राजनीति की प्रेत छाया : अवधारणा और यथार्थ
राजेंद्र नाथ तिवारीराजनीति मूलतः समाज को दिशा देने वाली वह व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य जनकल्याण, न्याय और सुशासन की स्थापना करना होता है। आदर्श रूप में राजनीति लोकमंगल की साधना है, राष्ट्रनिर्माण का साधन है और समाज को सुव्यवस्थित करने की कला है। किंतु जब यही राजनीति अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है और समाज के हर क्षेत्र पर अपने स्वार्थपूर्ण प्रभाव का विस्तार करने लगती है, तब वह एक प्रकार की “प्रेत छाया” का रूप धारण कर लेती है। यह छाया दिखाई तो नहीं देती, किंतु उसका प्रभाव समाज के चरित्र, विचार और व्यवहार पर स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है।
भारत की प्राचीन परंपरा में राजनीति को कभी भी केवल सत्ता प्राप्ति का साधन नहीं माना गया। हमारे चिंतकों ने राजनीति को धर्म और नीति से जोड़कर देखा। आचार्य चाणक्य ने राज्य को लोककल्याण का माध्यम बताया, तो महात्मा गांधी ने राजनीति को नैतिकता और सेवा से जोड़ने की बात कही। उस समय राजनीति का लक्ष्य समाज को संगठित करना और राष्ट्र की शक्ति को सुदृढ़ बनाना था।
परंतु समय के साथ राजनीति का स्वरूप धीरे-धीरे बदलता गया। लोकतंत्र के विस्तार के साथ सत्ता की प्रतिस्पर्धा बढ़ी और राजनीति में सिद्धांतों की जगह स्वार्थ, नैतिकता की जगह अवसरवाद और राष्ट्रहित की जगह दलगत हित प्रमुख होने लगे। परिणामस्वरूप राजनीति केवल शासन की व्यवस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज के प्रत्येक क्षेत्र—शिक्षा, संस्कृति, धर्म, मीडिया और प्रशासन—पर अपना प्रभाव जमाने लगी। यही वह स्थिति है, जब राजनीति समाज पर प्रेत छाया की तरह मंडराने लगती है।
प्रेत छाया का अर्थ यह नहीं कि राजनीति पूरी तरह नकारात्मक हो गई है। राजनीति आज भी लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है और समाज को दिशा देने का महत्वपूर्ण साधन भी। किंतु जब राजनीति का प्रभाव संतुलन खो देता है और हर विषय को केवल सत्ता की दृष्टि से देखा जाने लगता है, तब वह समाज के लिए समस्या बन जाती है। आज कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि किसी सामाजिक या सांस्कृतिक मुद्दे को भी तुरंत राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगता है। इससे वास्तविक समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं और बहस केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाती है।
राजनीति की यह प्रेत छाया सबसे पहले समाज की सोच को प्रभावित करती है। लोग किसी विचार या मुद्दे का मूल्यांकन उसके गुण-दोष के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक निष्ठा के आधार पर करने लगते हैं। इससे समाज में संवाद की जगह विवाद और सहयोग की जगह संघर्ष की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है। लोकतंत्र में स्वस्थ मतभेद आवश्यक हैं, किंतु जब हर मतभेद राजनीतिक ध्रुवीकरण का रूप ले ले, तब समाज की सामूहिक चेतना कमजोर होने लगती है।
इसके अतिरिक्त राजनीति की प्रेत छाया संस्थाओं की निष्पक्षता को भी प्रभावित करती है। शिक्षा, प्रशासन और मीडिया जैसी संस्थाएँ मूलतः समाज के मार्गदर्शक स्तंभ होती हैं। इनका कार्य निष्पक्षता और सत्य के आधार पर समाज को दिशा देना है। लेकिन जब इन संस्थाओं पर राजनीतिक प्रभाव अत्यधिक बढ़ जाता है, तब उनका मूल उद्देश्य कमजोर पड़ने लगता है। परिणामस्वरूप जनता का विश्वास भी धीरे-धीरे कम होने लगता है।
यह स्थिति केवल किसी एक देश या काल की समस्या नहीं है। विश्व के अनेक लोकतांत्रिक समाजों में यह चिंता व्यक्त की जाती रही है कि राजनीति का अत्यधिक प्रभाव समाज के संतुलन को बिगाड़ सकता है। इसलिए एक स्वस्थ लोकतंत्र में यह आवश्यक माना जाता है कि राजनीति और समाज के अन्य क्षेत्रों के बीच एक संतुलित दूरी बनी रहे। राजनीति को दिशा देने का अधिकार जनता के पास हो, न कि जनता की सोच को नियंत्रित करने का अधिकार केवल राजनीति के पास।
फिर भी यह भी सच है कि राजनीति की प्रेत छाया पूरी तरह अनिवार्य नहीं है। यदि समाज जागरूक हो, संस्थाएँ अपने मूल मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहें और राजनीति में नैतिकता तथा जवाबदेही का भाव मजबूत हो, तो राजनीति फिर से लोकमंगल की साधना बन सकती है। लोकतंत्र की शक्ति भी इसी में है कि वह समय-समय पर अपने भीतर सुधार की संभावनाएँ पैदा करता रहता है।
इसलिए “राजनीति की प्रेत छाया” का प्रश्न केवल राजनीति का नहीं, बल्कि पूरे समाज की चेतना का प्रश्न है। जब समाज स्वयं विवेकशील और सजग होगा, तब राजनीति भी अपने मूल उद्देश्य की ओर लौटने के लिए बाध्य होगी।
क्रमशः

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