लखनऊ, मनोज श्रीवास्तव
उत्तर प्रदेश में आई आंधी, तूफान और बारिश ने केवल पेड़, खंभे और मकान ही नहीं गिराए, बल्कि अनेक परिवारों के सपनों को भी मलबे में बदल दिया। बीते 24 घंटों में 70 से अधिक लोगों की मौत की खबर ने पूरे प्रदेश को स्तब्ध कर दिया है। कहीं बिजली ने खेत से लौटते किसान को छीन लिया, कहीं गिरती दीवार ने मासूम बच्चों को निगल लिया, तो कहीं तेज तूफानी हवा ने घर का सहारा ही समाप्त कर दिया।
प्रयागराज, भदोही, फतेहपुर, मिर्जापुर, उन्नाव, बदायूं, सीतापुर और अन्य जिलों से आती खबरें केवल आंकड़े नहीं हैं — वे उन घरों की करुण पुकार हैं, जहां अब चूल्हा तो जलेगा, पर साथ बैठने वाला अपना नहीं होगा। जिन हाथों ने कल तक परिवार के लिए रोटी कमाई, आज वही हाथ पंचतत्व में विलीन हो गए।
सबसे पीड़ादायक यह है कि इन मौतों में अधिकांश गरीब, किसान, मजदूर और ग्रामीण परिवारों से जुड़े लोग हैं — वे लोग जिनके पास मजबूत छत नहीं, सुरक्षित आश्रय नहीं और आपदा से बचने के पर्याप्त साधन भी नहीं। प्रकृति जब क्रोधित होती है, तब सबसे पहले वही वर्ग कुचला जाता है जो पहले से ही संघर्ष में जी रहा होता है।
आज आवश्यकता केवल मुआवजे की घोषणा की नहीं, बल्कि संवेदना की है। प्रशासन को राहत पहुँचानी चाहिए, समाज को सहारा बनना चाहिए और हम सबको यह समझना चाहिए कि किसी परिवार का एक सदस्य खोना केवल “एक संख्या” नहीं होता — वह पूरे घर की दुनिया उजड़ जाने जैसा होता है।
यह केवल मौसम नहीं, एक चेतावनी भी है
बदलता पर्यावरण, कटते वृक्ष, असंतुलित विकास और लगातार बढ़ती जलवायु अस्थिरता अब सीधे जनजीवन पर प्रहार कर रही है। यदि हमने प्रकृति के संकेतों को अभी भी नहीं समझा, तो आने वाले वर्षों में ऐसी त्रासदियां और भयावह हो सकती हैं।
ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति दे और शोकाकुल परिवारों को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति प्रदान करे।
कभी-कभी प्रकृति का एक तूफान केवल पेड़ नहीं गिराता, इंसान के भीतर की स्थिरता भी हिला देता है।
प्रयागराज, भदोही, फतेहपुर, मिर्जापुर, उन्नाव, बदायूं, सीतापुर और अन्य जिलों से आती खबरें केवल आंकड़े नहीं हैं — वे उन घरों की करुण पुकार हैं, जहां अब चूल्हा तो जलेगा, पर साथ बैठने वाला अपना नहीं होगा। जिन हाथों ने कल तक परिवार के लिए रोटी कमाई, आज वही हाथ पंचतत्व में विलीन हो गए।
सबसे पीड़ादायक यह है कि इन मौतों में अधिकांश गरीब, किसान, मजदूर और ग्रामीण परिवारों से जुड़े लोग हैं — वे लोग जिनके पास मजबूत छत नहीं, सुरक्षित आश्रय नहीं और आपदा से बचने के पर्याप्त साधन भी नहीं। प्रकृति जब क्रोधित होती है, तब सबसे पहले वही वर्ग कुचला जाता है जो पहले से ही संघर्ष में जी रहा होता है।
आज आवश्यकता केवल मुआवजे की घोषणा की नहीं, बल्कि संवेदना की है। प्रशासन को राहत पहुँचानी चाहिए, समाज को सहारा बनना चाहिए और हम सबको यह समझना चाहिए कि किसी परिवार का एक सदस्य खोना केवल “एक संख्या” नहीं होता — वह पूरे घर की दुनिया उजड़ जाने जैसा होता है।
यह केवल मौसम नहीं, एक चेतावनी भी है
बदलता पर्यावरण, कटते वृक्ष, असंतुलित विकास और लगातार बढ़ती जलवायु अस्थिरता अब सीधे जनजीवन पर प्रहार कर रही है। यदि हमने प्रकृति के संकेतों को अभी भी नहीं समझा, तो आने वाले वर्षों में ऐसी त्रासदियां और भयावह हो सकती हैं।
ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति दे और शोकाकुल परिवारों को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति प्रदान करे।
कभी-कभी प्रकृति का एक तूफान केवल पेड़ नहीं गिराता, इंसान के भीतर की स्थिरता भी हिला देता है।

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