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गुरुवार, 19 मार्च 2026

वन्देमातरम् : सेक्युलर भ्रम की राजनीति और राष्ट्रचेतना का संघर्ष 81

वन्देमातरम श्रृंखला 81

 वन्देमातरम् : सेक्युलर भ्रम की राजनीति और राष्ट्रचेतना का संघर्ष,

राजेंद्र नाथ तिवारी, प्रमुख सम्पादक, कौटिल्य का भारत, 19-3-26,3.30


भारतीय राष्ट्रजीवन में कुछ शब्द केवल शब्द नहीं होते, वे इतिहास की धड़कन बन जाते हैं। “वन्देमातरम्” ऐसा ही एक शब्द है। यह मात्र गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा, राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा और सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष है। परन्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जिस प्रकार इस गीत को तथाकथित “सेक्युलरवाद” के नाम पर विवादों में घसीटा गया, वह भारतीय राजनीति और बौद्धिक जगत की एक गंभीर विडम्बना को उजागर करता है।आज “वन्देमातरम्” पर जो प्रश्न उठाए जाते हैं, वे वास्तव में किसी गीत के शब्दों पर नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा पर प्रश्न हैं। इस पूरे विवाद का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि यह विवाद इतिहास या संवैधानिक सिद्धांतों से अधिक राजनीतिक स्वार्थों और वैचारिक भ्रम का परिणाम है।

वन्देमातरम् की उत्पत्ति और राष्ट्रीय चेतना=“वन्देमातरम्” की रचना महान साहित्यकार बाँकीम चंद्र छत्तर्जी ने उन्नीसवीं शताब्दी में की थी। यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास की पृष्ठभूमि भारत में हुए संन्यासी रिबेलियन से जुड़ी है, जिसमें साधुओं और किसानों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया था।

इस गीत में भारतभूमि को माता के रूप में संबोधित करते हुए उसकी वंदना की गयी है। यहाँ माता कोई धार्मिक देवी नहीं, बल्कि राष्ट्र का सांस्कृतिक रूपक है। भारत की परंपरा में भूमि को माता मानने की भावना अत्यंत प्राचीन है। वेदों में भी “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” का उल्लेख मिलता है, अर्थात पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं।जब यह गीत सामने आया तो उसने भारतीयों के हृदय में राष्ट्रभक्ति की नई चेतना उत्पन्न की। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्षरत लोगों के लिए यह गीत एक मंत्र की तरह बन गया।

स्वतंत्रता आंदोलन का उद्घोष=बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जब अंग्रेजों ने पार्टीशन of बंगाल (1905) किया, तब पूरे देश में व्यापक आंदोलन हुआ। उस समय “वन्देमातरम्” आंदोलन का मुख्य नारा बन गया।विद्यालयों, सभाओं और जुलूसों में यह गीत गूंजता था। अंग्रेज सरकार इस गीत से इतनी भयभीत थी कि उसने कई स्थानों पर इसे गाने तक पर प्रतिबंध लगा दिया।स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक महान नेताओं ने इस गीत को राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक माना। श्री औरोबिंदो ने कहा था कि “वन्देमातरम् भारत की आत्मा का गीत है।” इसी प्रकार रबिन्द्रनाथ टैगोर और सुभास चंद्र बोस जैसे नेताओं ने भी इसे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक माना।

उस दौर में यह गीत किसी धर्म या समुदाय का नहीं बल्कि पूरे भारत का था। स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले लाखों लोगों ने इसे गाते हुए जेल यात्राएँ कीं और बलिदान दिए।1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने स्वयं को एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। संविधान सभा में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के प्रश्न पर भी चर्चा हुई।अंततः निर्णय हुआ कि जाना गाना मना को राष्ट्रगान और वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जाएगा।यह निर्णय इस बात का प्रमाण था कि संविधान निर्माताओं ने वन्देमातरम् के ऐतिहासिक महत्व और राष्ट्रीय भावना को पूरी तरह स्वीकार किया।परन्तु इसके बाद धीरे-धीरे भारतीय राजनीति में एक नई विचारधारा उभरी, जिसमें सेक्युलरवाद की ऐसी व्याख्या की गयी जिसमें अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से दूरी बनाना आधुनिकता और उदारवाद का प्रतीक माना जाने लगा।

