बिना डिजिटल साक्षरता,“एटीएम धारक क़ो सजा या आर्थिक बोझ , प्रति ट्रांजेक्शन 20 से 23 रूपये का दबाव

 एटीएम से पैसा निकालना अब पड़ेगा महंगा: आम आदमी पर नया आर्थिक दबाव

बस्ती, उत्तरप्रदेश, मनोज श्रीवास्तव, लखनऊ 

देश में डिजिटल बैंकिंग और नकदी प्रबंधन से जुड़ी नीतियों के बीच अब एटीएम (ATM) से लेन-देन महंगा होने जा रहा है। यह बदलाव सीधे तौर पर आम नागरिक की जेब पर असर डालने वाला है, खासकर उन लोगों पर जो अभी भी नकद लेन-देन पर निर्भर हैं।क्या बदला है?बैंकों और भुगतान प्रणाली से जुड़े नियमों में बदलाव के बाद अब एटीएम से फ्री ट्रांजेक्शन की सीमा के बाद अतिरिक्त शुल्क बढ़ा दिया गया है।
पहले:सीमित संख्या में मुफ्त लेन-देन उसके बाद मामूली चार्ज
 अब:मुफ्त ट्रांजेक्शन की सीमा पार होते ही हर निकासी पर ज्यादा शुल्क देना होगा
इसका मतलब साफ है—जितना ज्यादा एटीएम का उपयोग, उतना ज्यादा खर्च।
किस पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?यह फैसला सबसे ज्यादा प्रभावित करेगा:
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्र के लोग छोटे व्यापारी वे नागरिक जो डिजिटल भुगतान से पूरी तरह नहीं जुड़े,क्योंकि इन वर्गों के लिए नकदी अभी भी दैनिक जीवन का मुख्य माध्यम है।
बैंकों का तर्क क्या है?बैंक और नियामक संस्थाएं यह तर्क देती हैं कि:एटीएम संचालन और रखरखाव की लागत बढ़ गई है सुरक्षा और तकनीकी उन्नयन पर खर्च बढ़ा है
इसलिए शुल्क बढ़ाना आवश्यक है
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस लागत का बोझ सीधे जनता पर डालना ही एकमात्र विकल्प है?
डिजिटल इंडिया बनाम जमीनी सच्चाई,सरकार लगातार “कैशलेस” या “कम-नकदी” अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने की बात करती है।लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि:हर व्यक्ति के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट नहीं है डिजिटल साक्षरता अभी भी सीमित है,साइबर फ्रॉड का डर भी लोगों को नकद की ओर लौटाता हैऐसे में एटीएम को महंगा करना कहीं न कहीं डिजिटल मजबूरी थोपने जैसा कदम माना जा रहा है।
आम आदमी की चिंताएक मध्यम वर्गीय या गरीब व्यक्ति के लिए:20–25 रुपये का अतिरिक्त शुल्क भी मायने रखता हैमहीने में कई बार एटीएम उपयोग करने पर यह खर्च बढ़ जाता है
 यानी यह छोटा-सा शुल्क धीरे-धीरे एक छिपा हुआ आर्थिक बोझ बन जाता है।
सुविधा या सजा?एटीएम कभी सुविधा का प्रतीक था—लेकिन अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह सुविधा धीरे-धीरे “सजा” में बदल रही है?यदि बैंकिंग सेवाएं आम आदमी की पहुंच से महंगी हो जाएं, तो वित्तीय समावेशन का सपना अधूरा रह जाएगा।”
सरकार और बैंकों को इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए, ताकि डिजिटल प्रगति और आम आदमी की सुविधा के बीच संतुलन बना रहे। 

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