राष्ट्रवादी संपादकीय
ईरान की सत्ता पर प्रहार और भारत के लिए नया भू-राजनीतिक क्षण
मध्य-पूर्व एक बार फिर इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की अमेरिकी-इजरायली संयुक्त सैन्य कार्रवाई में मृत्यु ने न केवल पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को हिला दिया है, बल्कि वैश्विक राजनीति के नए अध्याय का द्वार भी खोल दिया है। ईरानी सरकारी मीडिया ने स्वयं उनकी मौत की पुष्टि की है और देश में शोक घोषित किया गया है। यह भारत के लिए भी आत्म विश्लेषण का भी समय है.
यह घटना केवल एक नेता की मृत्यु नहीं, बल्कि एक वैचारिक धुरी के टूटने का संकेत है और भारत को इसे भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से देखना होगा।
पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन का पुनर्लेखन होगा.चार दशक से अधिक समय तक ईरान की विदेश नीति, प्रतिरोध राजनीति और क्षेत्रीय प्रभाव का केंद्र खामेनेई रहे। उनके नेतृत्व में ईरान ने इराक, सीरिया, लेबनान और यमन तक प्रभाव का नेटवर्क बनाया।अब उनके हटने से तीन संभावनाएँ उभर रही हैं:ईरान में सत्ता संघर्ष और आंतरिक अस्थिरता बढ़ेगी,सैन्य प्रतिष्ठान (IRGC) का अधिक कठोर नियंत्रण
या पश्चिम समर्थित राजनीतिक पुनर्संरचना सम्भव है,इस अस्थिरता का सीधा प्रभाव तेल बाजार, समुद्री व्यापार मार्ग और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ेगा — और यही वह बिंदु है जहाँ भारत का राष्ट्रीय हित जुड़ता है।
भारत के लिए खतरा भी, अवसर भी:भारत का ईरान से संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और रणनीतिक रहा है। भारत के प्रमुख हित ऊर्जा आयात और तेल आपूर्ति प्रभावित होसकती है,चाबहार बंदरगाह के माध्यम से मध्य एशिया तक पहुँच एक बड़ा संशय है,अफगानिस्तान और यूरो-एशिया व्यापार मार्ग
भारतीय प्रवासी और समुद्री सुरक्षा भी प्रभावित होंगी.
यदि क्षेत्रीय युद्ध बढ़ता है तो:तेल कीमतों में उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा,पश्चिम एशिया में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा चुनौती बनेगी
हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक तनाव बढ़ सकता है लेकिन दूसरी ओर — शक्ति-संतुलन बदलने से भारत को “निर्भर साझेदार” नहीं बल्कि “स्वतंत्र मध्यस्थ शक्ति” बनने का अवसर भी मिल सकता है।
ईरान की सत्ता पर प्रहार और भारत के लिए नया भू-राजनीतिक क्षण
मध्य-पूर्व एक बार फिर इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की अमेरिकी-इजरायली संयुक्त सैन्य कार्रवाई में मृत्यु ने न केवल पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को हिला दिया है, बल्कि वैश्विक राजनीति के नए अध्याय का द्वार भी खोल दिया है। ईरानी सरकारी मीडिया ने स्वयं उनकी मौत की पुष्टि की है और देश में शोक घोषित किया गया है। यह भारत के लिए भी आत्म विश्लेषण का भी समय है.
यह घटना केवल एक नेता की मृत्यु नहीं, बल्कि एक वैचारिक धुरी के टूटने का संकेत है और भारत को इसे भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से देखना होगा।
पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन का पुनर्लेखन होगा.चार दशक से अधिक समय तक ईरान की विदेश नीति, प्रतिरोध राजनीति और क्षेत्रीय प्रभाव का केंद्र खामेनेई रहे। उनके नेतृत्व में ईरान ने इराक, सीरिया, लेबनान और यमन तक प्रभाव का नेटवर्क बनाया।अब उनके हटने से तीन संभावनाएँ उभर रही हैं:ईरान में सत्ता संघर्ष और आंतरिक अस्थिरता बढ़ेगी,सैन्य प्रतिष्ठान (IRGC) का अधिक कठोर नियंत्रण
या पश्चिम समर्थित राजनीतिक पुनर्संरचना सम्भव है,इस अस्थिरता का सीधा प्रभाव तेल बाजार, समुद्री व्यापार मार्ग और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ेगा — और यही वह बिंदु है जहाँ भारत का राष्ट्रीय हित जुड़ता है।
भारत के लिए खतरा भी, अवसर भी:भारत का ईरान से संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और रणनीतिक रहा है। भारत के प्रमुख हित ऊर्जा आयात और तेल आपूर्ति प्रभावित होसकती है,चाबहार बंदरगाह के माध्यम से मध्य एशिया तक पहुँच एक बड़ा संशय है,अफगानिस्तान और यूरो-एशिया व्यापार मार्ग
भारतीय प्रवासी और समुद्री सुरक्षा भी प्रभावित होंगी.
