भारतीय राष्ट्रवाद में गीता और वन्देमातरम्
भारत का राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं है। यह किसी भूभाग पर शासन प्राप्त करने की आकांक्षा मात्र भी नहीं है। भारतीय राष्ट्रवाद का आधार सत्ता नहीं, बल्कि संस्कृति है; सीमाएँ नहीं, बल्कि सभ्यता है; और शासन नहीं, बल्कि आत्मा है। इसी कारण भारत के राष्ट्रवाद को समझने के लिए दो महान प्रतीकों को समझना आवश्यक है— श्रीमद्भगवद्गीता और वन्दे मातरम्। एक ने भारत को धर्म, कर्म और आत्मबल का दर्शन दिया, दूसरे ने भारतभूमि को माँ के रूप में प्रतिष्ठित कर उसके लिए समर्पण का मंत्र दिया। गीता ने भारतीय मनुष्य को युद्धभूमि में खड़े होकर धर्म के लिए संघर्ष करना सिखाया और वन्देमातरम् ने उसी संघर्ष को मातृभूमि की आराधना में बदल दिया। यदि गीता भारतीय आत्मा का शास्त्र है तो वन्देमातरम् भारतीय राष्ट्रचेतना का उद्घोष।
गीता : भारतीय राष्ट्रवाद का आध्यात्मिक आधार भगवान कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में दिया गया गीता का उपदेश केवल अर्जुन के संशय का समाधान नहीं था। वह मानवता के लिए कर्म, साहस और धर्म का सनातन संदेश था।गीता का सबसे बड़ा संदेश है — कर्तव्य से पलायन मत करो। अन्याय के सामने मौन रहना भी अधर्म है। यही विचार आगे चलकर भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा बना। जब विदेशी आक्रांताओं ने भारत की संस्कृति, परंपरा और आत्मगौरव पर आघात किया, तब गीता ने भारतीयों को यह स्मरण कराया कि धर्मरक्षा केवल साधुओं का कार्य नहीं, बल्कि प्रत्येक राष्ट्रनिष्ठ व्यक्ति का दायित्व है।
गीता का यह श्लोक भारतीय राष्ट्रवाद की रीढ़ बन गया_यह केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सिद्धांत है। जब-जब राष्ट्र दुर्बल होगा, जब-जब समाज आत्मविस्मृति में डूबेगा, तब-तब पुनर्जागरण आवश्यक होगा।भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक महानायकों ने गीता से प्रेरणा प्राप्त की। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने जेल में रहकर “गीता रहस्य” लिखा और कर्मयोग को राष्ट्रनिर्माण का मूल सिद्धांत बताया। उनके लिए गीता संन्यास का नहीं, संघर्ष का ग्रंथ थी।
महात्मा गांधी ने गीता को अपनी “आध्यात्मिक माता” कहा। यद्यपि उनका मार्ग अहिंसा का था, किंतु आत्मबल और सत्य के लिए अडिग रहने की प्रेरणा उन्हें गीता से ही मिली।स्वमी विवेकानन्द ने गीता को निर्भीकता का शास्त्र कहा। वे मानते थे कि दुर्बलता ही भारत की सबसे बड़ी समस्या है और गीता मनुष्य को सिंहवत् साहसी बनाती है।श्री अरविन्द ने गीता को राष्ट्रवाद का योग कहा। उनके अनुसार भारत केवल राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि ईश्वरीय चेतना का केंद्र है।
गीता का राष्ट्रवादी दर्शन#भारतीय राष्ट्रवाद का मूल “धर्म” है। यहाँ धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय से नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और कर्तव्य से है। गीता इसी धर्म की स्थापना करती है।गीता कहती है_यह श्लोक भारतीय राष्ट्रवाद का कर्मसूत्र बन गया। राष्ट्रनिर्माण कभी तात्कालिक लाभ से नहीं होता। जो व्यक्ति बिना स्वार्थ के राष्ट्र के लिए कार्य करता है, वही सच्चा राष्ट्रभक्त होता है।गीता व्यक्ति को आत्मकेंद्रित जीवन से निकालकर लोककल्याण की ओर ले जाती है। यही कारण है कि भारतीय राष्ट्रवाद पश्चिमी राष्ट्रवाद से भिन्न है। पश्चिम में राष्ट्रवाद प्रायः साम्राज्यवाद या जातीय अहंकार में बदल गया, जबकि भारत में राष्ट्रवाद लोकमंगल और विश्वबंधुत्व से जुड़ा रहा।गीता का राष्ट्रवाद किसी अन्य जाति या धर्म से घृणा नहीं सिखाता। वह अधर्म का विरोध करता है, मनुष्य का नहीं। यही कारण है कि भारतीय राष्ट्रवाद में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना भी है और आवश्यकता पड़ने पर “धर्मयुद्ध” की चेतना भी।
वन्देमातरम् : राष्ट्र की आराधना#यदि गीता ने राष्ट्रवाद को दर्शन दिया तो वन्देमातरम् ने उसे भावनात्मक शक्ति दी।बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्देमातरम् केवल गीत नहीं था। वह दासता के अंधकार में डूबे भारत के लिए स्वतंत्रता का मंत्र था। जब अंग्रेज भारत को केवल उपनिवेश मानते थे, तब वन्देमातरम् ने भारतभूमि को माँ के रूप में स्थापित किया।“सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्” केवल प्रकृति वर्णन नहीं है। यह भारत की आत्मा का चित्रण है। इस गीत ने भारत को भूगोल से उठाकर मातृत्व के स्तर पर प्रतिष्ठित कर दिया। राष्ट्र अब नक्शे का टुकड़ा नहीं रहा; वह माँ बन गया।यही कारण था कि वन्देमातरम् सुनते ही क्रांतिकारियों की आँखों में ज्वाला भर जाती थी। अंग्रेज सरकार इस गीत से भयभीत थी, क्योंकि वह जानती थी कि जिस राष्ट्र ने अपनी भूमि को माता मान लिया, उसे दास बनाकर रखना असंभव है।
