“विजन 2047 बनाम सहकारिता की सुस्ती: क्या अफसरशाही के आगे दम तोड़ देगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था?”
बस्ती, हरिओम प्रकाश संवाददाता, कौटिल्य का भारत, 19-3-26
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन 2047 में भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनाने की जो परिकल्पना है, उसकी आधारशिला गांव और ग्राम अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। इसी उद्देश्य से केंद्र सरकार ने सहकारिता को नई ऊर्जा देने के लिए सहकारिता मंत्रालय को सक्रिय किया और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने गांव-गांव सहकारी समितियों के गठन का अभियान प्रारम्भ कराया।उत्तर प्रदेश में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार तथा सहकारिता राज्य मंत्री जेपीएस . राठौर लगातार यह दावा करते रहे हैं कि सहकारिता के माध्यम से किसानों और ग्रामीणों को एक ही छत के नीचे सभी आर्थिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। योजना का उद्देश्य स्पष्ट है—गांव की अर्थव्यवस्था को सहकारी समितियों के माध्यम से मजबूत करना और ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाना।
लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार की नीति इतनी स्पष्ट और मजबूत है, तो फिर जमीन पर यह योजना क्यों दम तोड़ती दिखाई दे रही है?असल समस्या वहां खड़ी हो जाती है जहां से योजनाओं को गति मिलनी चाहिए—यानी विभागीय अफसरशाही के स्तर पर। सहकारिता विभाग के कुछ उच्च अधिकारियों की उदासीनता और कार्यशैली के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना कई जगह कागजों में सिमटती जा रही है।बस्ती मंडल के जिलों—बस्ती , संत कबीर नगर और सिद्धार्थनगर —में सहकारी समितियों के गठन की स्थिति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां सरकार की ओर से एक जिम्मेदार और तकनीकी रूप से दक्ष व्यक्ति को गांव-गांव समितियां गठित करने का दायित्व सौंपा गया। ग्रामीणों में उत्साह भी है और समितियों के गठन के लिए लोग आगे भी आ रहे हैं।
लेकिन जैसे ही प्रस्ताव सहायक निबंधक सहकारिता के माध्यम से संयुक्त निबंधक सहकारिता के कार्यालय पहुंचते हैं, वहां फाइलों का पहाड़ खड़ा हो जाता है। महीनों तक प्रस्ताव लंबित पड़े रहते हैं और समितियों का पंजीकरण ठंडे बस्ते में चला जाता है।
बताया जाता है कि संयुक्त निबंधक के पास दो मंडलों का प्रभार है और तमाम प्रशासनिक कार्यों का दबाव भी है। लेकिन यह भी सच है कि यदि अधिकारी चाहें तो प्रशासनिक व्यवस्था बनाकर कार्य को गति दे सकते हैं। दुर्भाग्य यह है कि यहां प्राथमिकता ही गायब दिखाई देती है।सूत्र बताते हैं कि समितियों के प्रस्तावों को सीमित संख्या में भेजने की सलाह दी जाती है—जैसे यह कोई विकास योजना नहीं बल्कि औपचारिकता निभाने का कार्य हो। यह स्थिति सहकारिता आंदोलन के साथ एक प्रकार का अन्याय है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब बस्ती मंडल में लगभग तीन हजार सहकारी समितियों के गठन की संभावना है, तब यदि एक वर्ष में मुश्किल से दस समितियां ही पंजीकृत हो पाती हैं तो यह किसकी विफलता है?क्या यही वह प्रशासनिक गति है जिसके सहारे भारत 2047 तक आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है?
सहकारिता की आत्मा सहकारी समितियां होती हैं। यदि समितियां ही समय पर गठित नहीं होंगी तो सहकारिता का पूरा ढांचा खोखला हो जाएगा।सरकार सुविधा देना चाहती है, जनता सुविधा लेने को तैयार है, ग्रामीण समाज उत्साहित है—लेकिन यदि विभागीय अफसरों के पास समय ही नहीं है तो यह योजना आगे कैसे बढ़ेगी?
यह स्थिति केवल प्रशासनिक शिथिलता नहीं, बल्कि सरकार की महत्वाकांक्षी नीति के साथ अन्याय भी है। यदि यही गति रही तो आने वाले वर्षों में यह सवाल और तीखा होगा कि क्या सहकारिता के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का सपना केवल भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा?अब समय आ गया है कि सहकारिता विभाग की कार्यशैली की गंभीर समीक्षा हो। जिम्मेदारी तय हो और समितियों के पंजीकरण की प्रक्रिया को तेज किया जाए।क्योंकि यदि सहकारिता की प्राणवायु—सहकारी समितियां—ही दम तोड़ने लगें, तो फिर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का सपना भी अधूरा ही रह जाएगा।
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