“समरसता या विभाजन? हिंदुत्व के सामने जातीय चुनौती” - कौटिल्य का भारत

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बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

“समरसता या विभाजन? हिंदुत्व के सामने जातीय चुनौती”

 जातीय उन्माद : हिंदुत्व के लिए आंतरिक चुनौती


(एक वैचारिक विश्लेषण)

भारत की सभ्यता का मूलाधार यदि किसी एक शब्द में समेटा जाए तो वह है — समन्वय। यह भूमि विविधताओं की भूमि है, किंतु विविधता यहाँ विभाजन नहीं बनती; वह सांस्कृतिक ऊर्जा का स्रोत बनती है। “हिंदुत्व” इसी समन्वयी चेतना का आधुनिक राजनीतिक-सांस्कृतिक रूपांतरण है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या जातीय उन्माद — अर्थात जाति आधारित अस्मिता का आक्रामक, बहिष्कारी और प्रतिशोधी रूप — इस समन्वयी हिंदुत्व के अनुकूल है?या वह उसके लिए एक गंभीर आंतरिक खतरा है?

आज जब हिंदुत्व को वैश्विक विमर्श में एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, तब भीतर ही भीतर यदि जातीय विभाजन गहरा होता है, तो यह केवल सामाजिक समस्या नहीं रह जाती — यह वैचारिक संकट बन जाती है।

यह लेख उसी संकट का विवेचन है।हिंदुत्व की मूल अवधारणा : जाति से परे एक सांस्कृतिक एकता हिंदुत्व का मूल भाव जाति-आधारित पहचान नहीं है। वह भूभाग, परंपरा, स्मृति और सांस्कृतिक उत्तराधिकार की साझा चेतना है।विनायक दामोदर सावरकर ने हिंदुत्व को तीन तत्वों में परिभाषित किया —

पितृभूमि,पुण्यभूमि,सांस्कृतिक एकात्मता इस परिभाषा में कहीं जाति नहीं है।यदि हम वैदिक साहित्य की ओर जाएँ तो वहाँ “वसुधैव कुटुम्बकम्” है, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” है। उपनिषदों में आत्मा की एकता का दर्शन है — “अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्वमसि”।भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं —

“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः” —

अर्थात वर्ण व्यवस्था गुण और कर्म के आधार पर थी, जन्म के आधार पर नहीं।इतिहास साक्षी है कि जाति की कठोरता सामाजिक विकास की एक ऐतिहासिक परिणति थी, परंतु वह हिंदुत्व का शाश्वत तत्व नहीं थी।हिंदुत्व का शाश्वत तत्व है — एकात्मता।

 जातीय उन्माद क्या है?जातीय उन्माद केवल अपनी जाति पर गर्व नहीं है। गर्व स्वाभाविक है।उन्माद वह है जब —जाति राजनीतिक हथियार बन जाए,सामाजिक संवाद की जगह सामाजिक प्रतिशोध ले ले,ऐतिहासिक पीड़ाएँ वर्तमान में नफरत का औजार बन जाएँ,और व्यक्ति की पहचान राष्ट्र या संस्कृति से पहले केवल जाति बन जाए।जब जाति “अधिकार” की भाषा से “प्रतिशोध” की भाषा में बदलती है, तब वह उन्माद बन जाती है।यह उन्माद दो दिशाओं में प्रकट होता है —श्रेष्ठतावादी जातीय उन्माद,पीड़ित-प्रतिशोधी जातीय उन्माददोनों ही हिंदुत्व के लिए समान रूप से खतरनाक हैं, क्योंकि दोनों समाज को खंडित करते हैं।

 राजनीतिक लाभ बनाम सांस्कृतिक क्षति,आधुनिक भारत में जाति का राजनीतिकरण एक स्वीकृत तथ्य है। चुनावी समीकरणों में जातीय गणित निर्णायक भूमिका निभाता है।राजनीतिक दल जातीय अस्मिताओं को संगठित करते हैं —कहीं “सामाजिक न्याय” के नाम पर,कहीं “प्रतिनिधित्व” के नाम पर,कहीं “सम्मान” के नाम पर।

परंतु जब यह राजनीति हिंदुत्व के नाम पर भी जातीय संतुलन साधने लगती है, तब प्रश्न उठता है — क्या यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है या सामाजिक गणित?यदि हिंदुत्व केवल बहुसंख्यक संख्या की राजनीति बन जाए और भीतर से जातियों में विभक्त रहे, तो वह दीर्घकालीन राष्ट्रचेतना नहीं बना सकता।राजनीतिक लाभ अल्पकालिक हो सकता है,पर सांस्कृतिक क्षति दीर्घकालिक होती है।

