“आख़िर कितने विद्यार्थियों का भविष्य कुचला जाएगा?”
सीबीएसई की अव्यवस्था, शिक्षा मंत्रालय की विफलता और टूटता हुआ भारत का विश्वास
राजेन्द्र नाथ तिवारी 272001
देश के करोड़ों विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में आज एक ही प्रश्न धधक रहा है —आख़िर यह शिक्षा व्यवस्था चल कौन रहा है?और यदि चला रहा है, तो क्या उसे देश के युवाओं की मेहनत, मानसिक पीड़ा और भविष्य की कोई चिंता भी है? सीबीएसई बोर्ड जैसी सर्वोच्च संस्था में छात्रों की कॉपियां बदल जाना, गलत मूल्यांकन होना, और फिर सच्चाई सामने आने पर स्वयं सीबीएसई अध्यक्ष का चैनलों पर आकर हाथ जोड़कर माफी मांगना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं है — यह भारत के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ है।
यह उस राष्ट्र की रीढ़ तोड़ने जैसा अपराध है, जो स्वयं को “विश्वगुरु” बनाने का सपना देख रहा है। जिस देश का विद्यार्थी दिन-रात मेहनत करे, माता-पिता कर्ज लेकर कोचिंग भरें, बच्चे अवसाद और दबाव में जीते हुए अपने सपनों को उत्तरपुस्तिका में उतारें, और अंत में उन्हें यह पता चले कि उनकी कॉपी ही बदल गई, उनका मूल्यांकन ही गलत हो गया — तो यह केवल गलती नहीं, यह युवाओं के विश्वास की हत्या है। देश में आज शिक्षा व्यवस्था मज़ाक बनती जा रही है। कहीं पेपर आउट हो रहे हैं, कहीं परीक्षाएं रद्द हो रही हैं, कहीं रिजल्ट में धांधली, कहीं भर्ती परीक्षाओं में भ्रष्टाचार।
हर कुछ महीनों में लाखों छात्रों का भविष्य अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया जाता है और सत्ता के गलियारों में केवल बयानबाजी चलती रहती है।क्या यही “नया भारत” है? जहां युवाओं को अवसर नहीं, अव्यवस्था मिल रही है?
जहां प्रतिभा से अधिक भाग्य और सिस्टम की कृपा काम कर रही है?सबसे बड़ा प्रश्न केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से है।यदि उनके नेतृत्व में लगातार परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ रहे हैं, यदि शिक्षा मंत्रालय छात्रों का भरोसा बचाने में असफल हो रहा है, तो नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा? या फिर इस देश में अब मंत्री केवल उद्घाटन और भाषण देने के लिए रह गए हैं? यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब-जब कोई परीक्षा घोटाला सामने आता है, तब-तब छात्रों को ही धैर्य रखने, संयम रखने और प्रतीक्षा करने की सलाह दी जाती है। लेकिन कभी किसी मंत्री से यह नहीं पूछा जाता कि करोड़ों युवाओं की टूटती उम्मीदों का हिसाब कौन देगा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार युवाओं को भारत की सबसे बड़ी ताकत बताते हैं। परंतु सच्चाई यह है कि आज वही युवा सबसे अधिक असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जिस राष्ट्र का विद्यार्थी अपनी मेहनत के परिणाम पर भरोसा न कर सके, वह राष्ट्र केवल आर्थिक महाशक्ति बनने के दावे कर सकता है, नैतिक महाशक्ति नहीं।
राष्ट्रध्वज का अपमान केवल किसी कपड़े को जलाने से नहीं होता।
राष्ट्रध्वज का सबसे बड़ा अपमान तब होता है जब उसी राष्ट्र के बच्चों के सपनों को व्यवस्था कुचल देती है।
जब मेहनत हार जाती है और लापरवाही जीत जाती है। जब ईमानदार छात्र अवसाद में चला जाता है और तंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस करके माफी मांगकर बच निकलता है। अब समय केवल “जांच” का नहीं, कठोर निर्णय का है।
देश के शिक्षा तंत्र में जवाबदेही तय करनी होगी।सीबीएसई जैसी संस्थाओं को राजनीतिक प्रचार का मंच नहीं, राष्ट्रनिर्माण का केंद्र बनाना होगा। और यदि वर्तमान नेतृत्व यह करने में असफल है, तो देश को ऐसे शिक्षा मंत्री की आवश्यकता है जो छात्रों के भविष्य को फाइलों की औपचारिकता नहीं, राष्ट्र की धरोहर समझे।
देश का युवा अब केवल नौकरी नहीं मांग रहा —वह न्याय मांग रहा है।वह भरोसा मांग रहा है। वह यह आश्वासन मांग रहा है कि उसकी मेहनत किसी भ्रष्ट और लापरवाह तंत्र की भेंट नहीं चढ़ेगी। क्योंकि यदि युवाओं का विश्वास टूट गया, तो केवल एक परीक्षा व्यवस्था नहीं टूटेगी —भारत का भविष्य टूट जाएगा। और तब इतिहास यह प्रश्न अवश्य पूछेगा —
“आख़िर कितने विद्यार्थियों का भविष्य कुचला गया, तब जाकर सत्ता की नींद टूटी?”
