लखनऊ-कानपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर इटौंजा-नवाबगंज टोल प्लाजा पर ओवरलोड ट्रकों के लिए फर्जी नंबरों का इस्तेमाल किया जा रहा था। टोल कर्मचारियों की मिलीभगत से 1600 ट्रकों में से लगभग 900 के नंबर फर्जी पाए गए। इस घोटाले से सरकारी राजस्व को 18 से 45 लाख रुपये का नुकसान हुआ है।
टोल प्लाजा या तंत्र की तस्करी? — लखनऊ से उठता एक राष्ट्रीय प्रश्न?
भारत में सड़कें केवल आवागमन का माध्यम नहीं, बल्कि आर्थिक प्रवाह की धमनियाँ हैं। इन्हीं धमनियों पर स्थापित टोल प्लाजा राज्य के राजस्व, अनुशासन और पारदर्शिता के प्रहरी माने जाते हैं। परंतु जब यही प्रहरी संदिग्ध हो जाएँ, जब यही द्वारपाल व्यवस्था के साथ विश्वासघात करने लगें, तब प्रश्न केवल एक शहर या एक घटना का नहीं रह जाता—वह पूरे राष्ट्र की प्रशासनिक आत्मा को झकझोर देता है।
लखनऊ में उजागर हुआ टोल फर्जीवाड़ा इसी गहरी बीमारी का लक्षण है। एक महीने में 1600 ओवरलोड ट्रकों का गुजरना और उनमें से लगभग 900 का “अस्तित्वहीन” होना—यह कोई सामान्य त्रुटि नहीं, बल्कि संगठित अपराध का वह चेहरा है जिसे अब तक पर्दों के पीछे छिपाया जाता रहा। इन ट्रकों का न कोई चेसिस रिकॉर्ड, न कोई पंजीकरण—फिर भी वे न केवल सड़कों पर दौड़ते रहे, बल्कि टोल प्लाजा से विधिवत “प्रमाणित” होकर निकलते रहे। यह तथ्य स्वयं में एक भयावह प्रश्न है—क्या हमारा तंत्र अब वास्तविकता को नहीं, बल्कि मनगढ़ंत आंकड़ों को स्वीकार करने लगा है?
भारत में टोल प्रणाली का बड़ा भाग नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के अधीन संचालित होता है, और पिछले वर्षों में फास्टैग जैसी डिजिटल व्यवस्थाओं को पारदर्शिता का प्रतीक बताया गया। उद्देश्य स्पष्ट था—मानवीय हस्तक्षेप को न्यूनतम कर भ्रष्टाचार के अवसरों को समाप्त करना। परंतु लखनऊ की घटना यह सिद्ध करती है कि तकनीक स्वयं में समाधान नहीं, जब तक उसे संचालित करने वाले हाथ ईमानदार न हों। जहाँ मशीनें नियम बनाती हैं, वहाँ मनुष्य उन्हें तोड़ने के रास्ते भी खोज लेता है।
यह फर्जीवाड़ा केवल टोल तक सीमित नहीं है। इसके पीछे छिपा है अवैध खनन का वह विशाल नेटवर्क, जो वर्षों से राज्य की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहा है। ये ओवरलोड ट्रक केवल अतिरिक्त भार नहीं ढोते—वे कानून की सीमाओं को कुचलते हुए आगे बढ़ते हैं। वे पर्यावरण का दोहन करते हैं, सड़कों को क्षतिग्रस्त करते हैं, और सबसे महत्वपूर्ण—राज्य के राजस्व को सीधे-सीधे लूटते हैं। जब ऐसे ट्रकों को टोल प्लाजा से निर्बाध मार्ग मिल जाता है, तब यह स्पष्ट हो जाता है कि अपराध अब छिपकर नहीं, बल्कि व्यवस्था की छत्रछाया में फल-फूल रहा है।
इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पक्ष है—मिलीभगत की आशंका। टोल कर्मचारी यदि स्वयं फर्जी नंबर डालकर रसीद काट रहे हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित तंत्र का हिस्सा प्रतीत होता है। प्रश्न यह उठता है कि क्या परिवहन विभाग, स्थानीय प्रशासन और टोल ऑपरेटर—सभी इस खेल से अनभिज्ञ थे? या फिर यह एक ऐसा “साझा मौन” है, जिसमें हर कोई जानता है, पर कोई बोलता नहीं?
यह स्थिति केवल लखनऊ तक सीमित है, ऐसा मानना आत्मवंचना होगी। जहाँ-जहाँ अवैध खनन है, जहाँ-जहाँ ओवरलोडिंग एक सामान्य व्यवहार बन चुका है, और जहाँ निगरानी ढीली है—वहाँ-वहाँ इस मॉडल के पनपने की पूरी संभावना है। यह एक “कॉपी-पेस्ट भ्रष्टाचार” है, जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना किसी बाधा के फैल सकता है।
समाधान क्या है? क्या केवल FIc R दर्ज कर देने से यह समस्या समाप्त हो जाएगी? नहीं। यह समस्या सतही नहीं, बल्कि संरचनात्मक है। इसके लिए आवश्यक है कि टोल प्लाजा को पूर्णतः स्वचालित किया जाए, नंबर प्लेट की पहचान और सत्यापन को अनिवार्य बनाया जाए, और टोल डेटा को परिवहन विभाग तथा पुलिस के साथ रियल-टाइम में जोड़ा जाए। साथ ही, कर्मचारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र ऑडिट प्रणाली विकसित करनी होगी। परंतु इन सब उपायों से भी अधिक आवश्यक है—प्रशासनिक इच्छाशक्ति। क्योंकि जहाँ इच्छा नहीं होती, वहाँ सबसे उन्नत तकनीक भी निष्प्रभावी हो जाती है।
अंततः, यह प्रश्न केवल टोल प्लाजा का नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का है जो व्यवस्था को निजी लाभ का साधन बना देती है। जब राज्य के द्वारपाल ही लुटेरे बन जाएँ, तब अपराधियों को किसी बाहरी संरक्षण की आवश्यकता नहीं रहती। वे स्वयं व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं।
लखनऊ का यह खुलासा एक चेतावनी है—यदि अब भी सुधार नहीं हुआ, तो वह दिन दूर नहीं जब टोल प्लाजा राजस्व के केंद्र नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के वैध अड्डे बन जाएँगे। और तब यह कहना कठिन होगा कि गलती किसकी थी—अपराधियों की, या उस व्यवस्था की जिसने उन्हें फलने-फूलने दिया।कौटिल्य की दृष्टि में राज्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी व्यवस्था होती है।यदि वही व्यवस्था बिक जाए, तो राज्य का पतन किसी युद्ध से नहीं, भीतर से होता है।

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