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रविवार, 8 फ़रवरी 2026

वन्देमातरम् और भाषा की राजनीति 81

वबदेमातरम 81

वन्देमातरम् और भाषा की राजनीति

भारतीय सभ्यता में शब्द केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होते, वे चेतना, संस्कृति और सामूहिक स्मृति के वाहक होते हैं। भारत जैसे बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक देश में भाषा का प्रश्न केवल व्याकरण या ध्वनि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पहचान, सत्ता, राजनीति और राष्ट्रवाद से जुड़ जाता है। इसी संदर्भ में “वन्देमातरम्” एक ऐसा शब्द-समूह है जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में जनभावनाओं को प्रज्ज्वलित किया, परन्तु स्वतंत्रता के बाद वह भाषा और राजनीति के विवादों में भी उलझा रहा।

“वन्देमातरम्” का अर्थ है — “माँ, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।” यहाँ माँ केवल जैविक माँ नहीं बल्कि मातृभूमि का प्रतीक है। यह वाक्यांश भावनात्मक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मानस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। किन्तु प्रश्न यह है कि क्या यह केवल एक राष्ट्रगीत है या भाषा की राजनीति का भी हिस्सा बन चुका है? इस निबंध में हम इसी प्रश्न का विवेचन करेंगे।

वन्देमातरम् का ऐतिहासिक उद्भव:“वन्देमातरम्” की उत्पत्ति बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनन्दमठ (1882) से हुई। यह गीत संस्कृतनिष्ठ बंगला शैली में लिखा गया था, जिसमें भारत माता को देवी-स्वरूप में चित्रित किया गया। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे भारतीयों के लिए यह गीत प्रेरणा का स्रोत बना।1905 में बंग-भंग आंदोलन के समय “वन्देमातरम्” एक नारा बन गया। यह केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। सड़कों पर, सभाओं में, विद्यालयों में — हर जगह यह राष्ट्रवादी चेतना का घोष बन गया।इस प्रकार भाषा का एक सांस्कृतिक उत्पाद राजनीतिक हथियार में परिवर्तित हो गया। यहीं से भाषा और राजनीति के अंतर्संबंध की शुरुआत दिखाई देती है।

भाषा और राष्ट्रवाद का संबंध:भाषा राष्ट्रवाद का एक प्रमुख आधार रही है। यूरोप में भी राष्ट्र-राज्यों के निर्माण में भाषा ने केंद्रीय भूमिका निभाई। भारत में स्थिति भिन्न थी — यहाँ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ थीं। इसलिए राष्ट्रीय एकता के लिए किसी एक भाषा या प्रतीक की खोज स्वाभाविक थी।

“वन्देमातरम्” ने उस शून्य को भरा।यह किसी एक क्षेत्र की भाषा तक सीमित नहीं रहा।इसमें संस्कृत शब्दावली थी, जो भारतीय परंपरा से जुड़ाव का भाव जगाती थी।यह राष्ट्र को मातृरूप में प्रस्तुत करता था, जिससे भावनात्मक एकता बनी।परन्तु यहीं से समस्या भी उत्पन्न हुई — जब एक प्रतीक को राष्ट्रीय पहचान का आधार बनाया जाता है, तो विविधता के बीच मतभेद भी उभरते हैं।स्वतंत्रता संग्राम में वन्देमातरम् की भूमिका-स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान “वन्देमातरम्” का महत्व असाधारण था।क्रांतिकारी इसे उद्घोष के रूप में प्रयोग करते थे।

सभाओं में इसे गाना राष्ट्रीय कर्तव्य माना जाता था।ब्रिटिश सरकार ने इसे कई स्थानों पर प्रतिबंधित भी किया।यह गीत लोगों को एकजुट करता था। उस समय भाषा विवाद गौण थे — प्रमुख लक्ष्य स्वतंत्रता था। इसलिए “वन्देमातरम्” को व्यापक स्वीकृति मिली।किन्तु स्वतंत्रता के बाद, जब राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई, तो भाषा और प्रतीकों के चयन को लेकर नई बहसें सामने आईं।

भाषा की राजनीति: स्वतंत्रता के बाद का परिदृश्य:स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न था — राष्ट्रीय पहचान के प्रतीकों का चयन।राष्ट्रीय भाषा कौन हो?राष्ट्रगान क्या हो?राष्ट्रगीत की भूमिका क्या हो?