देश के करोड़ों विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में आज एक ही प्रश्न धधक रहा है —आख़िर यह शिक्षा व्यवस्था चल कौन रहा है?और यदि चला रहा है, तो क्या उसे देश के युवाओं की मेहनत, मानसिक पीड़ा और भविष्य की कोई चिंता भी है? सीबीएसई बोर्ड जैसी सर्वोच्च संस्था में छात्रों की कॉपियां बदल जाना, गलत मूल्यांकन होना, और फिर सच्चाई सामने आने पर स्वयं सीबीएसई अध्यक्ष का चैनलों पर आकर हाथ जोड़कर माफी मांगना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं है — यह भारत के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ है।
यह उस राष्ट्र की रीढ़ तोड़ने जैसा अपराध है, जो स्वयं को “विश्वगुरु” बनाने का सपना देख रहा है। जिस देश का विद्यार्थी दिन-रात मेहनत करे, माता-पिता कर्ज लेकर कोचिंग भरें, बच्चे अवसाद और दबाव में जीते हुए अपने सपनों को उत्तरपुस्तिका में उतारें, और अंत में उन्हें यह पता चले कि उनकी कॉपी ही बदल गई, उनका मूल्यांकन ही गलत हो गया — तो यह केवल गलती नहीं, यह युवाओं के विश्वास की हत्या है। देश में आज शिक्षा व्यवस्था मज़ाक बनती जा रही है। कहीं पेपर आउट हो रहे हैं, कहीं परीक्षाएं रद्द हो रही हैं, कहीं रिजल्ट में धांधली, कहीं भर्ती परीक्षाओं में भ्रष्टाचार।
हर कुछ महीनों में लाखों छात्रों का भविष्य अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल दिया जाता है और सत्ता के गलियारों में केवल बयानबाजी चलती रहती है।क्या यही “नया भारत” है? जहां युवाओं को अवसर नहीं, अव्यवस्था मिल रही है?
जहां प्रतिभा से अधिक भाग्य और सिस्टम की कृपा काम कर रही है?सबसे बड़ा प्रश्न केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से है।यदि उनके नेतृत्व में लगातार परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ रहे हैं, यदि शिक्षा मंत्रालय छात्रों का भरोसा बचाने में असफल हो रहा है, तो नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा? या फिर इस देश में अब मंत्री केवल उद्घाटन और भाषण देने के लिए रह गए हैं? यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब-जब कोई परीक्षा घोटाला सामने आता है, तब-तब छात्रों को ही धैर्य रखने, संयम रखने और प्रतीक्षा करने की सलाह दी जाती है। लेकिन कभी किसी मंत्री से यह नहीं पूछा जाता कि करोड़ों युवाओं की टूटती उम्मीदों का हिसाब कौन देगा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार युवाओं को भारत की सबसे बड़ी ताकत बताते हैं। परंतु सच्चाई यह है कि आज वही युवा सबसे अधिक असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जिस राष्ट्र का विद्यार्थी अपनी मेहनत के परिणाम पर भरोसा न कर सके, वह राष्ट्र केवल आर्थिक महाशक्ति बनने के दावे कर सकता है, नैतिक महाशक्ति नहीं।
राष्ट्रध्वज का अपमान केवल किसी कपड़े को जलाने से नहीं होता।
राष्ट्रध्वज का सबसे बड़ा अपमान तब होता है जब उसी राष्ट्र के बच्चों के सपनों को व्यवस्था कुचल देती है।
जब मेहनत हार जाती है और लापरवाही जीत जाती है। जब ईमानदार छात्र अवसाद में चला जाता है और तंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस करके माफी मांगकर बच निकलता है। अब समय केवल “जांच” का नहीं, कठोर निर्णय का है।
देश के शिक्षा तंत्र में जवाबदेही तय करनी होगी।सीबीएसई जैसी संस्थाओं को राजनीतिक प्रचार का मंच नहीं, राष्ट्रनिर्माण का केंद्र बनाना होगा। और यदि वर्तमान नेतृत्व यह करने में असफल है, तो देश को ऐसे शिक्षा मंत्री की आवश्यकता है जो छात्रों के भविष्य को फाइलों की औपचारिकता नहीं, राष्ट्र की धरोहर समझे।
देश का युवा अब केवल नौकरी नहीं मांग रहा —वह न्याय मांग रहा है।वह भरोसा मांग रहा है। वह यह आश्वासन मांग रहा है कि उसकी मेहनत किसी भ्रष्ट और लापरवाह तंत्र की भेंट नहीं चढ़ेगी। क्योंकि यदि युवाओं का विश्वास टूट गया, तो केवल एक परीक्षा व्यवस्था नहीं टूटेगी —भारत का भविष्य टूट जाएगा। और तब इतिहास यह प्रश्न अवश्य पूछेगा —
“आख़िर कितने विद्यार्थियों का भविष्य कुचला गया, तब जाकर सत्ता की नींद टूटी?”
अत्यंत महत्वपूर्ण और सामयिक लेख
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