हिंदी पत्रकारिता : राष्ट्रचेतना की अग्निशिखा, जनमन की धड़कन और लोकतंत्र का लोकधर्म!
वी के त्रिपाठी, सम्वाददाता, कौटिल्य का भारत ,Kautilyakabharat@gmail.com
भारत में हिंदी पत्रकारिता का इतिहास केवल समाचारों के प्रकाशन का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता, सामाजिक संघर्ष, वैचारिक जागरण और लोकतांत्रिक विकास का विराट आख्यान है। हिंदी पत्रकारिता ने कभी अंग्रेजी साम्राज्यवाद को चुनौती दी, कभी समाज की कुरीतियों पर प्रहार किया, कभी जनभावनाओं को राष्ट्रशक्ति में बदला और कभी सत्ता के दर्प को तोड़कर लोकतंत्र की रक्षा की।
यदि भारत की स्वतंत्रता का राजनीतिक इतिहास तलवार और आंदोलन का इतिहास है, तो उसका वैचारिक इतिहास हिंदी पत्रकारिता का इतिहास है। कलम ने यहाँ केवल शब्द नहीं लिखे, बल्कि जनमानस में क्रांति की चिंगारियाँ बोयीं।
हिंदी पत्रकारिता का उद्भव : भाषा से लोकजागरण तक
उन्नीसवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक दासता, सामाजिक जड़ता और सांस्कृतिक हीन भावना से जूझ रहा था। अंग्रेजी शासन भारतीय समाज को केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी पराधीन बनाना चाहता था। शासन की भाषा अंग्रेजी थी, न्याय की भाषा अंग्रेजी थी, शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होती जा रही थी और भारतीय भाषाएँ उपेक्षा का शिकार थीं। ऐसे समय में हिंदी पत्रकारिता ने भारतीय आत्मा को उसकी अपनी भाषा में संबोधित किया।
30 मई 1826 को कोलकाता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह केवल एक समाचारपत्र नहीं था, बल्कि भारतीय भाषाई स्वाभिमान का उद्घोष था। आर्थिक कठिनाइयों, सरकारी उपेक्षा और वितरण की समस्याओं के कारण यह अधिक समय तक नहीं चल सका, पर उसने एक ऐसी मशाल जलाई जो आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन की वैचारिक अग्नि बनी।‘उदन्त मार्तण्ड’ का महत्व इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि उसने यह स्थापित किया कि भारत की जनता अपनी भाषा में सोच सकती है, संवाद कर सकती है और शासन से प्रश्न भी पूछ सकती है।
हिंदी पत्रकारिता और भारतेंदु युग : नवजागरण का शंखनाद
यदि जुगल किशोर शुक्ल ने हिंदी पत्रकारिता को जन्म दिया, तो भारतेंदु हरिश्चंद्र ने उसमें राष्ट्रचेतना का प्राण फूँका।उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी पत्रकारिता को केवल सूचना का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राजनीतिक चेतना का मंच बना दिया।उनकी पत्रिकाएँ ‘कवि वचन सुधा’, ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’, ‘बाल बोधिनी’ समाज में वैचारिक क्रांति की वाहक बनीं।
भारतेंदु ने अंग्रेजी शासन की आर्थिक लूट, सामाजिक विडंबनाओं और सांस्कृतिक पतन पर तीखा प्रहार किया। उनका प्रसिद्ध वाक्य
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल” केवल साहित्यिक कथन नहीं था, बल्कि भाषाई राष्ट्रवाद का घोष था।भारतेंदु युग में हिंदी पत्रकारिता ने पहली बार यह महसूस किया कि पत्रकारिता केवल शासन के आदेश प्रकाशित करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की आत्मा की अभिव्यक्ति भी है।
द्विवेदी युग : विचार, तर्क और राष्ट्रीय अनुशासन महावीर प्रसाद द्विवेदी के समय हिंदी पत्रकारिता अधिक गंभीर, अनुशासित और वैचारिक हुई। ‘सरस्वती’ पत्रिका ने हिंदी समाज को केवल साहित्य नहीं दिया, बल्कि चिंतन की दिशा दी।इस युग में पत्रकारिता ने अनेक सामाजिक प्रश्नों को उठाया ,स्त्री शिक्षा,अस्पृश्यता,स्वदेशी,वैज्ञानिक चेतना,राष्ट्रीय एकता
