लोकतंत्र का कुरुक्षेत्र और गीता का शाश्वत संदेश
प्रथम अध्याय के श्लोक 3 से 6 का सामाजिक-राजनीतिक विमर्श
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।। ३ ।। अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
श्रीमद्भगवद्गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं है; वह भारतीय चिंतन की वह धुरी है जहाँ अध्यात्म, राजनीति, समाजशास्त्र, नैतिकता और मानव मनोविज्ञान एक साथ उपस्थित होते हैं। सामान्यतः गीता को आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग माना जाता है, किंतु उसके प्रथम अध्याय के प्रारंभिक श्लोकों में ही सत्ता, संगठन, राष्ट्रचिंतन और सामाजिक संघर्ष का जो दर्शन मिलता है, वह आज के लोकतांत्रिक युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है। प्रथम अध्याय के तीसरे से छठे श्लोक तक दुर्योधन द्वारा पांडव सेना का वर्णन केवल युद्धपूर्व सूचना नहीं है; वह सत्ता के भय, विपक्ष की शक्ति, सामाजिक गठबंधनों और युवाशक्ति के उभार का गहन राजनीतिक विश्लेषण है। यदि इन श्लोकों को आधुनिक भारत के संदर्भ में पढ़ा जाए, तो प्रतीत होता है कि गीता केवल अतीत नहीं कह रही, बल्कि वर्तमान भारत के लोकतांत्रिक संघर्षों का भी सूक्ष्म चित्रण कर रही है।
सत्ता का पहला भय : विचार से उत्पन्न प्रतिरोध#तीसरे श्लोक में दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य से कहता है—“देखिए पांडुपुत्रों की इस विशाल सेना को, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य ने व्यवस्थित किया है।” यहाँ दुर्योधन केवल सेना नहीं देख रहा; वह उस विचार को देख रहा है जो उसकी सत्ता के विरुद्ध खड़ा है।और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह विचार उसी शिक्षा-व्यवस्था से निकला है, जिसे उसके पक्ष ने निर्मित किया था। इतिहास साक्षी है कि हर युग में सत्ता ने शिक्षा को नियंत्रित करने का प्रयास किया है। राजाओं ने गुरुकुलों को, साम्राज्यों ने विश्वविद्यालयों को और आधुनिक शासन ने संस्थानों को प्रभावित करने की कोशिश की।क्योंकि सत्ता जानती है कि तलवार से बड़ा अस्त्र विचार होता है।लेकिन ज्ञान का स्वभाव स्वतंत्र होता है।वह किसी राजसिंहासन का स्थायी सेवक नहीं बनता।इसीलिए कभी स्वामी विवेकानंद युवा चेतना को झकझोरते हैं, कभी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक गीता को कर्मयोग का घोष बनाते हैं, तो कभी महात्मा गांधी उसी गीता में अहिंसा और आत्मबल का दर्शन खोजते हैं।दुर्योधन का भय आज भी जीवित है।जब छात्र प्रश्न पूछते हैं, जब पत्रकार सत्ता से जवाब मांगते हैं, जब समाज का जागृत वर्ग अन्याय पर आवाज उठाता है—तब हर निरंकुश प्रवृत्ति असहज हो उठती है।गीता का यह श्लोक स्पष्ट करता है—“विचार जब संगठित हो जाता है, तब वह सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन जाता है।”
विपक्ष का सम्मान : लोकतंत्र की आत्मा#चौथे श्लोक में दुर्योधन पांडव सेना के प्रमुख योद्धाओं की शक्ति स्वीकार करता है।वह उन्हें तुच्छ नहीं बताता।वह जानता है कि युद्ध में वही विजयी होता है जो प्रतिद्वंद्वी का सही मूल्यांकन करता है।आज की राजनीति में यह गुण दुर्लभ होता जा रहा है।लोकतंत्र में असहमति को शत्रुता में बदल देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।राजनीतिक दल विपक्ष को राष्ट्रविरोधी सिद्ध करने में ऊर्जा लगाते हैं, जबकि लोकतंत्र का मूल स्वभाव संवाद है।महाभारत सिखाता है कि विपक्ष का अस्तित्व राष्ट्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि संतुलन की आवश्यकता है।जहाँ विरोध समाप्त हो जाता है, वहाँ तानाशाही जन्म लेती है।जहाँ प्रश्न पूछना अपराध बना दिया जाता है, वहाँ लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित रह जाता है।
