जातीय विषवमन की राजनीति और भारत की आत्मा—-समाज को बाँटने वालों से राष्ट्र का प्रश्न
“भारत” केवल एक भूभाग नहीं है। यह हजारों वर्षों की तपश्चर्या, ज्ञान, त्याग, संघर्ष और समरसता की चेतना का नाम है। यहाँ समाज का निर्माण संघर्ष से नहीं, संवाद से हुआ। यहाँ शास्त्रार्थ हुए, पर समाज को जलाने वाले युद्ध नहीं। यहाँ मतभेद हुए, परंतु मनभेद को संस्कृति नहीं बनाया गया। यही कारण है कि भारत आज भी जीवित है, जबकि दुनिया की अनेक सभ्यताएँ इतिहास के पन्नों में दफन हो चुकी हैं। किन्तु आज का समय विचित्र है। राजनीति और सोशल मीडिया के शोर में कुछ लोग जातीय विद्वेष को ही नेतृत्व का प्रमाणपत्र मान बैठे हैं। किसी समाज के विरुद्ध कटुता उगलना, अपमानजनक भाषा बोलना और फिर उसे “सामाजिक न्याय” का नाम देना - यह प्रवृत्ति न केवल लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा पर भी हमला है।
जब कोई सार्वजनिक व्यक्ति ब्राह्मण समाज, वैश्य समाज या किसी भी वर्ग के प्रति अपमानजनक टिप्पणी करता है, तब प्रश्न केवल उस समाज का नहीं रह जाता; प्रश्न भारत की सामाजिक एकता का हो जाता है। आखिर यह मानसिकता क्या चाहती है? क्या समाज को टुकड़ों में बाँटकर राजनीतिक लाभ लेना ही अब राजनीति का अंतिम उद्देश्य रह गया है?
ब्राह्मण विरोध या भारत की ज्ञान परंपरा पर प्रहार? ब्राह्मण शब्द केवल एक जाति का नाम नहीं; वह भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रतीक भी है। वेदों की ऋचाएँ, उपनिषदों का दर्शन, रामायण और महाभारत का चिंतन, गीता का अमर संदेश, चाणक्य की राजनीति, शंकराचार्य का अद्वैत, तुलसी की भक्ति, विवेकानंद का आत्मविश्वास - इन सबमें भारत की वह चेतना दिखाई देती है जिसने विश्व को दिशा दी।क्या इस परंपरा में दोष नहीं थे? अवश्य थे। हर युग में सामाजिक विकृतियाँ रही हैं। परंतु किसी व्यवस्था की आलोचना और किसी पूरे समाज के अपमान में अंतर होता है। यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि पूरे ब्राह्मण समाज को गाली देकर वह सामाजिक क्रांति कर देगा, तो वह इतिहास और समाज दोनों को समझने में असफल है। भारत का इतिहास केवल संघर्ष का इतिहास नहीं; आत्मसुधार का इतिहास भी है। इसी समाज में बुद्ध हुए, कबीर हुए, रविदास हुए, दयानंद हुए, गांधी हुए। भारत ने भीतर से स्वयं को सुधारा है। लेकिन आज कुछ लोग सुधार नहीं, प्रतिशोध की राजनीति कर रहे हैं। वे समाधान नहीं चाहते; उन्हें केवल समाज में स्थायी विभाजन चाहिए।
राजनीति की नई प्रयोगशाला — जातीय उन्माद-आज की राजनीति में एक नया ट्रेंड पैदा हुआ है — “जितना उग्र बयान, उतनी अधिक लोकप्रियता।”
सोशल मीडिया की भीड़ तालियाँ बजाती है, ट्रोल सेना जयकार करती है, और कुछ नेता स्वयं को क्रांतिकारी समझने लगते हैं।किन्तु यह क्रांति नहीं; यह सामाजिक अराजकता है।किसी भी समाज के विरुद्ध लगातार जहर उगलना अंततः राष्ट्र को कमजोर करता है। जब समाज एक-दूसरे को शत्रु की दृष्टि से देखने लगे, तब बाहरी शक्तियों को भारत को तोड़ने में अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती।राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ऐसे ही समय के लिए लिखा था —
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”