स्वतंत्रता आंदोलन और वन्देमातरम्#1905 में बंग-भंग आंदोलन के समय वन्देमातरम् जनक्रांति का उद्घोष बन गया। विद्यार्थी, महिलाएँ, साधु, किसान, व्यापारी— सभी इस गीत को गाते हुए सड़कों पर उतर आए।अंग्रेजों ने वन्देमातरम् पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया, क्योंकि यह गीत भारतीय आत्मसम्मान को जाग्रत कर रहा था। अनेक युवकों ने “वन्देमातरम्” कहते हुए फाँसी के फंदे को चूमा।खुदीराम बोस, बटुकेश्वर दत्त, रामप्रसाद बिस्मिल और असंख्य क्रांतिकारियों के लिए वन्देमातरम् केवल नारा नहीं, बल्कि मृत्यु से भी बड़ा संकल्प था।यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद की भावनात्मक ऊर्जा बन गया। जिस प्रकार मंदिर में मंत्र श्रद्धा जगाता है, उसी प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन में वन्देमातरम् राष्ट्रभक्ति जगाता था।
गीता और वन्देमातरम् का अद्भुत समन्वय#भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें दर्शन और भावना का अद्भुत संतुलन है।गीता ने भारतीयों को सिखाया कि धर्म के लिए संघर्ष करो।वन्देमातरम् ने सिखाया कि यह संघर्ष मातृभूमि के लिए है।गीता ने आत्मबल दिया।वन्देमातरम् ने भावबल दिया।गीता ने कर्मयोग दिया।वन्देमातरम् ने राष्ट्रयोग दिया।गीता के बिना राष्ट्रवाद केवल भावुकता बन सकता था और वन्देमातरम् के बिना राष्ट्रवाद केवल बौद्धिक चर्चा बनकर रह जाता। दोनों ने मिलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को आत्मा और स्वर प्रदान किया।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा#भारत का राष्ट्रवाद पश्चिमी अर्थों में “नेशन-स्टेट” की संकीर्ण अवधारणा नहीं है। यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना का परिणाम है।जब भारत विदेशी आक्रमणों से जूझ रहा था, तब मंदिर, तीर्थ, महाकाव्य, संत परंपरा और गीता जैसे ग्रंथ भारतीय समाज को जोड़े हुए थे। इसी सांस्कृतिक आधार पर आगे चलकर राष्ट्रवाद खड़ा हुआ।वन्देमातरम् ने इसी सांस्कृतिक चेतना को आधुनिक राजनीतिक भाषा दी। भारत माँ की अवधारणा ने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक लोगों को एक सूत्र में बाँध दिया।
आधुनिक भारत में प्रासंगिकता#आज भारत स्वतंत्र है, किंतु चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुईं। सांस्कृतिक विघटन, ऐतिहासिक विस्मृति, उपभोक्तावाद और आत्महीनता जैसी समस्याएँ राष्ट्र के सामने हैं। ऐसे समय में गीता और वन्देमातरम् पुनः प्रासंगिक हो उठते हैं।गीता हमें कर्तव्य, अनुशासन और आत्मबल सिखाती है।वन्देमातरम् हमें राष्ट्र के प्रति भावनात्मक समर्पण सिखाता है।यदि नई पीढ़ी केवल अधिकार सीखेगी और कर्तव्य भूल जाएगी, तो राष्ट्र कमजोर होगा। यदि राष्ट्र केवल आर्थिक विकास करेगा किंतु सांस्कृतिक चेतना खो देगा, तो उसकी आत्मा रिक्त हो जाएगी। गीता और वन्देमातरम् इसी रिक्तता को भरने वाले स्रोत हैं।
राष्ट्रवाद और आध्यात्मिकता#भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी विशेषता उसका आध्यात्मिक स्वरूप है। यहाँ राष्ट्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि साधना का विषय है। राष्ट्रवाद यहाँ किसी जातीय श्रेष्ठता का अहंकार नहीं, बल्कि सभ्यता की रक्षा का संकल्प है।गीता मनुष्य को आत्मानुशासन देती है और वन्देमातरम् उसे राष्ट्र के प्रति समर्पण देता है। दोनों मिलकर ऐसे नागरिक का निर्माण करते हैं जो केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्मी हो।
भारतीय राष्ट्रवाद को यदि दो पंक्तियों में समझना हो तो कहा जा सकता है—गीता उसका दर्शन है और वन्देमातरम् उसका घोष।एक ने भारत को धर्म और कर्म का मार्ग दिखाया, दूसरे ने भारतभूमि को माँ बनाकर उसके लिए बलिदान की प्रेरणा दी।जब कोई युवा अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है, वहाँ गीता जीवित है।जब कोई भारत माता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है, वहाँ वन्देमातरम् जीवित है।भारत की राष्ट्रीय चेतना केवल संविधान की धाराओं से नहीं बनी; वह ऋषियों की वाणी, संतों की साधना, क्रांतिकारियों के बलिदान और करोड़ों भारतीयों की सांस्कृतिक स्मृति से बनी है।
इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद को समझना है तो गीता के कर्मयोग और वन्देमातरम् की मातृभक्ति को समझना होगा। यही वह द्वंद्वहीन समन्वय है जिसने भारत को केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता बनाया है।
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