यदि क्षेत्रीय युद्ध बढ़ता है तो:तेल कीमतों में उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा,पश्चिम एशिया में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा चुनौती बनेगी
हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक तनाव बढ़ सकता है लेकिन दूसरी ओर — शक्ति-संतुलन बदलने से भारत को “निर्भर साझेदार” नहीं बल्कि “स्वतंत्र मध्यस्थ शक्ति” बनने का अवसर भी मिल सकता है।
भारत की राष्ट्रवादी विदेश नीति की कसौटी::भारत की परंपरा गुटनिरपेक्षता नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता रही है। आज आवश्यकता है कि भारत:अमेरिका या पश्चिम एशियाई ध्रुवों में खुलकर पक्ष न ले या संवाद की भूमिका निभाए,ऊर्जा और व्यापार हितों को प्राथमिकता दे क्षेत्रीय स्थिरता के पक्ष में संतुलित बयान दे
राष्ट्रवाद का अर्थ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित की ठंडी और स्पष्ट गणना है।
नया विश्व-क्रम: भारत की ऐतिहासिक भूमिका::आज विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा और अब ईरान संकट — ये संकेत हैं कि पुरानी विश्व व्यवस्था टूट रही है।ऐसे समय भारत के सामने तीन विकल्प हैं:दर्शक बने रहना,किसी गुट का अनुयायी बनना,या सभ्यतागत शक्ति के रूप में निर्णायक भूमिका निभाना
तीसरा मार्ग ही भारत की ऐतिहासिक नियति है।
राष्ट्रवाद का अर्थ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित की ठंडी और स्पष्ट गणना है।
नया विश्व-क्रम: भारत की ऐतिहासिक भूमिका::आज विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन-अमेरिका प्रतिस्पर्धा और अब ईरान संकट — ये संकेत हैं कि पुरानी विश्व व्यवस्था टूट रही है।ऐसे समय भारत के सामने तीन विकल्प हैं:दर्शक बने रहना,किसी गुट का अनुयायी बनना,या सभ्यतागत शक्ति के रूप में निर्णायक भूमिका निभाना
तीसरा मार्ग ही भारत की ऐतिहासिक नियति है।
(राष्ट्रवादी दृष्टि)
ईरान की सत्ता पर हुआ यह प्रहार केवल मध्य-पूर्व की घटना नहीं है; यह उस विश्व-व्यवस्था के अंत का संकेत है जहाँ कुछ शक्तियाँ नियम तय करती थीं।भारत को अब प्रतिक्रियात्मक राष्ट्र नहीं, बल्कि संतुलन निर्माता (Balance Maker) बनना होगा।
क्योंकि आने वाला युग सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि सभ्यतागत स्थिरता और रणनीतिक बुद्धिमत्ता से तय होगा — और यदि भारत ने सही समय पहचाना, तो यह संकट भारत के उदय का अवसर भी बन सकता है।
ईरान की सत्ता पर हुआ यह प्रहार केवल मध्य-पूर्व की घटना नहीं है; यह उस विश्व-व्यवस्था के अंत का संकेत है जहाँ कुछ शक्तियाँ नियम तय करती थीं।भारत को अब प्रतिक्रियात्मक राष्ट्र नहीं, बल्कि संतुलन निर्माता (Balance Maker) बनना होगा।
क्योंकि आने वाला युग सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि सभ्यतागत स्थिरता और रणनीतिक बुद्धिमत्ता से तय होगा — और यदि भारत ने सही समय पहचाना, तो यह संकट भारत के उदय का अवसर भी बन सकता है।
अब भारत के पास दो ही विकल्प बचे है या तो अमरीकी- इजराइली सहमति क़ो आगे बढ़ाये या बेलेंस मेकर बने.

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