दिनकर की यह चेतावनी केवल युद्ध के लिए नहीं थी; यह समाज के हर उस क्षण के लिए थी जब सत्य पर आक्रमण हो और सज्जन मौन बने रहें। यदि समाज को तोड़ने वाली भाषा पर बुद्धिजीवी मौन रहेंगे, तो इतिहास उनका भी न्याय करेगा।
जाति नहीं, राष्ट्र सर्वोपरि भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। यहाँ ब्राह्मण भी भारत है, दलित भी भारत है, वैश्य भी भारत है, किसान भी भारत है, सैनिक भी भारत है। किसी एक वर्ग को खलनायक बनाकर राष्ट्र निर्माण नहीं हो सकता।
दुर्भाग्य यह है कि कुछ लोगों ने जातीय संघर्ष को ही अपनी राजनीति की ऑक्सीजन बना लिया है। उन्हें विकास पर बात करने में कठिनाई होती है, इसलिए वे समाज को भावनात्मक रूप से बाँटते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सीमा सुरक्षा, भ्रष्टाचार — इन विषयों पर मौन रहने वाले लोग जातीय उत्तेजना पर सबसे अधिक मुखर दिखाई देते हैं।यह वही राजनीति है जिसके बारे में दिनकर ने लिखा था —“शक्ति नहीं तब तक,जब तक भाग न सबका सम हो,नहीं किसी को बहुत अधिक हो,नहीं किसी को कम हो।”दिनकर समरसता के कवि थे। वे संघर्ष के भी कवि थे, परंतु उनका संघर्ष समाज को तोड़ने के लिए नहीं, अन्याय को समाप्त करने के लिए था। आज जो लोग जातीय घृणा को “क्रांति” कहते हैं, वे दिनकर की आत्मा को भी समझने में असफल हैं।
सामाजिक न्याय बनाम सामाजिक प्रतिशोध-भारत में सामाजिक न्याय की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। सदियों की असमानताओं को दूर करना आवश्यक है। लेकिन सामाजिक न्याय का अर्थ किसी दूसरे समाज के प्रति नफरत फैलाना नहीं होता।यदि कोई कहे कि एक समाज के सम्मान को कुचलकर दूसरे समाज का उत्थान होगा, तो यह न्याय नहीं, प्रतिशोध है। प्रतिशोध कभी राष्ट्र निर्माण नहीं कर सकता।डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान दिया। उन्होंने संघर्ष किया, परंतु उन्होंने भी राष्ट्र को तोड़ने की भाषा नहीं अपनाई। वे जानते थे कि भारत की शक्ति सामाजिक समरसता में है। उन्होंने चेताया था कि यदि राजनीतिक समानता के साथ सामाजिक समरसता नहीं आई, तो लोकतंत्र संकट में पड़ जाएगा।
आज आवश्यकता इसी समरसता की है।न कि जातीय युद्ध की।ब्राह्मण समाज का योगदान — एक ऐतिहासिक सत्य किसी समाज की आलोचना करने से पहले उसके योगदान को भी देखना चाहिए।गुरुकुल परंपरा किसने जीवित रखी?
वेद, पुराण, दर्शन और शास्त्रों को किसने संरक्षित किया? स्वतंत्रता आंदोलन में कितने ब्राह्मणों ने बलिदान दिया?शिक्षा और राष्ट्रचेतना के क्षेत्र में कितने विद्वानों ने समाज का मार्गदर्शन किया? इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य समाजों का योगदान कम है। भारत सबका है। परंतु किसी एक वर्ग को लगातार अपमानित करना ऐतिहासिक अन्याय है।वैश्य समाज को देखिए — भारत की अर्थव्यवस्था, व्यापार, दान, धर्मशालाएँ, गौशालाएँ, सामाजिक सेवा — इन सबमें उनका योगदान अमूल्य रहा है। यदि कोई इन समाजों के विरुद्ध केवल राजनीतिक लाभ के लिए विषवमन करता है, तो उसका विरोध होना ही चाहिए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक जिम्मेदारी
