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मंगलवार, 19 मई 2026

“भारत का वैचारिक युद्ध : मीडिया, राष्ट्रवाद और गीता का धर्मक्षेत्र”

 संपादकीय/कौटिल्य उवाच!

 राजेंद्र नाथ तिवारी 

“भारत का वैचारिक युद्ध : मीडिया, राष्ट्रवाद और गीता का धर्मक्षेत्र”


“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”# रामधारी सिंह दिनकर
 
भारत इस समय केवल राजनीतिक संक्रमण के दौर से नहीं गुजर रहा, वह एक गहरे वैचारिक युद्ध के मध्य खड़ा है। यह युद्ध सीमाओं पर दिखाई नहीं देता, परंतु इसकी आहट विश्वविद्यालयों में सुनाई देती है, इसकी गूँज सोशल मीडिया में दिखाई देती है, और इसकी दिशा संपादकीय कक्षों में तय होती है। यह युद्ध बंदूकों का नहीं, शब्दों का है; यह युद्ध सत्ता परिवर्तन का नहीं, सभ्यता की स्मृति बचाने का है।
आज जब हम मीडिया और राष्ट्रवाद की चर्चा करते हैं, तब हमें यह समझना होगा कि आधुनिक युग में मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं रहा। वह जनमत का निर्माता, भावनाओं का संचालक और राष्ट्र की चेतना का स्थापत्यकार बन चुका है। किसी समय ऋषि आश्रम समाज के वैचारिक केंद्र हुआ करते थे, फिर स्वतंत्रता आंदोलन में समाचार पत्रों ने यह भूमिका निभाई; और आज डिजिटल मंच वही उत्तरदायित्व निभा रहे हैं। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या आज का मीडिया भारत की आत्मा को समझ पा रहा है? क्या वह भारत को केवल एक राजनीतिक इकाई मानता है, या एक सनातन सभ्यता के रूप में देखता है? क्या उसके लिए राष्ट्रवाद केवल चुनावी शब्द है, या वह इसे भारत की सांस्कृतिक चेतना का आधार मानता है? यही आज के भारत का सबसे बड़ा वैचारिक प्रश्न है।धर्मक्षेत्र से मीडिया क्षेत्र तक, भगवद गीता का प्रथम श्लोक केवल महाभारत का आरंभ नहीं है, वह मानव सभ्यता के सबसे बड़े वैचारिक युद्ध का उद्घोष है—धृतराष्ट्र पूछते है — “धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे…”।अर्थात युद्ध केवल भूमि पर नहीं हो रहा, वह धर्म और अधर्म के बीच हो रहा है। कुरुक्षेत्र केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं था, वह विचारों का रणक्षेत्र था।
आज का भारत भी एक नए कुरुक्षेत्र में खड़ा है। अंतर केवल इतना है कि अब रथों की जगह कैमरे हैं, शंखों की जगह प्राइम टाइम डिबेट हैं, और अस्त्रों की जगह नैरेटिव हैं। मीडिया आज वही भूमिका निभा रहा है जो महाभारत में संजय निभा रहे थे। संजय केवल घटनाओं का वर्णन नहीं कर रहे थे, वे दृष्टि दे रहे थे। यदि दृष्टि निष्पक्ष हो तो समाज सत्य देखता है; यदि दृष्टि वैचारिक पक्षपात से ग्रस्त हो जाए तो पूरा राष्ट्र भ्रमित हो जाता है।यही कारण है कि आधुनिक भारत में संपादकीय केवल लेख नहीं रहे; वे राष्ट्र की दिशा निर्धारित करने वाले वैचारिक शस्त्र बन चुके हैं।
