“भारत पर भरोसा क्यों करें?” — नॉर्वे की पत्रकार के प्रश्न पर भारत का प्रहारक उत्तर और पश्चिमी मानसिकता की पराजय
ऋषि देव मिश्रा, राजनैतिक विश्लेषक
विदेश मंत्रालय की प्रेस वार्ता में जब नॉर्वे की एक पत्रकार ने भारत से मानवाधिकारों पर प्रश्न करते हुए लगभग चुनौतीपूर्ण स्वर में पूछा — “दुनिया भारत पर भरोसा क्यों करे?” — तब यह केवल एक पत्रकार का सवाल नहीं था। यह उस पश्चिमी मानसिकता का प्रतिबिंब था जो सदियों तक विश्व को नैतिकता का प्रमाणपत्र बाँटती रही और आज भी उभरते भारत को उसी दृष्टि से देखना चाहती है।लेकिन इस बार सामने 1950 का असहाय भारत नहीं था। यह 21वीं सदी का आत्मविश्वासी, सामरिक रूप से सशक्त और वैचारिक रूप से जाग्रत भारत था। विदेश मंत्रालय ने जिस स्पष्टता से उत्तर दिया, उसने केवल प्रश्न का जवाब नहीं दिया बल्कि पश्चिमी दंभ की धुरी पर सीधा प्रहार किया।
जिनके हाथ उपनिवेशवाद से रंगे हों, वे मानवाधिकार सिखाएँगे?यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि यूरोप, जिसने एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को सदियों तक गुलाम बनाकर उनका आर्थिक और सांस्कृतिक शोषण किया, वही आज मानवाधिकारों का सबसे बड़ा निर्णायक बनने का प्रयास करता है।क्या विश्व भूल गया है कि उपनिवेशवाद के नाम पर लाखों लोगों का नरसंहार हुआ? क्या इराक, लीबिया, सीरिया और अफगानिस्तान के विध्वंस मानवाधिकारों की रक्षा के उदाहरण थे? क्या यूरोप में शरणार्थियों के साथ होने वाला अमानवीय व्यवहार दुनिया नहीं देखती?
लेकिन जब बात इंडिया की आती है, तब पश्चिमी मीडिया और तथाकथित मानवाधिकार समूह अचानक अत्यधिक सक्रिय हो उठते हैं। कारण स्पष्ट है — भारत अब केवल एक विकासशील देश नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति बनने की ओर बढ़ता हुआ सभ्यतागत राष्ट्र है। और पश्चिम को सबसे अधिक असहजता उसी राष्ट्र से होती है जो उसकी वैचारिक एकाधिकारिता को चुनौती दे।
भारत अब कठघरे में खड़ा होने वाला राष्ट्र नहीं एक समय था जब भारत हर विदेशी टिप्पणी पर सफाई देता था। लेकिन अब भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र पर प्रमाणपत्र वह उनसे नहीं लेगा जिनका अपना इतिहास दमन, नस्लवाद और साम्राज्यवाद से भरा पड़ा है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ 140 करोड़ लोग विविधताओं के बीच एक संविधान के अंतर्गत जीते हैं। यहाँ सरकारें चुनाव से बनती और बदलती हैं। न्यायपालिका सरकार के विरुद्ध निर्णय देती है। मीडिया प्रतिदिन सत्ता की आलोचना करता है। सड़क से संसद तक विरोध की आवाजें उठती हैं। यही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है।यदि भारत में लोकतंत्र कमजोर होता, तो इतने तीखे राजनीतिक संघर्ष, खुली बहसें और सरकार विरोधी आंदोलन संभव ही नहीं होते।
मानवाधिकार या भू-राजनीतिक हथियार? आज मानवाधिकार का विमर्श कई बार नैतिकता से अधिक भू-राजनीति का उपकरण बन चुका है। जो देश पश्चिमी रणनीतिक हितों के साथ चलते हैं, उनके दोष “आंतरिक मामले” कहे जाते हैं; और जो स्वतंत्र विदेश नीति अपनाते हैं, उन्हें वैश्विक मंचों पर कठघरे में खड़ा किया जाता है।भारत की समस्या यह है कि वह न तो पश्चिम का उपनिवेश है और न ही किसी शक्ति-गुट का कठपुतली राष्ट्र। वह रूस से भी संबंध रखता है, अमेरिका से भी; वह ग्लोबल साउथ की आवाज भी बनता है और क्वाड का हिस्सा भी। यही स्वतंत्रता कई शक्तियों को असुविधाजनक लगती है।
इसलिए मानवाधिकारों के नाम पर भारत की छवि पर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास केवल नैतिक चिंता नहीं बल्कि वैचारिक और सामरिक दबाव की रणनीति भी है।भारत का उत्तर : आत्मविश्वास की घोषणाविदेश मंत्रालय का उत्तर इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उसमें हीनभावना नहीं थी। उसमें यह स्पष्ट संदेश था कि भारत अपने लोकतंत्र, संविधान और संस्थाओं पर पूर्ण विश्वास रखता है। भारत किसी विदेशी मीडिया की स्वीकृति से लोकतांत्रिक नहीं बनता।
भारत ने दुनिया को कोविड के समय वैक्सीन दी, युद्धकाल में भी मानवीय सहायता पहुँचाई, और वैश्विक दक्षिण के देशों की आवाज बनकर खड़ा हुआ। विश्व भारत पर इसलिए भरोसा करता है क्योंकि भारत विस्तारवाद नहीं करता, संसाधनों की लूट नहीं करता और वैश्विक मंच पर संतुलन की बात करता है।
नया भारत प्रश्न नहीं, उत्तर बन चुका है,नॉर्वे की पत्रकार का प्रश्न दरअसल उस पुरानी विश्व-व्यवस्था की बेचैनी थी जो भारत को अब भी उपदेश ग्रहण करने वाले राष्ट्र के रूप में देखना चाहती है। लेकिन भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि अब वह कठघरे में खड़ा होने वाला देश नहीं, बल्कि विश्व-राजनीति का निर्णायक ध्रुव है।आज का भारत विनम्र अवश्य है, पर वैचारिक रूप से नतमस्तक नहीं। वह संवाद करता है, लेकिन दबाव में नहीं झुकता। और यही पश्चिमी मानसिकता की सबसे बड़ी पराजय है।

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