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आवश्यक है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता नहीं होता।यदि कोई व्यक्ति किसी समाज के विरुद्ध भड़काऊ भाषा बोलता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि उसके शब्द समाज में तनाव पैदा कर सकते हैं। नेता और सार्वजनिक व्यक्ति केवल व्यक्ति नहीं होते; वे जनमानस को प्रभावित करते हैं।इसलिए जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है।
दिनकर ने लिखा था —“क्षमा शोभती उस भुजंग को dजिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन,विषरहित, विनीत, सरल हो।”
यह कविता केवल शक्ति की नहीं, आत्मसम्मान की भी कविता है। समाज को यह समझना होगा कि सहिष्णुता का अर्थ कायरता नहीं। यदि कोई लगातार समाज को अपमानित करेगा, तो वैचारिक प्रतिरोध अवश्य होगा।
सोशल मीडिया का विष-,आज सोशल मीडिया ने संवाद को शोर में बदल दिया है।
एक बयान, एक वीडियो, एक पोस्ट — और पूरा समाज उन्माद में धकेल दिया जाता है।सबसे दुखद यह है कि अब “वायरल” होना ही सत्य माना जाने लगा है। जितनी अधिक गाली, उतनी अधिक लोकप्रियता। जितना अधिक जातीय उन्माद, उतनी अधिक राजनीतिक दृश्यता।
यह लोकतंत्र का पतन है।
पत्रकारिता का धर्म समाज को दिशा देना है, न कि समाज को लड़ाना। यदि मीडिया और सोशल मीडिया केवल उत्तेजना बेचेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ संवाद की भाषा भूल जाएँगी।भारत को क्या चाहिए?भारत को जातीय युद्ध नहीं चाहिए।
भारत को चाहिए -शिक्षा,रोजगार,सांस्कृतिक आत्मविश्वास,राष्ट्रीय
एकता,सामाजिक समरसता,मजबूत लोकतंत्र लेकिन जब नेता और कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी समाज को बाँटने में व्यस्त होंगे, तब राष्ट्र की ऊर्जा नष्ट होगी।भारत की सभ्यता “वसुधैव कुटुम्बकम्” कहती है। यहाँ विरोध भी मर्यादा के भीतर होता था। आज आवश्यकता उसी मर्यादा को पुनर्जीवित करने की है।
राष्ट्रवाद की सही परिभाषा राष्ट्रवाद का अर्थ किसी एक जाति का महिमामंडन नहीं। राष्ट्रवाद का अर्थ है — भारत की एकता, संस्कृति, संविधान और सभ्यता के प्रति निष्ठा।
जो समाज को तोड़ता है, वह राष्ट्रवादी नहीं हो सकता।
जो जातीय जहर फैलाता है, वह सामाजिक न्याय का योद्धा नहीं हो सकता।
जो केवल नफरत पर राजनीति करता है, वह नेतृत्व के योग्य नहीं हो सकता।
निष्कर्ष — भारत संवाद से चलेगा, विद्वेष से नहीं आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक रास्ता वह है जहाँ जातीय घृणा, सोशल मीडिया का उन्माद और राजनीतिक विषवमन समाज को खंडित कर देगा। दूसरा रास्ता वह है जहाँ संवाद, समरसता और राष्ट्रहित सर्वोपरि होंगे।निर्णय समाज को करना है।
दिनकर की पंक्तियाँ आज भी मार्गदर्शन देती हैं —“मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।”यदि भारत का समाज ठान ले कि वह जातीय राजनीति से ऊपर उठेगा, तो कोई शक्ति उसे विभाजित नहीं कर सकती।भारत की आत्मा किसी एक जाति में नहीं बसती।भारत की आत्मा उसकी समरसता में बसती है।
और जो इस समरसता पर प्रहार करेगा, इतिहास उसे कभी क्षमा नहीं करेगा।
जब कोई सार्वजनिक व्यक्ति ब्राह्मण समाज, वैश्य समाज या किसी भी वर्ग के प्रति अपमानजनक टिप्पणी करता है, तब प्रश्न केवल उस समाज का नहीं रह जाता; प्रश्न भारत की सामाजिक एकता का हो जाता है। आखिर यह मानसिकता क्या चाहती है? क्या समाज को टुकड़ों में बाँटकर राजनीतिक लाभ लेना ही अब राजनीति का अंतिम उद्देश्य रह गया है?
