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सोमवार, 30 मार्च 2026

“अहंकार के शंकराचार्य ?”

 संपादकीय ,राजेंद्र नाथ,तिवारी,मुख्य संपादक,30 मार्च, 26,समय 5.50 प्रातः 

 धर्म, अहंकार और राजनीति: संत की वाणी या समय का संकट?


सनातन परंपरा में शंकराचार्य का पद केवल एक धार्मिक उपाधि नहीं, बल्कि विवेक, आत्मसंयम और समग्र समाज के नैतिक नेतृत्व का प्रतीक है। ऐसे में जब  ज्योतिष्मठ पीठाधीश्वर स्वामी अभिमुक्तेश्वरान्द सरस्वती के वक्तव्यों में तीखापन, आक्रोश और राजनीतिक बदले की  भावना के संकेत दिखाई देते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का बयान नहीं रह जाता—यह पूरे धर्म-संवाद की दिशा पर प्रश्नचिह्न बन जाता है।आज आवश्यकता है कि हम व्यक्ति नहीं, प्रवृत्ति को समझें। क्योंकि संकट किसी एक संत या नेता का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो धर्म और राजनीति के बीच की सूक्ष्म रेखा को धुंधला कर रही है।

 अहंकार बनाम धर्म—मूल संघर्ष,धर्म का मूल तत्व त्याग, करुणा और विनम्रता है। वहीं अहंकार का आधार है—स्वयं को केंद्र में रखना। जब धर्म के मंच से ही अहंकार की गूंज सुनाई देने लगे, तो यह संकेत है कि कहीं न कहीं आत्ममंथन की आवश्यकता है।अहंकार का स्वभाव है—वह सुधार नहीं करता, वह प्रतिक्रिया करता है।धर्म का स्वभाव है—वह प्रतिक्रिया नहीं, समाधान देता है।

यदि संत की वाणी में क्रोध का “हिमालय” खड़ा हो जाए, तो वह शीतल गंगा की तरह बहने वाली धर्म धारा को रोक देता है। और जब धर्म का प्रवाह रुकता है, तो समाज में विचारों का ठहराव और विभाजन दोनों जन्म लेते हैं।

 कर्मकांड और कुप्रथा—उठाना आवश्यक, पर मर्यादा के साथ#यह भी उतना ही सत्य है कि सनातन धर्म के भीतर समय के साथ कुछ कुप्रथाएं और अति-कर्मकांड घर कर जाते हैं। उन्हें चुनौती देना, सुधार करना और समाज को जागरूक करना—यह स्वयं धर्म का ही कर्तव्य है।परंतु प्रश्न यह है कि क्या सुधार की भाषा संयमित होनी चाहिए या आक्रामक?यदि सुधार के नाम पर कटुता आ जाए, तो वह सुधार नहीं, संघर्ष बन जाता है।यदि धर्म के भीतर सुधार का स्वर ही विभाजनकारी हो जाए, तो वह समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने का माध्यम बन जाता है।सनातन की शक्ति उसकी सहिष्णुता और आत्मशुद्धि में है—न कि आक्रोश में।

 धर्म और राजनीति—एक खतरनाक संगम धर्म और राजनीति का संबंध सदैव जटिल रहा है। धर्म समाज को दिशा देता है, जबकि राजनीति सत्ता को। जब धर्म राजनीति के प्रभाव में आता है, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगता है।आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या संत राजनीति के शिकार हो रहे हैं, या राजनीति संतों का उपयोग कर रही है?जब धार्मिक मंचों से राजनीतिक उपमाएं और आरोप उभरने लगते हैं, तो यह संकेत है कि कहीं न कहीं धर्म का मंच राजनीतिक विमर्श का अखाड़ा बन रहा है।

 योगी, घनानंद और चाणक्य—उपमाओं का संकट यदि किसी राजनीतिक नेतृत्व—जैसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ—को “घनानंद” जैसे ऐतिहासिक प्रतीकों से जोड़ा जाता है, तो यह केवल आलोचना नहीं, बल्कि विमर्श की दिशा तय करने वाला वक्तव्य बन जाता है। घनानंद—इतिहास में पतन और विलासिता का प्रतीक।चाणक्य—नीति, रणनीति और राष्ट्रनिर्माण का प्रतीक।ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या उद्देश्य केवल आलोचना है, या कोई वैकल्पिक दृष्टि भी प्रस्तुत की जाएगी? यदि आप किसी को “घनानंद” कहते हैं, तो क्या आपके पास “चाणक्य” जैसी दृष्टि भी है?यदि नहीं, तो यह आलोचना केवल आक्रोश बनकर रह जाती है, समाधान नहीं।

 संत का धर्म: टकराव नहीं, समाधान संत का कार्य समाज को दिशा देना है, न कि उसे और अधिक ध्रुवीकृत करना।संत वह होता है जो अग्नि को भी शीतल कर दे, न कि शीतलता को अग्नि बना दे।यदि संत की वाणी ही संघर्ष का कारण बनने लगे, तो यह धर्म के लिए चेतावनी है।यदि अहंकार का त्याग नहीं हुआ, तो संगठन की रक्षा नहीं हो सकती।यदि क्रोध हावी रहा, तो धर्म का संदेश खो जाएगा

 समय का सबसे बड़ा प्रश्न ?

आज सनातन के सामने सबसे बड़ा संकट बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है।यह संकट है—वाणी की मर्यादा, विचार की दिशा और नेतृत्व की जिम्मेदारी का।सुधार आवश्यक है, प्रश्न आवश्यक है—परंतु संयम, संतुलन और समाधान के साथ।धर्म का मंच राजनीति का उपकरण नहीं बनना चाहिए, और राजनीति को धर्म की आड़ नहीं लेनी चाहिए।

अंततः—धर्म की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विनम्रता है,और जब विनम्रता समाप्त होती है, तो धर्म केवल वाद-विवाद बनकर रह जाता है। आंतरिक विकारों से बचिए  अभिमुकेश्वरांद जी!इतिहास के पास अनेक संतो के मान अपमान की धरोहर है अपने ऊपर परिकर की हथियार के रूप में उन्होंने क्षमा की,अपनाया,अहंकार को नहीं!

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