाजिक समरसता : राजनीति से ऊपर भारतीयता#भारतीय जनता पार्टी की राजनीति का सबसे बड़ा दावा यह है कि उसका राष्ट्रवाद सांस्कृतिक एकता पर आधारित है।“सबका साथ, सबका विकास” केवल चुनावी नारा नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का संदेश बनने का प्रयास करता है।भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, परंतु उसकी आत्मा उसकी एकात्मता में है।यदि राजनीति समाज को केवल जाति और संप्रदायों में बाँटती है, तो वह राष्ट्र को कमजोर करती है।किन्तु यदि राजनीति समाज को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ती है, तो वही राष्ट्र विश्व में नेतृत्वकारी भूमिका निभाता है।

 सभ्यता का पुनर्जागरण#भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को केवल चुनावी समीकरणों से नहीं समझा जा सकता।उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में है कि वह भारतीय महाकाव्यों और सांस्कृतिक प्रतीकों को आधुनिक सामाजिक-राजनीतिक विमर्श से जोड़ने का प्रयास करती है।कुरुक्षेत्र का अर्जुन आज का भारत है।जटायु राष्ट्र के लिए संघर्ष करने वाला हर त्यागी नागरिक है।शबरी समाज का अंतिम व्यक्ति है।और अहिल्या वह नारी है जो सम्मान और पुनर्जागरण की प्रतीक्षा में है।यदि राजनीति इन सबको साथ लेकर चलती है, तभी वह केवल शासन नहीं, राष्ट्र निर्माण बनती है।“भारत तब शक्तिशाली नहीं बनेगा जब केवल उसके शहर चमकेंगे;भारत तब विश्वगुरु बनेगा जब शबरी की कुटिया में दीप जलेगा,अहिल्या को सम्मान मिलेगा,जटायु के बलिदान को स्मरण किया जाएगा,और कुरुक्षेत्र में खड़े अर्जुन को पुनः धर्म का मार्ग दिखाई देगा।”

1 टिप्पणी:

  1. पार्टी के लोग कहा जाएंगे आयातित से भरे जा रहे लोग जो पूरा जीवन पार्टी का झण्डा ढोने में बिताया अब क्या करे कहां जाए

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