ब्राह्मण विरोध या भारत की ज्ञान परंपरा पर प्रहार? ब्राह्मण शब्द केवल एक जाति का नाम नहीं; वह भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रतीक भी है। वेदों की ऋचाएँ, उपनिषदों का दर्शन, रामायण और महाभारत का चिंतन, गीता का अमर संदेश, चाणक्य की राजनीति, शंकराचार्य का अद्वैत, तुलसी की भक्ति, विवेकानंद का आत्मविश्वास - इन सबमें भारत की वह चेतना दिखाई देती है जिसने विश्व को दिशा दी।क्या इस परंपरा में दोष नहीं थे? अवश्य थे। हर युग में सामाजिक विकृतियाँ रही हैं। परंतु किसी व्यवस्था की आलोचना और किसी पूरे समाज के अपमान में अंतर होता है। यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि पूरे ब्राह्मण समाज को गाली देकर वह सामाजिक क्रांति कर देगा, तो वह इतिहास और समाज दोनों को समझने में असफल है। भारत का इतिहास केवल संघर्ष का इतिहास नहीं; आत्मसुधार का इतिहास भी है। इसी समाज में बुद्ध हुए, कबीर हुए, रविदास हुए, दयानंद हुए, गांधी हुए। भारत ने भीतर से स्वयं को सुधारा है। लेकिन आज कुछ लोग सुधार नहीं, प्रतिशोध की राजनीति कर रहे हैं। वे समाधान नहीं चाहते; उन्हें केवल समाज में स्थायी विभाजन चाहिए।
राजनीति की नई प्रयोगशाला — जातीय उन्माद-आज की राजनीति में एक नया ट्रेंड पैदा हुआ है — “जितना उग्र बयान, उतनी अधिक लोकप्रियता।”
सोशल मीडिया की भीड़ तालियाँ बजाती है, ट्रोल सेना जयकार करती है, और कुछ नेता स्वयं को क्रांतिकारी समझने लगते हैं।किन्तु यह क्रांति नहीं; यह सामाजिक अराजकता है।किसी भी समाज के विरुद्ध लगातार जहर उगलना अंततः राष्ट्र को कमजोर करता है। जब समाज एक-दूसरे को शत्रु की दृष्टि से देखने लगे, तब बाहरी शक्तियों को भारत को तोड़ने में अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती।राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने ऐसे ही समय के लिए लिखा था —
“समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।”
दिनकर की यह चेतावनी केवल युद्ध के लिए नहीं थी; यह समाज के हर उस क्षण के लिए थी जब सत्य पर आक्रमण हो और सज्जन मौन बने रहें। यदि समाज को तोड़ने वाली भाषा पर बुद्धिजीवी मौन रहेंगे, तो इतिहास उनका भी न्याय करेगा।
जाति नहीं, राष्ट्र सर्वोपरि भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। यहाँ ब्राह्मण भी भारत है, दलित भी भारत है, वैश्य भी भारत है, किसान भी भारत है, सैनिक भी भारत है। किसी एक वर्ग को खलनायक बनाकर राष्ट्र निर्माण नहीं हो सकता।
दुर्भाग्य यह है कि कुछ लोगों ने जातीय संघर्ष को ही अपनी राजनीति की ऑक्सीजन बना लिया है। उन्हें विकास पर बात करने में कठिनाई होती है, इसलिए वे समाज को भावनात्मक रूप से बाँटते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सीमा सुरक्षा, भ्रष्टाचार — इन विषयों पर मौन रहने वाले लोग जातीय उत्तेजना पर सबसे अधिक मुखर दिखाई देते हैं।यह वही राजनीति है जिसके बारे में दिनकर ने लिखा था —“शक्ति नहीं तब तक,जब तक भाग न सबका सम हो,नहीं किसी को बहुत अधिक हो,नहीं किसी को कम हो।”दिनकर समरसता के कवि थे। वे संघर्ष के भी कवि थे, परंतु उनका संघर्ष समाज को तोड़ने के लिए नहीं, अन्याय को समाप्त करने के लिए था। आज जो लोग जातीय घृणा को “क्रांति” कहते हैं, वे दिनकर की आत्मा को भी समझने में असफल हैं।
सामाजिक न्याय बनाम सामाजिक प्रतिशोध-भारत में सामाजिक न्याय की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता। सदियों की असमानताओं को दूर करना आवश्यक है। लेकिन सामाजिक न्याय का अर्थ किसी दूसरे समाज के प्रति नफरत फैलाना नहीं होता।यदि कोई कहे कि एक समाज के सम्मान को कुचलकर दूसरे समाज का उत्थान होगा, तो यह न्याय नहीं, प्रतिशोध है। प्रतिशोध कभी राष्ट्र निर्माण नहीं कर सकता।डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान दिया। उन्होंने संघर्ष किया, परंतु उन्होंने भी राष्ट्र को तोड़ने की भाषा नहीं अपनाई। वे जानते थे कि भारत की शक्ति सामाजिक समरसता में है। उन्होंने चेताया था कि यदि राजनीतिक समानता के साथ सामाजिक समरसता नहीं आई, तो लोकतंत्र संकट में पड़ जाएगा।
आज आवश्यकता इसी समरसता की है।न कि जातीय युद्ध की।ब्राह्मण समाज का योगदान — एक ऐतिहासिक सत्य किसी समाज की आलोचना करने से पहले उसके योगदान को भी देखना चाहिए।गुरुकुल परंपरा किसने जीवित रखी?
