चैटिंग की लत: मुस्कान छीनती डिजिटल दुनिया
मनोरंजन के नाम पर बढ़ रहा तन-मन का तनाव — प्रो. डॉ. नवीन सिंह
बस्ती। हाथों में चमकती स्क्रीन आज संवाद का साधन जरूर बन गई है, लेकिन यही स्क्रीन धीरे-धीरे लोगों की सेहत और मानसिक शांति को निगलती जा रही है। चैटिंग और इंटरनेट सर्फिंग की बढ़ती लत अब सुविधा नहीं, बल्कि चिंता का विषय बन चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल की आभासी दुनिया में डूबता समाज अनजाने में अपने शरीर और मन पर भारी बोझ डाल रहा है।
अखण्ड एक्यूप्रेशर रिसर्च ट्रेनिंग एंड ट्रीटमेंट इंस्टीट्यूट, प्रयागराज के निदेशक प्रोफेसर डॉ. नवीन सिंह चेताते हैं कि तकनीक का अतिरेक इंसान को भीतर से कमजोर कर रहा है। उनका कहना है कि लगातार मोबाइल पर समय बिताने से नींद कम हो रही है, तनाव बढ़ रहा है और आंखों व हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
बेचैन दिमाग, अधूरी नींद
डॉ. सिंह बताते हैं कि देर रात तक चैटिंग में उलझा मस्तिष्क कभी विश्राम नहीं कर पाता। इसका परिणाम थकान, चिड़चिड़ापन और मानसिक असंतुलन के रूप में सामने आता है। धीरे-धीरे यह आदत जीवनशैली को अव्यवस्थित कर देती है और व्यक्ति को भीतर से खालीपन व बेचैनी की ओर धकेलती है।
थकी आंखें, कमजोर शरीर
घंटों स्क्रीन पर टिके रहना आंखों में जलन, सूखापन और दृष्टि पर असर डाल रहा है। साथ ही, शारीरिक गतिविधि की कमी और डिजिटल निर्भरता हृदय रोग तथा उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं के जोखिम को बढ़ा रही है।
झुकती रीढ़, घटती जीवन शक्ति
मोबाइल पर लगातार झुके रहना केवल आदत नहीं, शरीर के लिए खतरे का संकेत है। गर्दन, रीढ़ और नसों पर दबाव बढ़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके दूरगामी प्रभाव प्रजनन स्वास्थ्य तक को प्रभावित कर सकते हैं — जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी चिंता का विषय है।
संतुलन ही समाधान
डॉ. नवीन सिंह का संदेश स्पष्ट है —
“तकनीक का उपयोग करें, उसकी गुलामी नहीं। जीवन की वास्तविक खुशियां स्क्रीन से बाहर हैं।”
वे सलाह देते हैं कि स्क्रीन टाइम सीमित रखें, सोने से पहले मोबाइल से दूरी बनाएं और परिवार व समाज के साथ वास्तविक संवाद को महत्व
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