भारतीय इतिहास का पुनर्पाठ यहीं से हिंदी पत्रकारिता भावनात्मक राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर बौद्धिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ी।स्वतंत्रता आंदोलन और हिंदी पत्रकारिता : कलम बनी क्रांति की मशाल बीसवीं शताब्दी का आरंभ हिंदी पत्रकारिता का स्वर्णयुग था। यह वह समय था जब समाचारपत्र केवल सूचना नहीं देते थे, बल्कि आंदोलन खड़े करते थे। संपादकीय लेख जनता के लिए राजनीतिक प्रशिक्षण बन जाते थे।
गणेश शंकर विद्यार्थी : पत्रकारिता का बलिदानी चेहरा‘प्रताप’ समाचारपत्र के माध्यम से गणेश शंकर विद्यार्थी ने किसानों, मजदूरों और शोषितों की आवाज उठाई।उन्होंने सांप्रदायिकता के विरुद्ध संघर्ष किया और कानपुर दंगों में लोगों को बचाते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।उनकी पत्रकारिता सत्ता से समझौते की नहीं, सत्य के लिए संघर्ष की पत्रकारिता थी।
महात्मा गांधी और पत्रकारिता#महात्मा गांधी ने पत्रकारिता को सत्याग्रह का वैचारिक अस्त्र बनाया। ‘यंग इंडिया’, ‘हरिजन’, ‘नवजीवन’ जैसे पत्र केवल राजनीतिक पत्र नहीं थे, बल्कि नैतिक चेतना के दस्तावेज थे।गांधी मानते थे कि पत्रकारिता का उद्देश्य जनता को शिक्षित करना है, उत्तेजित करना नहीं।आज जब मीडिया का बड़ा हिस्सा शोर और सनसनी में उलझा दिखाई देता है, तब गांधी की पत्रकारिता और भी प्रासंगिक प्रतीत होती है।
हिंदी पत्रकारिता और स्वतंत्र भारत#1947 के बाद पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था — अब उसकी भूमिका क्या होगी?
स्वतंत्रता से पहले लक्ष्य विदेशी शासन से मुक्ति था; स्वतंत्रता के बाद लक्ष्य लोकतंत्र की रक्षा और जनसमस्याओं का समाधान बन गया।
हिंदी पत्रकारिता ने गाँवों, कस्बों और छोटे शहरों तक पहुँच बनाकर लोकतंत्र को जनाधार दिया।हिंदी पत्रकारिता की सबसे बड़ी शक्ति : जनस्वीकार्यता,अंग्रेजी मीडिया लंबे समय तक अभिजात वर्ग का माध्यम बना रहा, जबकि हिंदी पत्रकारिता भारतीय जनजीवन की भाषा बनी।किसान की पीड़ा,बेरोजगार युवा की व्यथा,गाँव की बदहाली
सामाजिक अन्याय,स्थानीय भ्रष्टाचार इन सबको हिंदी पत्रकारिता ने राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया।इसी कारण हिंदी पत्रकारिता केवल “मीडिया” नहीं बनी, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का लोकधर्म बन गई।
आपातकाल : पत्रकारिता की अग्निपरीक्षा,1975 का आपातकाल भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का सबसे कठिन दौर था। सेंसरशिप लागू हुई, समाचार रोके गए, संपादकों पर दबाव डाला गया।कई अखबार झुक गए, पर कुछ डटे रहे।यह वही समय था जब प्रसिद्ध टिप्पणी सामने आई “सरकार ने झुकने को कहा था, लेकिन कुछ लोग रेंगने लगे।”हिंदी पत्रकारिता के अनेक पत्रकारों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया।आपातकाल ने यह सिद्ध किया कि पत्रकारिता केवल व्यवसाय नहीं हो सकती; यदि उसमें लोकतांत्रिक नैतिकता नहीं है तो वह सत्ता का उपकरण बन जाती है।
उदारीकरण के बाद : मिशन से बाज़ार तक#1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के साथ मीडिया का चरित्र तेजी से बदला।
समाचारपत्र और टीवी चैनल बड़े कॉरपोरेट ढाँचों में बदलने लगे। पत्रकारिता का केंद्र विचार से हटकर बाज़ार और TRP पर आने लगा।
सकारात्मक पक्ष,तकनीकी विकास,तेज समाचार प्रसारण,व्यापक पहुँच
क्षेत्रीय पत्रकारिता का विस्तार,नकारात्मक पक्ष,सनसनीखेज़ी