आज संसद से लेकर सोशल मीडिया तक जो वैचारिक युद्ध दिखाई देता है, उसका कारण केवल मतभेद नहीं, बल्कि संवादहीनता है।हर पक्ष स्वयं को पूर्ण सत्य मान बैठा है।परंतु गीता का संदेश है—“पूर्ण सत्य किसी एक व्यक्ति, दल या सत्ता के पास नहीं होता।”इसीलिए भारतीय परंपरा ने “वाद-विवाद” को संस्कृति बनाया।उपनिषदों में प्रश्न हैं, बुद्ध में प्रश्न हैं, शंकर में प्रश्न हैं, कबीर में प्रश्न हैं।प्रश्न भारतीयता का शत्रु नहीं, उसका प्राण हैं।गठबंधन राजनीति और सामाजिक यथार्थपाँचवें श्लोक में विभिन्न राजाओं और शक्तियों का उल्लेख है।यह केवल योद्धाओं की सूची नहीं, बल्कि उस युग की राजनीतिक-सामाजिक संरचना का संकेत है।महाभारत का युद्ध वस्तुतः एक व्यापक गठबंधन राजनीति का युद्ध था।कई छोटे-बड़े राज्य, विविध स्वार्थ, अलग-अलग निष्ठाएँ—सब मिलकर एक बड़े संघर्ष का हिस्सा बने।आज का भारत भी इसी सामाजिक विविधता का राष्ट्र है।भाषाएँ अलग, जातियाँ अलग, क्षेत्र अलग, विचार अलग—फिर भी एक राष्ट्र।यही भारत की शक्ति है और यही चुनौती भी।लोकतंत्र में गठबंधन केवल चुनावी गणित नहीं होना चाहिए।यदि गठबंधन केवल सत्ता पाने का माध्यम बन जाए, तो वह अवसरवाद बन जाता है।लेकिन यदि उसका आधार सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय हित और सांस्कृतिक संतुलन हो, तो वही राष्ट्र निर्माण करता है।गीता यहाँ एक गहरा संदेश देती है“समाज की विविध शक्तियों को साथ लेकर चलना ही स्थायी राजनीति है।”जो राजनीति समाज को लगातार विभाजित करती है, वह अंततः स्वयं भी विघटित हो जाती है।
अभिमन्यु और आधुनिक युवा#छठे श्लोक में अभिमन्यु तथा द्रौपदीपुत्रों का उल्लेख केवल युद्धक शक्ति का वर्णन नहीं है; वह आने वाली पीढ़ी के हस्तक्षेप का संकेत है।हर युग का निर्णायक संघर्ष युवा ही लड़ते हैं।स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक सामाजिक आंदोलनों तक इतिहास यही कहता है।लेकिन गीता युवाशक्ति के साथ एक चेतावनी भी देती है।अभिमन्यु वीर था, किंतु अधूरी जानकारी के साथ चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया।आज का युवा भी सूचना के महासागर में है, लेकिन विवेक के संकट में है।सोशल मीडिया ने उसे आवाज दी है, पर धैर्य नहीं।तकनीक ने उसे गति दी है, पर दिशा नहीं।राजनीति उसे नारा देती है, पर विचार कम देती है।आज के चक्रव्यूह हैं,डिजिटल प्रोपेगेंडा,धार्मिक उन्माद,जातीय ध्रुवीकरण,तात्कालिक लोकप्रियता,उपभोक्तावादी संस्कृतिऔर कृत्रिम राष्ट्रवाद का शोर!यदि युवा केवल उत्तेजना से संचालित होंगे, तो वे संघर्ष का साधन बनेंगे;लेकिन यदि वे विवेक से संचालित होंगे, तो वे राष्ट्र का भविष्य बनेंगे।
गीता का राष्ट्रदर्शन#महाभारत का संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं, गहराई से राष्ट्रीय भी है।गीता का धर्म किसी संप्रदाय की सीमित अवधारणा नहीं है।यहाँ “धर्म” का अर्थ है,न्याय, संतुलन, उत्तरदायित्व और लोककल्याण।इसीलिए कुरुक्षेत्र केवल युद्धभूमि नहीं, वह हर युग का नैतिक परीक्षण है।आज भी भारत अनेक कुरुक्षेत्रों से गुजर रहा है-राजनीति में नैतिकता बनाम सत्ता,समाज में संवाद बनाम विभाजन,शिक्षा में विवेक बनाम प्रचार,और युवाओं में विचार बनाम भीड़ मानसिकता।गीता हमें स्मरण कराती है कि राष्ट्र केवल आर्थिक विकास से महान नहीं होता।राष्ट्र तब महान होता है जब उसकी राजनीति में मर्यादा, समाज में समरसता और नागरिकों में आत्मबोध जीवित हो।
भारत को फिर गीता पढ़नी होगी#आज भारत तकनीकी रूप से आधुनिक हो रहा है, लेकिन वैचारिक रूप से बेचैन भी हो रहा है।सूचनाएँ बढ़ रही हैं, किंतु आत्मसंवाद घट रहा है।राजनीतिक शोर बढ़ रहा है, किंतु नैतिकता का स्वर कमजोर हो रहा है।ऐसे समय में गीता का प्रथम अध्याय हमें चेतावनी देता है कि हर युद्ध तलवार से पहले विचार में जन्म लेता है।समाज पहले मन से टूटता है, बाद में भूगोल से।इसलिए भारत को केवल गीता का पाठ नहीं, गीता का बोध चाहिए।क्योंकि गीता हमें यह नहीं सिखाती कि विरोधी को कैसे हराया जाए;वह यह सिखाती है कि स्वयं को कैसे साधा जाए।और जिस राष्ट्र ने स्वयं को साध लिया, उसे पराजित करना इतिहास के लिए भी संभव नहीं होता।
राजेंद्र नाथ तिवारी गीता पर व्याख्या क्रमशः

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