राष्ट्रवाद : राजनीति नहीं, सभ्यता की चेतना#दुर्भाग्य यह है कि भारत में राष्ट्रवाद को अक्सर केवल राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है। जबकि भारत में राष्ट्रवाद की अवधारणा पश्चिम से भिन्न रही है। यूरोप का राष्ट्रवाद सत्ता और भूभाग पर आधारित था; भारत का राष्ट्रवाद संस्कृति, स्मृति और आध्यात्मिक एकात्मता पर आधारित रहा। भारत हजारों वर्षों तक इसलिए जीवित नहीं रहा कि उसके पास सबसे बड़ी सेनाएँ थीं; भारत इसलिए जीवित रहा क्योंकि उसकी सभ्यता जीवित रही। आक्रमण आए, साम्राज्य टूटे, राजधानियाँ बदलीं, किन्तु भारत की आत्मा जीवित रही।
जब स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि “उठो, जागो”, तब वह केवल व्यक्ति को नहीं जगा रहे थे; वे भारत की सभ्यतागत चेतना को जगा रहे थे। जब बाँकीम चंद्र चट्टोंपाध्याय “वंदे मातरम्” लिखते हैं, तब वह केवल गीत नहीं रचते; वे मातृभूमि को देवत्व प्रदान करते हैं। और जब रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं—“क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,”तब वे भारत को यह स्मरण कराते हैं कि राष्ट्रवाद कायरता नहीं, आत्मसम्मान है।
मीडिया और वैचारिक उपनिवेशवाद#स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता तो प्राप्त कर ली, परंतु वैचारिक स्वतंत्रता का संघर्ष अधूरा रह गया। हमारी शिक्षा, हमारा बौद्धिक विमर्श और हमारे मीडिया का बड़ा भाग लंबे समय तक पश्चिमी दृष्टिकोण से संचालित होता रहा। परिणाम यह हुआ कि भारत की परंपराओं को प्रगतिशीलता के नाम पर संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा। मंदिरों को पिछड़ेपन का प्रतीक बताया गया, संस्कृत को मृत भाषा कहा गया, और सनातन संस्कृति को आधुनिकता के विरोधी रूप में प्रस्तुत किया गया।
यह वही मानसिकता थी जिसे रामधारी सिंह दिनकर ने “आत्महीनता” कहा था।
मीडिया का एक वर्ग आज भी भारत को उसकी सभ्यता की दृष्टि से नहीं, बल्कि औपनिवेशिक फ्रेम से देखता है। यदि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान की बात करे तो उसे “कट्टरता” कहा जाता है; परंतु वही बात पश्चिम अपने संदर्भ में करे तो उसे “राष्ट्रीय गौरव” कहा जाता है। यह दोहरा मापदंड केवल पत्रकारिता की समस्या नहीं, बल्कि वैचारिक दासता का संकेत है।
संपादकीय : राष्ट्र की चेतना का प्रहरी#स्वतंत्रता आंदोलन के समय समाचार पत्र केवल व्यवसाय नहीं थे; वे राष्ट्रीय आंदोलन के शस्त्र थे।बाल गंगाधर तिलक का “केसरी”,महात्मा गाँधी का “यंग इंडिया”,और गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता  ये सब राष्ट्र चेतना के वाहक थे।उनके लिए संपादकीय का अर्थ था — समाज को दिशा देना।आज दुर्भाग्य यह है कि अनेक मंचों पर संपादकीय का स्थान “टीआरपी आधारित उत्तेजना” ने ले लिया है। विचार की जगह शोर ने ले ली, संवाद की जगह आरोपों ने, और राष्ट्रहित की जगह क्लिकबेट ने।
राष्ट्रवाद का अर्थ सरकार का अंध समर्थन नहीं होता। सच्चा राष्ट्रवाद सत्ता से प्रश्न भी पूछता है, परंतु राष्ट्र को कमजोर किए बिना। वह आलोचना करता है, पर आत्मघात नहीं करता। वह असहमति रखता है, पर भारत की सभ्यतागत गरिमा का अपमान नहीं करता।डिजिटल युग का नया कुरुक्षेत्र#आज भारत का वैचारिक युद्ध टीवी स्टूडियो से आगे बढ़ चुका है।अब युद्ध: सोशल मीडिया पोस्ट में है,यूट्यूब की बहसों में है,इंस्टाग्राम रील्स में है,और व्हाट्सप्प की चर्चाओं में है।