‘ब्रेकिंग न्यूज’ संस्कृति,वैचारिक ध्रुवीकरण,विज्ञापन आधारित संपादकीय नीति,पेड न्यूज बनी, पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा “जनसेवा” से “दर्शक प्रबंधन” की ओर बढ़ गया।हिंदी टीवी पत्रकारिता : प्रभाव और विकृति हिंदी टीवी पत्रकारिता ने भारतीय राजनीति को प्रत्यक्ष जनमंच में बदल दिया।चुनावी बहसें, लाइव रिपोर्टिंग और त्वरित विश्लेषण ने लोकतंत्र को अधिक भागीदारीपूर्ण बनाया। लेकिन इसी के साथ एक गंभीर संकट भी पैदा हुआ “सूचना का नाटकीकरण।”
बहसें संवाद से अधिक संघर्ष का मंच बनने लगीं। शोर ने तर्क को दबाना शुरू किया।फिर भी यह भी सत्य है कि हिंदी मीडिया ने अनेक घोटाले उजागर किए, भ्रष्टाचार पर प्रहार किया और जनआंदोलनों को बल दिया।
डिजिटल युग : हिंदी पत्रकारिता का पुनर्जन्म आज हिंदी पत्रकारिता एक नए संक्रमण काल में है।इंटरनेट और सोशल मीडिया ने सूचना का लोकतंत्रीकरण कर दिया है। अब केवल बड़े मीडिया संस्थान ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकार, यूट्यूब चैनल, ब्लॉग और डिजिटल पोर्टल भी जनमत निर्माण कर रहे हैं।नई संभावनाएँ,हाइपरलोकल पत्रकारिताडेटा आधारित विश्लेषण,स्वतंत्र वैचारिक मंच,पॉडकास्ट और डिजिटल डॉक्यूमेंट्री,ग्रामीण डिजिटल पत्रकारिता,आज भारत का सबसे बड़ा इंटरनेट उपभोक्ता वर्ग हिंदीभाषी है। इसका अर्थ है कि भविष्य का सबसे बड़ा मीडिया बाजार हिंदी का होगा।हिंदी पत्रकारिता की सामाजिक-राजनीतिक स्वीकार्यता बनी, हिंदी पत्रकारिता को समाज ने केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया कि वह हिंदी में थी, बल्कि इसलिए कि वह जनता के दुःख-दर्द की भाषा थी।सामाजिक स्तर पर
सामाजिक सुधार आंदोलनों को गति मिली,स्त्री चेतना विकसित हुई
ग्रामीण समाज को आवाज मिली,सांस्कृतिक आत्मविश्वास बढ़ा
राजनीतिक स्तर पर,स्वतंत्रता आंदोलन को जनसमर्थन मिला
लोकतंत्र मजबूत हुआ,चुनावी जागरूकता बढ़ी,सत्ता की जवाबदेही तय हुई और भारत की राजनीति में हिंदी पत्रकारिता का प्रभाव इतना व्यापक है कि कई बार एक संपादकीय पूरे राजनीतिक विमर्श की दिशा बदल देता है।
सबसे बड़ा संकट : विश्वसनीयताआज हिंदी पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि विश्वसनीयता की है।यदि पत्रकारिता सत्ता की दलाली, कॉरपोरेट हितों और वैचारिक कट्टरता में फँस जाती है, तो जनता का विश्वास टूटता है।पत्रकारिता की शक्ति उसकी भाषा में नहीं, उसकी नैतिकता में होती है।भविष्य : हिंदी पत्रकारिता कहाँ जाएगी?भविष्य में हिंदी पत्रकारिता के सामने दो रास्ते हैं —
बाज़ार, सनसनी और राजनीतिक ध्रुवीकरण का रास्ता,जनविश्वास, शोध, वैचारिक गंभीरता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का रास्ता
यदि हिंदी पत्रकारिता पुनः अपने मूल धर्म — “जनसत्य की निर्भीक अभिव्यक्ति” की ओर लौटती है, तो आने वाला समय उसका स्वर्णिम युग हो सकता है।
कलम की वह लौ जो अभी जीवित है हिंदी पत्रकारिता ने दासता के अंधकार में स्वतंत्रता का दीप जलाया, सामाजिक जड़ता में चेतना जगाई, लोकतंत्र को जनाधार दिया और करोड़ों भारतीयों को अपनी भाषा में सोचने का साहस दिया।यह पत्रकारिता कभी भारतेंदु की राष्ट्रीय चेतना बनी, कभी गणेश शंकर विद्यार्थी का बलिदान, कभी गांधी का सत्याग्रह और कभी लोकतंत्र की प्रहरी।आज चुनौतियाँ बड़ी हैं, पर संभावनाएँ उससे भी बड़ी हैं।
जब तक भारत का जनमानस अपनी मिट्टी, अपनी भाषा और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सजग रहेगा, तब तक हिंदी पत्रकारिता केवल जीवित नहीं रहेगी, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज बनी रहेगी।
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