रक्तबीज की वापसी, तटस्थ सत्ता और राष्ट्रचेतना का संकट
बस्ती, वशिष्ठ नगर, राजेंद्र नाथ तिवारी
भारतीय राजनीति का वर्तमान दौर केवल सत्ता और विपक्ष का संघर्ष नहीं है; यह राष्ट्रचेतना और राजनीतिक संस्कारों का भी निर्णायक संघर्ष है। एक ओर वह मानसिकता है जिसने कभी लोकतंत्र को अपनी जागीर समझा, संविधान को सत्ता का उपकरण बनाया और नागरिक स्वतंत्रताओं को कुचलने में संकोच नहीं किया; दूसरी ओर वह राष्ट्रवादी शक्ति है जिसे जनता ने इस विश्वास के साथ सत्ता सौंपी कि वह केवल सरकार नहीं बदलेगी, बल्कि राजनीतिक संस्कृति भी बदलेगी। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या सचमुच राजनीतिक संस्कृति बदली? या केवल चेहरे बदले और संघर्ष की भाषा बदल गई?
रक्तबीज : केवल व्यक्ति नहीं, सत्ता-संस्कार का प्रतीक है भारतीय पुराणों में रक्तबीज का अर्थ केवल एक दैत्य नहीं था; वह उस विनाशकारी प्रवृत्ति का प्रतीक था जो हर आघात के बाद और अधिक फैलती जाती थी। भारतीय राजनीति में भी एक ऐसा ही रक्तबीज दशकों से जीवित है —वंशवाद का रक्तबीज,राजनीतिक अहंकार का रक्तबीज,राष्ट्र से ऊपर परिवार को रखने का रक्तबीज,और लोकतंत्र को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम मानने का रक्तबीज।
25 जून 1975 उसी रक्तबीज का सबसे भयावह विस्फोट था।
उस रात भारत ने देखा कि कैसे एक निर्वाचित सत्ता लोकतंत्र की हत्यारी बन सकती है। समाचारपत्रों की स्याही सरकारी अनुमति की दासी बन गई। न्यायपालिका भयग्रस्त थी। संसद औपचारिकता में बदल गई थी। लाखों कार्यकर्ता जेलों में थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध था। और तब सत्ता यह कह रही थी —“अनुशासन पर्व चल रहा है।”वास्तव में वह अनुशासन नहीं, लोकतंत्र की शवयात्रा थी।
संपूर्ण क्रांति : जनशक्ति का विस्फोट,जब सत्ता अहंकार में अंधी हो जाती है, तब इतिहास जनचेतना को जन्म देता है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उसी जनचेतना को “संपूर्ण क्रांति” का नाम दिया।वह आंदोलन केवल इंदिरा विरोध नहीं था। वह भारतीय राजनीति की आत्मा को पुनर्जीवित करने का प्रयास था। विद्यार्थी सड़क पर थे। युवा जेलों में थे। संघ के स्वयंसेवक भूमिगत नेटवर्क चला रहे थे। समाजवादी, राष्ट्रवादी, गांधीवादी — सब एक मंच पर खड़े थे।1977 में जनता ने सत्ता बदल दी। लेकिन यहीं भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी शुरू हुई।
जनता पार्टी : आदर्शों की पराजय,जनता पार्टी के पास अवसर था कि वह भारत की राजनीति को वैचारिक रूप से शुद्ध करती। आपातकाल को राष्ट्रीय अपराध घोषित करती। लोकतंत्र विरोधी प्रवृत्तियों को कठोर राजनीतिक दंड देती।किन्तु हुआ उल्टा।संपूर्ण क्रांति के योद्धा सत्ता की चौसर में उलझ गए।मोरारजी देसाई अपनी वैधता बचाने में लगे रहे।चरण सिंह सत्ता समीकरण में लगे रहे। समाजवादी आपसी संघर्ष में उलझे रहे।और राष्ट्रवादी शक्तियाँ भी उस समय निर्णायक वैचारिक हस्तक्षेप नहीं कर सकीं। परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस की मानसिकता को केवल चुनावी पराजय मिली, वैचारिक पराजय नहीं।
यहीं रक्तबीज बच गया।
राहुल गांधी : उसी रक्तबीज का नया चेहरा?आज राहुल गाँधी को लेकर जो तीव्र प्रतिक्रियाएँ दिखाई देती हैं, उनका कारण केवल उनका राजनीतिक व्यवहार नहीं है। अनेक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण उन्हें उसी वंशवादी मानसिकता का उत्तराधिकारी मानते हैं जिसने भारत में लोकतंत्र को कभी परिवार की संपत्ति समझा था। राहुल गांधी की राजनीति का संकट यह नहीं कि वे विपक्ष में हैं; लोकतंत्र में विपक्ष अनिवार्य है। संकट यह है कि उनकी राजनीति अनेक बार वैकल्पिक राष्ट्रीय दृष्टि प्रस्तुत करने के बजाय निरंतर नकारात्मकता और संस्थाओं के अविश्वास पर आधारित दिखाई देती है।विडंबना देखिए —जिस परिवार की राजनीतिक विरासत पर आपातकाल का कलंक है, वही आज लोकतंत्र बचाने का नैतिक प्रवचन देता है। यह भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य है।
प्रधानमंत्री और गृह मंत्री पर हमले : राजनीति या मानसिकता?प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के विरुद्ध तीखे राजनीतिक हमले लोकतंत्र का हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन जब विरोध वैचारिक न रहकर व्यक्तिगत अवमानना में बदलने लगे, तब वह राजनीतिक संस्कार का संकट बन जाता है।आज विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा आलोचना से अधिक उपहास की राजनीति करता दिखाई देता है। संसद से लेकर विदेशी मंचों तक भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रश्नचिह्न लगाने की प्रवृत्ति केवल सरकार विरोध नहीं, बल्कि कई बार राष्ट्रीय आत्मविश्वास को कमजोर करने वाली राजनीति में बदल जाती है।
और यहीं सबसे गंभीर प्रश्न खड़ा होता है।
सत्ता क्यों तटस्थ दिखती है?देश का राष्ट्रवादी वर्ग अनेक बार यह प्रश्न पूछता है कि यदि आपातकाल की मानसिकता इतनी खतरनाक थी, तो उसके वैचारिक स्रोतों पर निर्णायक प्रहार क्यों नहीं हुआ?क्यों आज भी आपातकाल केवल स्मृति दिवस बनकर रह जाता है?
