राजनीति से भागता ईमानदार आदमी
जनता का प्रतिनिधित्व करेंगे। कौटिल्य कौटिल्य ने भी भी कहा था - "प्रजा सुखे सुखं राज्ञः"। यानी राजा का सुख प्रजा के सुख में है। पर आज ज़मीनी हकीकत उलटी दिखती है। स्कूल-कॉलेज का टॉपर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक बनना चाहता है। बिज़नेस करने वाला स्टार्टअप खोलता है। समाजसेवी NGO चलाता है। पर राजनीति? उससे सब दूर भागते हैं।
दूसरी तरफ, आपराधिक रिकॉर्ड वाले,बाहुबली, और पैसा कमाने की नीयत रखने वाले लोगों के लिए राजनीति पहली पसंद बन गई है। उनके लिए यह सेवा नहीं, IPO है। एक बार पैसा लगाओ, फिर 5 साल तक ब्याज समेत वसूलो। इसी विरोधाभास को समझने की कोशिश है। अच्छे लोग क्यों भाग रहे हैं, बुरे लोग क्यों आ रहे हैं, और इसका समाधान क्या है।
अच्छे लोग क्यों भाग रहे हैं: 7 बड़ी वजहें*
इज़्ज़त का सवाल* एक प्रोफेसर, डॉक्टर या अफसर की समाज में इज़्ज़त होती है। राजनीति में कदम रखते ही पहला हमला चरित्र पर होता है। विरोधी पुराना ट्वीट निकालेंगे, रिश्तेदारों के नाम पर आरोप लगाएंगे, मीडिया ट्रायल चलेगा। ईमानदार आदमी सोचता है - "20 साल की मेहनत से बनाई साख 20 दिन में मिट्टी में मिल जाएगी।" इसलिए वह रिस्क नहीं लेता।
पैसा ही पैसा*2019 लोकसभा चुनाव में औसतन एक उम्मीदवार ने 8.7 करोड़ खर्च किए। कानूनी सीमा 95 लाख है, पर ज़मीनी खर्च कई गुना। एक ईमानदार शिक्षक या छोटा व्यापारी इतना पैसा कहाँ से लाए? चंदा माँगेगा तो कल को एहसान चुकाने पड़ेंगे। काला धन लगाएगा नहीं। नतीजा - मैदान छोड़ देता है।
जीत की गारंटी नहीं*स्टार्टअप फेल हो तो फिर कोशिश कर सकते हो। नौकरी गई तो दूसरी मिल जाएगी। पर चुनाव हारे तो 5 साल का करियर, पैसा, और सामाजिक पूँजी सब डूब गया। हार का डर इतना बड़ा है कि मेरिट वाला आदमी टिकट लेने से पहले 10 बार सोचता है।
परिवार पर असर*राजनीति 24x7 काम है। धमकी, सुरक्षा का मुद्दा, बच्चों की पढ़ाई डिस्टर्ब। नेता की पत्नी को भी गाली सुननी पड़ती है। अच्छा आदमी सोचता है - "मेरे कारण परिवार क्यों झेले?" और पीछे हट जाता है।
सिस्टम की थकान*मान लो ईमानदार आदमी जीत भी गया। अब वह बदलाव लाना चाहता है। पर सिस्टम क्या है? फाइल 6 टेबल घूमेगी। अफसर नियम दिखाएगा। अपनी ही पार्टी का सीनियर नेता टांग अड़ाएगा क्योंकि उसका ठेका फँस रहा है। ठेकेदार धमकाएगा। 2 साल में वह समझ जाता है कि अकेले कुँआ नहीं खोद सकता। या तो समझौता करो, या इस्तीफा दो। ज़्यादातर लोग इस्तीफा दे देते हैं - राजनीति से नहीं, उम्मीद से।
गंदगी का टैग*"राजनीति तो गंदी है" - यह जुमला हमने खुद सच बना दिया। घरों में बच्चों को कहते हैं "बेटा, इन चक्करों में मत पड़ना"।
नतीजा: जो माँ-बाप बच्चे को IAS बनाना चाहते हैं, वही उसे पार्षद का चुनाव भी नहीं लड़ने देते। तालाब गंदा है कहकर हम अच्छे लोगों को नहाने से रोक देते हैं। फिर शिकायत करते हैं कि तालाब साफ क्यों नहीं हुआ।
विकल्प का होना*1950 में देश सेवा का सबसे बड़ा मंच राजनीति थी। आज NGO, सोशल मीडिया, स्टार्टअप, यू-ट्यूब से भी करोड़ों लोगों पर असर डाल सकते हो। एक ईमानदार व्यक्ति सोचता है - "गाली खाए बिना भी बदलाव ला सकता हूँ, तो राजनीति में क्यों जाऊँ?" और वह दूसरा रास्ता चुन लेता है।