वेद, पुराण, दर्शन और शास्त्रों को किसने संरक्षित किया? स्वतंत्रता आंदोलन में कितने ब्राह्मणों ने बलिदान दिया?शिक्षा और राष्ट्रचेतना के क्षेत्र में कितने विद्वानों ने समाज का मार्गदर्शन किया? इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य समाजों का योगदान कम है। भारत सबका है। परंतु किसी एक वर्ग को लगातार अपमानित करना ऐतिहासिक अन्याय है।वैश्य समाज को देखिए — भारत की अर्थव्यवस्था, व्यापार, दान, धर्मशालाएँ, गौशालाएँ, सामाजिक सेवा — इन सबमें उनका योगदान अमूल्य रहा है। यदि कोई इन समाजों के विरुद्ध केवल राजनीतिक लाभ के लिए विषवमन करता है, तो उसका विरोध होना ही चाहिए।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक जिम्मेदारी
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आवश्यक है। लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता नहीं होता।यदि कोई व्यक्ति किसी समाज के विरुद्ध भड़काऊ भाषा बोलता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि उसके शब्द समाज में तनाव पैदा कर सकते हैं। नेता और सार्वजनिक व्यक्ति केवल व्यक्ति नहीं होते; वे जनमानस को प्रभावित करते हैं।इसलिए जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है।
दिनकर ने लिखा था —“क्षमा शोभती उस भुजंग को dजिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन,विषरहित, विनीत, सरल हो।”
यह कविता केवल शक्ति की नहीं, आत्मसम्मान की भी कविता है। समाज को यह समझना होगा कि सहिष्णुता का अर्थ कायरता नहीं। यदि कोई लगातार समाज को अपमानित करेगा, तो वैचारिक प्रतिरोध अवश्य होगा।
सोशल मीडिया का विष-,आज सोशल मीडिया ने संवाद को शोर में बदल दिया है।
एक बयान, एक वीडियो, एक पोस्ट — और पूरा समाज उन्माद में धकेल दिया जाता है।सबसे दुखद यह है कि अब “वायरल” होना ही सत्य माना जाने लगा है। जितनी अधिक गाली, उतनी अधिक लोकप्रियता। जितना अधिक जातीय उन्माद, उतनी अधिक राजनीतिक दृश्यता।
यह लोकतंत्र का पतन है।
पत्रकारिता का धर्म समाज को दिशा देना है, न कि समाज को लड़ाना। यदि मीडिया और सोशल मीडिया केवल उत्तेजना बेचेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ संवाद की भाषा भूल जाएँगी।भारत को क्या चाहिए?भारत को जातीय युद्ध नहीं चाहिए।
भारत को चाहिए -शिक्षा,रोजगार,सांस्कृतिक आत्मविश्वास,राष्ट्रीय
एकता,सामाजिक समरसता,मजबूत लोकतंत्र लेकिन जब नेता और कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी समाज को बाँटने में व्यस्त होंगे, तब राष्ट्र की ऊर्जा नष्ट होगी।भारत की सभ्यता “वसुधैव कुटुम्बकम्” कहती है। यहाँ विरोध भी मर्यादा के भीतर होता था। आज आवश्यकता उसी मर्यादा को पुनर्जीवित करने की है।
राष्ट्रवाद की सही परिभाषा राष्ट्रवाद का अर्थ किसी एक जाति का महिमामंडन नहीं। राष्ट्रवाद का अर्थ है — भारत की एकता, संस्कृति, संविधान और सभ्यता के प्रति निष्ठा।
जो समाज को तोड़ता है, वह राष्ट्रवादी नहीं हो सकता।
जो जातीय जहर फैलाता है, वह सामाजिक न्याय का योद्धा नहीं हो सकता।
जो केवल नफरत पर राजनीति करता है, वह नेतृत्व के योग्य नहीं हो सकता।
निष्कर्ष — भारत संवाद से चलेगा, विद्वेष से नहीं आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक रास्ता वह है जहाँ जातीय घृणा, सोशल मीडिया का उन्माद और राजनीतिक विषवमन समाज को खंडित कर देगा। दूसरा रास्ता वह है जहाँ संवाद, समरसता और राष्ट्रहित सर्वोपरि होंगे।निर्णय समाज को करना है।
दिनकर की पंक्तियाँ आज भी मार्गदर्शन देती हैं —“मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।”यदि भारत का समाज ठान ले कि वह जातीय राजनीति से ऊपर उठेगा, तो कोई शक्ति उसे विभाजित नहीं कर सकती।भारत की आत्मा किसी एक जाति में नहीं बसती।भारत की आत्मा उसकी समरसता में बसती है।
और जो इस समरसता पर प्रहार करेगा, इतिहास उसे कभी क्षमा नहीं करेगा।

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