सत्य, न्याय और संयम से भागता संत समाज
भारतीय सभ्यता में संत परंपरा को सर्वोच्च नैतिक प्रतिष्ठा इसलिए मिली क्योंकि संत को सत्ता से ऊपर और सत्य के प्रति समर्पित माना गया। राजा अन्याय करे तो संत उसे धिक्कार दे—यह भारत की परंपरा रही है। लेकिन आज प्रश्न उल्टा खड़ा हो गया है: जब संतों पर प्रश्न उठते हैं तो क्या संत समाज सत्य, न्याय और संयम से भागने लगता है?
हाल का विवाद, जिसमें आशुतोष ब्रह्मचारी और कथित शंकराचार्य अभिमुक्तेश्वरा नंद,का नाम चर्चा में आया, इस संकट को उजागर करता है। आरोपों की सच्चाई अदालत तय करेगी—यह लोकतंत्र का नियम है। लेकिन उससे पहले जिस प्रकार कुछ तथाकथित संतों ने “नाक काटने पर इनाम” जैसे बयान दिए, वह केवल कानून का ही नहीं बल्कि सनातन धर्म की आत्मा का भी अपमान है।
संत की पहचान क्या है?:संत वह है जो अपमान सहकर भी संयम रखे, जो आलोचना सुनकर भी धैर्य रखे, जो आरोपों का उत्तर शास्त्र और सत्य से दे। लेकिन जब संत ही धमकी, इनाम और भीड़ की भाषा बोलने लगें तो यह केवल व्यक्ति का पतन नहीं होता, पूरी परंपरा की प्रतिष्ठा गिरती है।इतिहास देखिए। जब आदि शंकराचार्य ने भारत में अपने विचारों का प्रचार किया, तब उनके सामने मंडन मिश्रा जैसे प्रखर विद्वान थे। मतभेद इतना तीखा था कि पूरी सभ्यता का बौद्धिक संघर्ष कहा जा सकता था। पर क्या किसी ने तलवार उठाई? क्या किसी ने इनाम घोषित किया? नहीं—वहाँ शास्त्रार्थ हुआ, तर्क हुआ और अंततः सत्य की प्रतिष्ठा हुई।
इसी प्रकार स्वामी दयानंद सरस्वती ने जब मूर्तिपूजा और सामाजिक कुरीतियों पर प्रश्न उठाए तो उनके विरोध में अनेक साधु खड़े हुए। लेकिन उन्होंने हर चुनौती का उत्तर ग्रंथ, तर्क और संवाद से दिया। यही संत परंपरा का स्वभाव था—विवेक, वाणी और विचार।
आज समस्या यह है कि कुछ संत और उनके समर्थक संतत्व को आलोचना से ऊपर समझने लगे हैं। जैसे ही कोई प्रश्न उठे, तुरंत उसे धर्म पर हमला घोषित कर दिया जाता है। यह प्रवृत्ति खतरनाक है। क्योंकि जब संत समाज स्वयं को जांच और प्रश्नों से ऊपर मानने लगेगा, तब समाज के भीतर अंधविश्वास और उन्माद ही पनपेगा।
संतों को यह भी याद रखना चाहिए कि सम्मान पद से नहीं, चरित्र से मिलता है। समाज ने संतों को इसलिए सिर पर नहीं बैठाया कि वे भीड़ की हिंसक भाषा बोलें। समाज ने उन्हें इसलिए सम्मान दिया क्योंकि वे संयम, करुणा और सत्य का जीवंत उदाहरण थे।
यदि किसी संत पर आरोप लगता है तो दो ही रास्ते हैं—
या तो सत्य सामने रखकर स्वयं को निर्दोष सिद्ध करें,
या यदि दोष है तो मर्यादा के साथ न्याय का सामना करें।
लेकिन तीसरा रास्ता—धमकी, इनाम और उन्माद—संत परंपरा का रास्ता कभी नहीं रहा।
आज संत समाज को कठोर आत्ममंथन की आवश्यकता है। क्योंकि यदि संत ही क्रोध और भीड़ की मानसिकता में उतर आएँ, तो फिर समाज को संयम और धर्म का पाठ कौन पढ़ाएगा?
सत्य यह है कि संत का सबसे बड़ा आभूषण गेरुआ वस्त्र नहीं, बल्कि सत्य का साहस होता है।
और जो संत सत्य, न्याय और संयम से भागता है, इतिहास उसे संत नहीं—सत्ता और भीड़ का साधक लिखता है।

Bahut Achcha vishleshan
जवाब देंहटाएं