बुरे लोगों के लिए यह 'सबसे बड़ा निवेश' क्यों है? रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट*किसी भी बिज़नेस में 20% सालाना रिटर्न बहुत अच्छा माना जाता है। राजनीति में यह 200% से 2000% तक हो सकता है। 1 करोड़ लगाकर टिकट लो, 5 करोड़ चुनाव में खर्च करो। कुल 6 करोड़। जीत गए तो 5 साल में विधायक निधि, ट्रांसफर-पोस्टिंग, ठेकों में कमीशन, ज़मीन के दाम बढ़वाना - सब मिलाकर 60 करोड़ बन सकता है। कौन-सा बिज़नेस इतना रिटर्न देता है? ऊपर से नुकसान का रिस्क भी कम, क्योंकि पैसा अक्सर नंबर दो का होता है।
पावर का नशा*पैसे से भी बड़ी चीज़ है पावर। थानेदार सलाम करेगा। DM फोन उठाएगा। हवाई अड्डे पर अलग लाइन। जिस आदमी को समाज में कोई नहीं पूछता था, विधायक बनते ही वह VIP हो जाता है। यह नशा पैसे से नहीं खरीदा जा सकता। इसलिए अपराधी भी करोड़ों खर्च करके विधायक बनना चाहते हैं।
कानूनी सुरक्षा कवच*भारत में 40% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। पर सज़ा कितनों को हुई? केस 20 साल चलता है।
नेता बनते ही पुलिस दबाव में आ जाती है। गवाह मुकर जाते हैं। तारीख पर तारीख मिलती है। राजनीति अपराधियों के लिए सबसे सुरक्षित शेल्टर बन गई है।
पीढ़ियों का सेटलमेंट*एक बार MP-MLA बन गए तो जीवन भर पेंशन, मुफ्त मेडिकल, ट्रेन-हवाई यात्रा। बेटे को टिकट, भाई को चेयरमैन, भतीजे को ठेका। एक जीत पूरी खानदान को 3 पीढ़ी के लिए सेट कर देती है। इसलिए लोग इसे 'पुश्तैनी निवेश' कहते हैं।
एंट्री बैरियर कम*डॉक्टर बनने के लिए NEET, IAS के लिए UPSC, कंपनी CEO के लिए 20 साल का अनुभव चाहिए। नेता बनने के लिए? बस जाति, पैसा, या बाहुबल। कोई न्यूनतम योग्यता नहीं, कोई नैतिकता टेस्ट नहीं। इसलिए यह सबसे आसान 'हाई रिटर्न' सेक्टर बन गया है।इस असंतुलन का समाज पर असर *नीतियाँ बिकने लगती हैं*: जब निवेश करके नेता बना है, तो वह पॉलिसी भी उसी को फायदा पहुँचाने वाली बनाएगा जिसने पैसा लगाया। शिक्षा, स्वास्थ्य पीछे छूट जाते हैं। *युवाओं का मोहभंग*: जब बच्चा देखता है कि टॉपर बेरोज़गार है और गुंडा विधायक है, तो वह मेहनत क्यों करेगा? वह शॉर्टकट ढूँढेगा। *ईमानदार अफसर हतोत्साहित*: कलक्टर ईमानदारी से काम करे तो ट्रांसफर। फिर वह भी सिस्टम का हिस्सा बन जाता है।
. *विकास की लागत बढ़ती है*: सड़क 10 करोड़ की है, पर 15 करोड़ में टेंडर पास होगा क्योंकि 5 करोड़ ऊपर तक जाएगा। नुकसान जनता का। *लोकतंत्र कमज़ोर*: जब विकल्प ही खराब हों, तो वोटर सबसे कम बुरा चुनता है। यह लोकतंत्र की जीत नहीं, मजबूरी है।
क्या यह तस्वीर पूरी तरह काली है? नहीं।*
हर अँधेरे में कुछ दिए भी जलते हैं।
टी. एन. शेषन ने चुनाव आयोग की साख बदली। कैलाश सत्यार्थी ने राजनीति से बाहर रहकर कानून बदलवाया। अरविंद केजरीवाल, आतिशी, राघव चड्ढा जैसे IIT-IIM वाले लोग आए। दक्षिण में कई डॉक्टर-कलेक्टर इस्तीफा देकर चुनाव लड़े और जीते। पंचायत स्तर पर हजारों ईमानदार सरपंच बिना पैसे के काम कर रहे हैं। उनका नाम अखबार में नहीं आता, पर गाँव की नल-जल योजना उन्हीं से चलती है।यानी रास्ता बंद नहीं है, मुश्किल है। अच्छे लोगों को वापस कैसे लाएँ?*गाली देने से तालाब साफ नहीं होगा। उतरना पड़ेगा। 5 स्तर पर काम करना होगा।
चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता* *स्टेट फंडिंग*: सरकार खुद योग्य उम्मीदवारों का खर्च उठाए। जर्मनी, फ्रांस में होता है। *चुनावी बॉन्ड बंद*: किसने किसे चंदा दिया, यह जनता को पता चले। *खर्च की लिमिट व्यावहारिक हो*: 95 लाख की लिमिट से मज़ाक बनता है। या तो बढ़ाओ, या सख्ती से लागू करो।जब पैसा बैरियर नहीं रहेगा, तो शिक्षक भी लड़ सकेगा।
कानूनी सुधार* *फास्ट ट्रैक कोर्ट*: MP-MLA पर केस 1 साल में निपटे। सज़ा हुई तो चुनाव नहीं लड़ सकते।. *न्यूनतम योग्यता*: 10वीं पास, कोई गंभीर आरोप नहीं - ऐसी शर्त रखें। कंपनी में चपरासी के लिए भी योग्यता माँगते हैं, देश चलाने के लिए क्यों नहीं? *राइट टू रिकॉल*: 2 साल में काम नहीं तो जनता वापस बुला सके। राजनीतिक दलों का लोकतंत्रीकरण*आज टिकट बेटे को या पैसे वाले को मिलता है। पार्टी में अंदरूनी चुनाव हों। बूथ लेवल कार्यकर्ता वोट देकर उम्मीदवार चुने। जब टिकट मेरिट पर मिलेगा, तो अच्छे लोग भी लाइन में लगेंगे।
समाज की सोच बदलना* *घर से शुरुआत*: बच्चों को कहें कि "राजनीति गंदी नहीं, गंदे लोग राजनीति में हैं। तुम जाकर साफ करो।"
2. *अच्छों को जिताना*: चुनाव में NOTA नहीं, कम बुरे को नहीं, सचमुच अच्छे को वोट दें। हार भी जाए तो उसकी ज़मानत ज़ब्त न हो। अगली बार और अच्छे लोग हिम्मत करेंगे।
3. *सम्मान देना*: ईमानदार पार्षद का भी उतना सम्मान हो जितना डॉक्टर का। तभी लोग आएँगे।अच्छे लोगों के लिए एंट्री पॉइंट आसान करना*सीधे PM बनने कोई नहीं जाता। एंट्री नीचे से हो।
*नगर निगम, पंचायत*: कम खर्च, ज़्यादा असर। 2 साल काम दिखाओ, फिर विधायक का टिकट माँगो। *राज्यसभा/विधान परिषद*: एक्सपर्ट, डॉक्टर, वैज्ञानिक यहाँ से नामित होकर नीति बनाएँ। युवाओं के लिए सीधा संदेश*अगर आप ईमानदार हैं, पढ़े-लिखे हैं, और देश के लिए दर्द है - तो आपके पास 3 रास्ते हैं:*शिकायत करो*: ट्विटर पर लिखो, दोस्तों में बोलो कि सब चोर हैं। कुछ नहीं बदलेगा। *भाग जाओ*: विदेश चले जाओ, NGO खोल लो। आप बच जाओगे, देश नहीं।
3. *घुसो और लड़ो*: कीचड़ है तो कपड़े गंदे होंगे। पर कोई तो साफ करेगा।
गांधी वकील थे। अंबेडकर विदेश से पढ़े थे। कलाम वैज्ञानिक थे। सबने राजनीति को छुआ, तभी देश बदला।आप मत आइए अगर पैसा कमाना है। पर अगर इतिहास में नाम लिखवाना है, तो मैदान यही है।
"अच्छे लोग राजनीति से भाग रहे हैं" - यह शिकायत है। "बुरे लोग इसे निवेश मान रहे हैं" - यह बीमारी है।इलाज क्या है? अच्छे लोगों का लौटना।
जब तक क्लास का टॉपर विधायक बनने में शर्म महसूस करेगा और अपराधी गर्व, तब तक यही चलेगा। जिस दिन यह उल्टा हो गया, लोकतंत्र जीत जाएगा। राजनीति गंगाजल है। गंदगी उसमें डालने से आई है। निकालेंगे नहीं, तो पीने लायक नहीं बचेगी। फैसला आपका है - दर्शक बनकर गाली देना है, या खिलाड़ी बनकर मैदान साफ करना है। क्योंकि कुर्सी खाली नहीं रहती। अगर आप नहीं बैठोगे, तो कोई और बैठ जाएगा। और वो 'कोई और' कैसा होगा, यह आप रोज़ अखबार में पढ़ते ही हैं।

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