क्यों लोकतंत्र की हत्या करने वालों की राजनीतिक विरासत अभी भी वैधता का दावा करती है?क्यों राष्ट्रवादी सत्ता अनेक बार केवल प्रतिक्रिया देती दिखाई देती है, निर्णायक वैचारिक पुनर्निर्माण नहीं करती?यही “तटस्थ भाव” की पीड़ा है।जनता ने केवल सरकार बदलने के लिए समर्थन नहीं दिया था; उसने राजनीतिक संस्कार बदलने के लिए समर्थन दिया था।
यदि सत्ता केवल चुनाव जीतने तक सीमित रह जाए और राष्ट्रचेतना का पुनर्निर्माण न करे, तो वैचारिक संघर्ष अधूरा रह जाता है।
लोकतंत्र केवल कानून से नहीं बचता#भारत का सबसे बड़ा संकट यह है कि यहाँ लोकतंत्र को अक्सर संवैधानिक प्रक्रिया मान लिया जाता है, जबकि लोकतंत्र एक सांस्कृतिक अनुशासन भी है।जब राजनीतिक दल परिवार बन जाते हैं,जब विचारधारा व्यक्तिपूजा में बदल जाती है,जब पत्रकारिता सत्ता और विपक्ष की दलाली में बँट जाती है,जब राजनीतिक भाषा मर्यादा खो देती है —तब लोकतंत्र धीरे-धीरे भीतर से खोखला होने लगता है।
भारत को केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बनना; उसे वैचारिक रूप से भी परिपक्व लोकतंत्र बनना है।
इतिहास की सबसे बड़ी चेतावनी#इतिहास यह बताता है कि लोकतंत्र की मृत्यु हमेशा बंदूक से नहीं होती।कभी-कभी वह राजनीतिक स्मृतिहीनता से भी होती है।जिस समाज को अपने घाव याद नहीं रहते, वह बार-बार वही पीड़ा भुगतता है।यदि भारत आपातकाल को केवल कांग्रेस बनाम विपक्ष का अध्याय मानकर भूल जाएगा, तो भविष्य में कोई भी सत्ता उसी मानसिकता को पुनर्जीवित कर सकती है।इसलिए संघर्ष केवल राहुल गांधी या किसी एक दल से नहीं है। संघर्ष उस राजनीतिक संस्कृति से है जो सत्ता को राष्ट्र से ऊपर मानती है।
भारत को निर्णायक वैचारिक पुनर्जागरण चाहिए#आज भारत के सामने दो रास्ते हैं
पहला, प्रतिक्रियाओं, आरोपों और चुनावी ध्रुवीकरण की राजनीति।दूसरा, राष्ट्रीय चरित्र निर्माण, लोकतांत्रिक मर्यादा और वैचारिक पुनर्जागरण का मार्ग।यदि भारत को वास्तव में विश्वगुरु बनना है, तो उसे केवल मजबूत सरकार नहीं, बल्कि मजबूत लोकतांत्रिक संस्कार भी चाहिए।रक्तबीज का अंत केवल युद्ध से नहीं हुआ था; उसके लिए माँ काली को उसकी हर रक्तबूंद रोकनी पड़ी थी।भारतीय राजनीति में भी लोकतंत्र विरोधी प्रवृत्तियों का अंत केवल चुनावी विजय से नहीं होगा। उसके लिए राष्ट्रीय स्मृति, वैचारिक स्पष्टता और राजनीतिक नैतिकता का जागरण आवश्यक होगा।अन्यथा रक्तबीज बार-बार जन्म लेता रहेगा,और राष्ट्र हर बार यह सोचता रह जाएगा कि“हम तटस्थ भाव से सब देखते क्यों रहे?”

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