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रविवार, 5 अप्रैल 2026

रसोई गैस पर डाका: व्यवस्था की नाकामी का आईना

 गैस सिलिंडर की कालाबाजारी: व्यवस्था की नाकामी या संगठित भ्रष्टाचार?


बस्ती,हरिओम प्रकाश, संवाददाता, 5अप्रेल 26,समय 6.17

बस्ती में घरेलू गैस सिलिंडरों की कालाबाजारी करते हुए तीन हॉकरों का पकड़ा जाना केवल एक साधारण घटना नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जब रसोई गैस जैसी बुनियादी आवश्यकता को भी कुछ लोग खुलेआम मुनाफे का साधन बना लें और व्यवस्था को इसकी भनक तक न लगे, तब यह मान लेना चाहिए कि समस्या केवल कुछ हॉकरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कहीं न कहीं एक बड़ी लापरवाही और तंत्र की कमजोरी छिपी हुई है।घरेलू गैस सिलिंडर सरकार द्वारा गरीब और मध्यम वर्ग के जीवन को सहज बनाने के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। किंतु जब यही सिलिंडर कालाबाजारी के माध्यम से महंगे दामों पर बेचे जाते हैं, तब इसका सीधा प्रभाव उन परिवारों पर पड़ता है जिनके लिए रसोई गैस किसी विलासिता की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन की आवश्यकता है। सवाल यह उठता है कि यदि कुछ हॉकर इतने खुलेआम कालाबाजारी कर रहे थे तो क्या संबंधित गैस एजेंसियों और आपूर्ति विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी? या फिर यह सब उनकी मौन सहमति से हो रहा था?

अक्सर देखा गया है कि जब मीडिया किसी मामले को उजागर करता है, तभी प्रशासन की नींद टूटती है। यदि खबर प्रकाशित होने के बाद ही छापेमारी शुरू होती है, तो यह भी एक गंभीर प्रश्न है कि क्या प्रशासन स्वयं निगरानी करने में असमर्थ हो गया है? क्या व्यवस्था इतनी कमजोर हो चुकी है कि उसे सक्रिय करने के लिए अखबारों की सुर्खियों का इंतजार करना पड़ता है?इस घटना में गैस एजेंसी का नाम सामने आना भी कई सवालों को जन्म देता है। गैस एजेंसियां केवल वितरण का माध्यम नहीं हैं, बल्कि उन पर यह जिम्मेदारी भी होती है कि सिलिंडर सही उपभोक्ताओं तक पहुंचे। यदि एजेंसी से जुड़े लोग ही कालाबाजारी में शामिल पाए जाते हैं, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि जनता के साथ विश्वासघात है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि ऐसी घटनाएं केवल एक जिले तक सीमित नहीं हैं। देश के कई हिस्सों में घरेलू गैस, राशन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रहती हैं। इसका अर्थ है कि समस्या कहीं अधिक गहरी है और केवल छिटपुट कार्रवाई से इसका समाधान संभव नहीं है।आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन केवल गिरफ्तारी कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त न हो जाए, बल्कि पूरी आपूर्ति श्रृंखला की गंभीर जांच करे। यह पता लगाया जाए कि कालाबाजारी का नेटवर्क कहां से शुरू होता है और किन-किन स्तरों पर लोग इसमें शामिल हैं। जब तक बड़े स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक छोटे-मोटे हॉकरों को पकड़ने से व्यवस्था की बीमारी दूर नहीं होगी।

वास्तव में यह घटना हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था वास्तव में जनता की सेवा के लिए है या फिर वह केवल कागजों में सक्रिय दिखाई देने वाली प्रणाली बनकर रह गई है। यदि सरकार और प्रशासन सच में जनता के हितों के प्रति गंभीर हैं, तो उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि रसोई गैस जैसी बुनियादी आवश्यकता किसी भी प्रकार की कालाबाजारी या भ्रष्टाचार का शिकार न बने।

अन्यथा हर छापेमारी के बाद कुछ गिरफ्तारियां होंगी, कुछ समाचार छपेंगे, और फिर वही पुरानी व्यवस्था अपनी ढर्रे पर चलती रहेगी — जबकि आम जनता महंगे सिलिंडरों और भ्रष्ट तंत्र के बीच पिसती रहेगी।

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