सेक्युलरवाद की विकृत व्याख्या=भारत का मूल स्वभाव सदैव बहुलतावादी रहा है। यहाँ विभिन्न धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ सहअस्तित्व में रही हैं। भारतीय परंपरा का सेक्युलरवाद पश्चिमी देशों से भिन्न है।पश्चिम में सेक्युलरवाद का अर्थ चर्च और राज्य का अलगाव है, जबकि भारत में इसका अर्थ सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान है।लेकिन स्वतंत्रता के बाद कुछ राजनीतिक और बौद्धिक वर्गों ने सेक्युलरवाद की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की जिसमें भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों को ही संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा।यही कारण है कि “वन्देमातरम्” जैसे राष्ट्रगीत को भी विवाद का विषय बनाया गया।वन्देमातरम् पर आपत्तियाँ और उनका विश्लेषण है कुछ लोगों ने यह तर्क दिया कि इस गीत में भारतभूमि को देवी के रूप में चित्रित किया गया है, इसलिए यह एक धार्मिक प्रतीक है और सभी समुदायों के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।परन्तु यह तर्क ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कमजोर है।भारत की सांस्कृतिक परंपरा में “माता” का रूपक केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति है। “भारत माता” का भाव उसी प्रकार है जैसे “मदर लैंड” या “फादरलैंड” की अवधारणा अन्य देशों में है।इसलिए वन्देमातरम् को धार्मिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना वस्तुतः एक वैचारिक भ्रम है।

राजनीतिक स्वार्थ और वोट बैंक=वास्तव में वन्देमातरम् पर विवाद का मुख्य कारण राजनीतिक स्वार्थ है। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति में वोट बैंक की प्रवृत्ति बढ़ी।कुछ राजनीतिक दलों ने यह मान लिया कि यदि वे राष्ट्रवादी प्रतीकों से दूरी बनाएंगे तो उन्हें कुछ समुदायों का समर्थन मिलेगा।परिणामस्वरूप राष्ट्रगीत, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रीय प्रतीकों तक को राजनीतिक विवादों में घसीटा गया।यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय प्रतीक किसी दल या विचारधारा के नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के होते हैं।

राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान है किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी सीमाओं से नहीं बल्कि उसकी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से बनती है।भारत की संस्कृति हजारों वर्षों की सभ्यता का परिणाम है। इस संस्कृति में भूमि को माता मानने की भावना, प्रकृति के प्रति सम्मान और राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना गहराई से जुड़ी हुई है।

“वन्देमातरम्” इसी सांस्कृतिक भावना का काव्यात्मक रूप है।यदि किसी राष्ट्र से उसके सांस्कृतिक प्रतीक छीन लिए जाएँ तो उसकी राष्ट्रीय चेतना कमजोर पड़ जाती है। इसलिए वन्देमातरम् का सम्मान केवल एक गीत का सम्मान नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और इतिहास का सम्मान है।बौद्धिक वर्ग की भूमिका है इस विवाद में एक वर्ग भारतीय बौद्धिक जगत का भी है जिसने पश्चिमी विचारधाराओं को बिना आलोचनात्मक दृष्टि के अपनाया।कुछ बुद्धिजीवियों ने यह धारणा बना ली कि राष्ट्रवाद स्वयं में संदेहास्पद है और उससे दूरी बनाना ही प्रगतिशीलता का प्रमाण है।परन्तु यह दृष्टिकोण न तो ऐतिहासिक रूप से सही है और न ही व्यावहारिक रूप से।दुनिया के लगभग सभी देशों में राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान किया जाता है। अमेरिका, फ्रांस, जापान और अन्य देशों में राष्ट्रगीत और राष्ट्रध्वज को अत्यंत सम्मान दिया जाता है।भारत में ही यदि राष्ट्रगीत पर प्रश्न उठाए जाएँ तो यह एक विचित्र स्थिति है।

समाज की भूमिका है वन्देमातरम् का वास्तविक सम्मान सरकार या कानून से नहीं बल्कि समाज की चेतना से सुनिश्चित होता है।जब तक भारत के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करेंगे, तब तक कोई भी राजनीतिक विवाद इस गीत की गरिमा को कम नहीं कर सकता।विद्यालयों, सामाजिक कार्यक्रमों और राष्ट्रीय पर्वों में इस गीत का सम्मानपूर्वक गायन नई पीढ़ी में राष्ट्रभक्ति की भावना को मजबूत करता है।

“वन्देमातरम्” पर खड़ा किया गया विवाद वास्तव में एक सेक्युलर भ्रम है। यह भ्रम इतिहास की समझ के अभाव और राजनीतिक स्वार्थों से उत्पन्न हुआ है।यह गीत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का गौरवपूर्ण प्रतीक है। इसमें किसी धर्म विशेष का आग्रह नहीं बल्कि मातृभूमि के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना है।आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इतिहास को सही दृष्टि से समझें और राष्ट्र के प्रतीकों को राजनीतिक विवादों से ऊपर रखें।

“वन्देमातरम्” केवल एक गीत नहीं है—यह भारत की आत्मा का स्वर, स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति और राष्ट्रभक्ति की अमर प्रेरणा है।जब भी भारत की धरती पर स्वतंत्रता, स्वाभिमान और राष्ट्रप्रेम की चर्चा होगी, तब यह उद्घोष अवश्य गूंजेगा—वन्दे मातरम्।🙏


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