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सोमवार, 30 मार्च 2026

जब पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था में सडानध (बदबू )है फिर कौन करें किससे कराये उपचार!!

 


सी एमओ कार्यालय बना अनियमितताओं संजाल,, पूरे प्रदेश की व्यवस्था पर उठे सवाल
गंगाराम, पत्रकार, 30 मार्च 26,समय 2.10



जनपद बस्ती का मुख्य चिकित्सा अधिकारी  कार्यालय अब केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि संभावित भ्रष्टाचार और तंत्रगत विफलता का प्रतीक बनता जा रहा है।  कौटिल्य फाउंडेशन के प्रतिनिधि गंगाराम ने सीधे प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक को पत्र भेजकर न केवल बस्ती, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के सीएमओ कार्यालयों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं।
“स्वास्थ्य तंत्र या दलाली तंत्र?”#गंगाराम के पत्र में लगाए गए आरोप चौंकाने वाले हैं। उनका कहना है कि सीएमओ कार्यालय के लगभग सभी प्रमुख पटल—स्थापना, लेखा, औषधि, टीकाकरण, NHM, रोग नियंत्रण, परिवार कल्याण, लाइसेंस और स्टोर—अपनी मूल जिम्मेदारियों से भटक चुके हैं।आरोपों के मुताबिक—फाइलें जानबूझकर रोकी जाती हैं, बिना “प्रभाव” के कोई काम नहीं होता,दवा खरीद और बजट खर्च में बड़े स्तर पर खेल की आशंका,जनकल्याणकारी योजनाएं कागजों में चल रही हैं, जमीन पर नहीं,लाइसेंस और भुगतान प्रक्रियाओं में दलालों का खुला हस्तक्षेप,शिकायतों को दबाना और जिम्मेदारी से बचना आम प्रवृत्ति बन चुकी हैपूरे प्रदेश में “एक ही बीमा
री”सबसे गंभीर आरोप यह है कि यह स्थिति केवल बस्ती तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के सीएमओ कार्यालयों में एक जैसा “सिस्टमेटिक पैटर्न” बन चुका है। यदि यह सच है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक संगठित प्रशासनिक विफलता और भ्रष्ट तंत्र की ओर इशारा करता है।
सरकार की साख पर सीधा प्रहार#यह मामला केवल एक जिले का नहीं, बल्कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल है। जब स्वास्थ्य विभाग के जिला स्तर के कार्यालय ही संदेह के घेरे में हों, तो आम नागरिकों को मिलने वाली सेवाओं की गुणवत्ता पर गंभीर खतरा स्वाभाविक है।
मांग: जांच नहीं, “सर्जिकल स्ट्राइक”कौटिल्य फाउंडेशन ने स्पष्ट शब्दों में मांग की है—
सभी सीएमओ कार्यालयों की उच्चस्तरीय एवं स्वतंत्र जांच,वित्तीय लेन-देन का विशेष ऑडिट और जवाबदेही तय,दोषी अधिकारियों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई (निलंबन/बर्खास्तगी तक)
हर कार्यालय में CCTV और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम अनिवार्य,जनसुनवाई प्रणाली को “औपचारिकता” से निकालकर वास्तविक बनाना,अब फैसला सरकार के हाथ में,अब निगाहें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक पर टिकी हैं। सवाल साफ है—क्या सरकार इस “स्वास्थ्य तंत्र की सड़ांध” पर कठोर प्रहार करेगी या फिर यह मामला भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?
यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह केवल प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य अधिकारों के साथ खुला अन्याय माना जाएगा। 

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