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शनिवार, 23 मई 2026

कॉकरोच राजनीति का शोर, भारत के युवाओ को कोन ढकेल रहा हे अराजकता की ओर ,



कॉकरोच राजनीति, आक्रोशित युवा और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

हरीश सिह राजनितिक  विश्लेषक 
भारत आज केवल आर्थिक या राजनीतिक संक्रमण के दौर से नहीं गुजर रहा, बल्कि मानसिक और वैचारिक उथल-पुथल के एक ऐसे कालखंड में प्रवेश कर चुका है जहाँ शब्द भी बारूद बनते जा रहे हैं। सत्ता, विपक्ष, न्यायपालिका, मीडिया और सड़क — सबके बीच अविश्वास की रेखाएँ गहरी होती दिखाई देती हैं। ऐसे समय में यदि कोई उच्च पदस्थ व्यक्ति युवाओं के संदर्भ में अपमानजनक या असंवेदनशील टिप्पणी करता है, तो उसका प्रभाव केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहता; वह करोड़ों हताश, बेरोजगार और बेचैन युवाओं की चेतना को झकझोर देता है।
भारत का युवा आज दो दिशाओं के बीच खड़ा है—एक ओर डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक अवसरों का सपना;दूसरी ओर बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनिश्चितता, पेपर लीक, सामाजिक असंतोष और राजनीतिक उपयोगिता का भय।
ऐसे वातावरण में यदि “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे प्रतीकात्मक नाम सोशल मीडिया पर अचानक उभरते हैं और लाखों-करोड़ों लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं, तो यह केवल हास्य या व्यंग्य नहीं होता; यह व्यवस्था के प्रति गहराते असंतोष का संकेत बन जाता है। यह प्रश्न गंभीर है कि क्या भारत में एक नया “डिजिटल विद्रोह” जन्म ले रहा है?
क्या युवा अब विचारधारा से अधिक भावनात्मक प्रतिशोध की राजनीति की ओर बढ़ रहा है?और क्या कुछ राजनीतिक शक्तियाँ इस असंतोष को दिशा देने के बजाय केवल सत्ता संघर्ष के औजार के रूप में उपयोग करना चाहती हैं?
भारत की प्रकृति मूलतः क्रांति से अधिक “संतुलन” की रही है। यह भूमि भगवद्गीता की है, जहाँ युद्ध भी धर्म और मर्यादा की अंतिम सीमा पर लड़ा गया। यहाँ जनांदोलन हुए, परंतु उनका मूल लक्ष्य राष्ट्रविनाश नहीं, राष्ट्रसुधार था।लेकिन आज सोशल मीडिया की राजनीति ने संवाद को उन्माद में बदलने की क्षमता पैदा कर दी है।
नेपाल, बांग्लादेश या अन्य देशों के आंदोलनों की तुलना भारत से करना अत्यंत संवेदनशील विषय है। भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुस्तरीय सभ्यता है। यहाँ अराजकता की छोटी चिंगारी भी व्यापक सामाजिक तनाव का रूप ले सकती है।युवाओं के भीतर यदि हताशा है, तो उसका समाधान “विद्रोह” का रोमांटिक नारा नहीं हो सकता। लोकतंत्र में परिवर्तन का मार्ग संविधान, संवाद, नीति सुधार और सामाजिक उत्तरदायित्व से होकर जाता है। सवाल केवल विपक्ष का भी नहीं है।यदि विपक्ष युवाओं के आक्रोश को केवल राजनीतिक ऑक्सीजन की तरह उपयोग करता है, तो वह भी उतना ही दोषी है जितना कोई असंवेदनशील सत्ता तंत्र। राजनीति का उद्देश्य राष्ट्र को स्थिर करना होना चाहिए, विस्फोटक मनोविज्ञान पैदा करना नहीं।इसी प्रकार न्यायपालिका पर भी जनता की दृष्टि अत्यंत गंभीर होती है।
जब न्यायपालिका को लेकर “परिवारवाद”, “सीमित वर्गीय प्रतिनिधित्व” या “जनसरोकारों से दूरी” जैसे प्रश्न उठते हैं, तब संस्थाओं को आत्ममंथन करना चाहिए।लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान आवश्यक है, परंतु जनता के विश्वास का संरक्षण उससे भी अधिक आवश्यक है। भारत का भविष्य सड़क की अराजकता से नहीं, बल्कि अवसर आधारित राष्ट्रनिर्माण से सुरक्षित होगा। यदि करोड़ों युवाओं को रोजगार, कौशल, न्यायपूर्ण प्रतियोगी व्यवस्था और अभिव्यक्ति का सम्मान नहीं मिलेगा, तो असंतोष का विस्फोट स्वाभाविक है।और यदि उस असंतोष को राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के लिए भड़काने लगें, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। आज आवश्यकता “कॉकरोच राजनीति” नहीं, बल्कि “कर्तव्य राजनीति” की है।युवा को गुस्सा नहीं, दिशा चाहिए।राष्ट्र को ट्रेंड नहीं, स्थिरता चाहिए।और लोकतंत्र को भीड़ नहीं, जागरूक नागरिक चाहिए। भारत की आत्मा अब भी संयम और सभ्यता में विश्वास करती है।लेकिन इतिहास यह भी कहता है—
“जब व्यवस्था जनता की पीड़ा सुनना बंद कर देती है,तब व्यंग्य आंदोलन बन जाता है,और आंदोलन कभी-कभी अराजकता में बदल जाता है।”

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