“वन्देमातरम्” को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला, जबकि “जन गण मन” राष्ट्रगान बना। यह समझौता राजनीतिक और सांस्कृतिक संतुलन का परिणाम था।यहाँ भाषा की राजनीति स्पष्ट दिखाई देती है —कुछ समूहों ने संस्कृतनिष्ठ भाषा को भारतीय परंपरा का प्रतिनिधि माना।कुछ ने इसे सीमित और विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भों से जुड़ा बताया।कुछ ने इसे क्षेत्रीय विविधता के संदर्भ में चुनौती दी।

इस प्रकार “वन्देमातरम्” केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक विमर्श का विषय बन गया।धर्म, पहचान और भाषा का प्रश्न-भाषा का राजनीति से जुड़ाव अक्सर पहचान के प्रश्न से होता है। “वन्देमातरम्” में भारत माता को देवी के रूप में चित्रित किया गया है। कुछ समूहों ने इसे सांस्कृतिक गौरव के रूप में स्वीकार किया, जबकि कुछ ने इसे धार्मिक प्रतीकवाद से जोड़ा।यह विवाद हमें यह समझने का अवसर देता है कि भारत में भाषा और धर्म का संबंध कितना जटिल है।एक ही शब्द अलग-अलग समुदायों में अलग अर्थ ग्रहण कर सकता है।राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर सहमति बनाना कठिन हो जाता है।इस प्रकार भाषा राजनीति का उपकरण बन जाती है — समर्थन और विरोध दोनों के लिए।

मीडिया और समकालीन राजनीति में वन्देमातरम्- के समय में “वन्देमातरम्” केवल इतिहास का विषय नहीं है।चुनावी सभाओं में इसका प्रयोग होता है।सोशल मीडिया में यह बहस का केंद्र बन जाता है।इसे राष्ट्रभक्ति की कसौटी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।यहाँ भाषा भावनाओं को उद्वेलित करने का माध्यम बनती है। राजनीतिक दल और समूह इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से उपयोग करते हैं।इससे यह प्रश्न उठता है —

क्या भाषा एकता का माध्यम है या विभाजन का?उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि उसे कैसे प्रयोग किया जा रहा है।वन्देमातरम्: सांस्कृतिक विरासत या राजनीतिक प्रतीक?वास्तव में “वन्देमातरम्” दोनों है।यह सांस्कृतिक विरासत है क्योंकि यह स्वतंत्रता आंदोलन और साहित्य से जुड़ा है।यह राजनीतिक प्रतीक है क्योंकि इसका उपयोग पहचान और विचारधारा के संदर्भ में होता है।इस दोहरे स्वरूप को समझे बिना इसके महत्व को पूर्णतः नहीं समझा जा सकता।

भाषा की राजनीति के व्यापक निहितार्थ-“वन्देमातरम्” का विवाद हमें व्यापक प्रश्नों की ओर ले जाता है —क्या किसी एक भाषा या प्रतीक से राष्ट्र की विविधता को समाहित किया जा सकता है?क्या भाषा को राजनीतिक पहचान से अलग किया जा सकता है?क्या सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग सहमति से होना चाहिए या शक्ति के माध्यम से?ये प्रश्न केवल “वन्देमातरम्” तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत की भाषाई और सांस्कृतिक राजनीति के मूल में हैं।

समन्वय की संभावना-भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। “वन्देमातरम्” को यदि सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखा जाए और भाषा को संवाद का माध्यम बनाया जाए, तो यह विभाजन का नहीं बल्कि एकता का प्रतीक बन सकता है।इसके लिए आवश्यक है —ऐतिहासिक संदर्भ की समझ -संवेदनशीलता और सहिष्णुता-भाषा को राजनीति से ऊपर रखने का प्रयास!“वन्देमातरम्” भारतीय इतिहास, साहित्य और राजनीति का एक जटिल प्रतीक है। यह स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति है, सांस्कृतिक गौरव का स्रोत है, और भाषा की राजनीति का उदाहरण भी है।

यह हमें सिखाता है कि शब्दों में शक्ति होती है — वे प्रेरित कर सकते हैं, जोड़ सकते हैं, और कभी-कभी विभाजित भी कर सकते हैं। अतः आवश्यकता है कि हम भाषा को संघर्ष का नहीं, संवाद का माध्यम बनाएं।

अंततः “वन्देमातरम्” का सार यही है — मातृभूमि के प्रति सम्मान और प्रेम। यदि इस भावना को व्यापक और समावेशी दृष्टिकोण से समझा जाए, तो भाषा की राजनीति से ऊपर उठकर यह राष्ट्रीय एकता का स्थायी प्रतीक बन सकता है।वन्देमातरम में भाषाई समन्वय जबरदस्त है.

राजेंद्र नाथ तिवारी


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