यह “डिजिटल कुरुक्षेत्र” है।यहाँ हर व्यक्ति अर्जुन भी है और संजय भी। हर व्यक्ति के हाथ में एक ऐसा माध्यम है जिससे वह हजारों लोगों की चेतना को प्रभावित कर सकता है।किन्तु यही सबसे बड़ा संकट भी है। क्योंकि जब सूचना की गति विवेक से तेज हो जाती है, तब समाज भावनात्मक भीड़ में बदलने लगता है।
आज फेक न्यूज, आधी-अधूरी सूचनाएँ और वैचारिक प्रोपेगैंडा समाज को विभाजित कर रहे हैं। ऐसे समय में मीडिया का दायित्व और बढ़ जाता है।
उसे केवल वायरल होने की नहीं, विश्वसनीय होने की चिंता करनी होगी।
गीता का संदेश और मीडिया का धर्म
भगवद गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—अर्थात अपने धर्म का पालन सर्वोत्तम है।मीडिया का भी एक धर्म है—सत्य कहना,समाज को जोड़ना,राष्ट्रहित को समझना,और सत्ता तथा समाज दोनों को आईना दिखाना।यदि मीडिया अपने धर्म से भटक जाए, तो समाज दिशाहीन हो जाता है। क्योंकि जनता वही देखती है जो मीडिया दिखाता है, वही सोचती है जिसका नैरेटिव बार-बार दोहराया जाता है।
इसलिए आधुनिक भारत में पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, राष्ट्रीय उत्तरदायित्व है।
दिनकर की चेतावनी
रामधारी सिंह दिनकर ने बहुत पहले चेतावनी दी थी—“समर शेष है…”
यह पंक्ति आज और अधिक प्रासंगिक हो चुकी है। भारत का वैचारिक संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। यह संघर्ष अब इतिहास की व्याख्या पर है, शिक्षा की दिशा पर है, संस्कृति की पहचान पर है और आने वाली पीढ़ियों की स्मृति पर है।
यदि किसी राष्ट्र की युवा पीढ़ी को उसकी सभ्यता से काट दिया जाए, तो वह आर्थिक रूप से समृद्ध होकर भी मानसिक रूप से पराधीन बनी रहती है।
इसलिए आज आवश्यकता केवल आर्थिक विकास की नहीं, वैचारिक आत्मनिर्भरता की भी है। भारत को कैसी मीडिया दृष्टि चाहिए?भारत को ऐसा मीडिया चाहिए—जो आधुनिक हो, पर आत्महीन न हो; जो वैश्विक हो, पर जड़ों से कटा न हो;जो आलोचक हो, पर राष्ट्रविरोधी न हो;जो सत्ता से प्रश्न पूछे, पर सभ्यता का उपहास न करे।भारत को ऐसे संपादकीय चाहिए जो समाज को विभाजित नहीं, जागृत करें। जो भारत को केवल “मार्केट” नहीं, “मातृभूमि” समझें।
जो राष्ट्रवाद को चुनावी नारे से ऊपर उठाकर सभ्यतागत चेतना के रूप में देखें।
 शब्दों का धर्मयुद्ध#आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसका भविष्य केवल संसद में तय नहीं होगा; वह विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों, डिजिटल मंचों और संपादकीय लेखों में भी तय होगा।यह युद्ध तलवारों का नहीं, विचारों का है।यह युद्ध भूभाग का नहीं, भावभूमि का है।यह युद्ध सत्ता का नहीं, स्मृति का है।
और इस युद्ध में तटस्थता भी एक प्रकार का पक्ष है।“जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”इसलिए आज आवश्यकता केवल पत्रकारों की नहीं, बल्कि ऐसे वैचारिक प्रहरी की है जो भारत को उसकी आत्मा से जोड़ सकें। क्योंकि किसी राष्ट्र की सीमाएँ सैनिक बचाते हैं, पर उसकी सभ्यता शब्द बचाते हैं।
भारत का वैचारिक युद्ध जारी है — और इस युद्ध में कलम ही सबसे बड़ा अस्त्र है। 

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