 ऐतिहासिक पीड़ा का पुनर्स्मरण बनाम पुनरुत्थान,यह भी सत्य है कि भारत में जाति के नाम पर अन्याय हुए। सामाजिक बहिष्कार, अस्पृश्यता, शिक्षा और संसाधनों से वंचित करना — यह इतिहास का हिस्सा है।इन पीड़ाओं को नकारना अन्याय होगा।परंतु प्रश्न यह है कि क्या पीड़ा का समाधान पुनर्स्मरण से होगा या पुनरुत्थान से?यदि इतिहास की पीड़ा को वर्तमान की नफरत का ईंधन बना दिया जाए, तो समाज स्थायी युद्धभूमि बन जाएगा।हिंदुत्व यदि पुनरुत्थान की चेतना है — तो उसे सामाजिक समरसता की दिशा में बढ़ना होगा, न कि जातीय द्वंद्व की ओर।

समरसता बनाम समता*हिंदुत्व की विचारधारा में “समरसता” शब्द प्रमुख है।समता (Equality) पश्चिमी राजनीतिक अवधारणा है — कानून के समक्ष समानता।समरसता (Harmony) भारतीय अवधारणा है — आत्मिक एकता।समता कानून से आती है।समरसता संस्कार से आती है।यदि कानून समानता दे भी दे, पर मन में जातीय घृणा रहे, तो समाज विभाजित ही रहेगा।समरसता के लिए आवश्यक है —सामाजिक संवाद,सांस्कृतिक पुनर्पाठ,साझा पर्व और परंपराअंतर्जातीय सहयोग.जब तक हिंदुत्व का सामाजिक कार्यक्रम समरसता को प्राथमिकता नहीं देगा, तब तक जातीय उन्माद भीतर ही भीतर उसे खोखला करता रहेगा।

 बाहरी चुनौती से अधिक आंतरिक विघटन*हिंदुत्व के सामने अनेक बाहरी वैचारिक चुनौतियाँ हैं —वामपंथी विमर्शधार्मिक कट्टरवाद,वैश्विक उदारवाद,उपभोक्तावादी संस्कृति परंतु बाहरी चुनौती का सामना एकजुट समाज ही कर सकता है।

यदि भीतर से समाज जातीय खंडों में बँटा हो, तो बाहरी चुनौती से पहले ही वह कमजोर हो जाएगा।

इतिहास साक्षी है —भारत पर विदेशी आक्रमण केवल सैन्य शक्ति से सफल नहीं हुए; वे सामाजिक विखंडन से भी सफल हुए।जब समाज जाति, क्षेत्र और संप्रदाय में बँटा, तब आक्रमणकारी सफल हुए।क्या आधुनिक भारत फिर उसी भूल को दोहराना चाहता है?

युवा पीढ़ी और जातीय पहचान*आज का युवा इंटरनेट युग में जीता है। उसकी पहचान बहुआयामी है —वह वैश्विक नागरिक है,डिजिटल समाज का सदस्य है,आधुनिक आकांक्षाओं से भरा है।परंतु राजनीतिक विमर्श उसे फिर से जातीय खाँचों में बाँधने का प्रयास करता है। यदि युवा की प्राथमिक पहचान “भारतीय” या “हिंदू” होने से पहले केवल “जाति” हो जाए, तो हिंदुत्व की व्यापक सांस्कृतिक परियोजना कमजोर पड़ जाएगी। हिंदुत्व को यदि भविष्य चाहिए, तो उसे युवा को जातीय खाँचों से ऊपर उठाकर सांस्कृतिक आत्मगौरव देना होगा।

आरक्षण और सामाजिक न्याय का संतुलन*जातीय विमर्श का एक महत्वपूर्ण आयाम आरक्षण है।आरक्षण सामाजिक न्याय का उपकरण है, परंतु उसका राजनीतिक दुरुपयोग जातीय उन्माद को बढ़ा सकता है।जब आरक्षण पर विमर्श “सामाजिक उत्थान” से हटकर “जातीय संघर्ष” बन जाता है, तब समाज में स्थायी विभाजन उत्पन्न होता है।हिंदुत्व की राजनीति यदि सामाजिक न्याय को स्वीकार करती है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह न्याय विभाजन का आधार न बने।संतुलन ही समाधान है।

 सांस्कृतिक पुनर्पाठ की आवश्यकता*हिंदुत्व को अपने सांस्कृतिक ग्रंथों और परंपराओं का पुनर्पाठ करना होगा।रामायण में शबरी हैं, निषादराज हैं।महाभारत में विदुर हैं, एकलव्य हैं।भक्ति आंदोलन में कबीर, रविदास, नामदेव, तुकाराम हैं। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर समावेशी है।यदि इस समावेशी परंपरा को प्रमुखता दी जाए, तो जातीय उन्माद स्वतः कम होगा।हिंदुत्व को “श्रेष्ठता” नहीं, “समावेशन” का दर्शन प्रस्तुत करना होगा।

 जातीय उन्माद का अंतिम परिणाम*यदि जातीय उन्माद बढ़ता है, तो उसके संभावित परिणाम हैं —सामाजिक हिंसा,राजनीतिक अस्थिरता,सांस्कृतिक विखंडन,राष्ट्रवाद की विश्वसनीयता पर प्रश्न ।विश्व मंच पर यदि हिंदुत्व को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत किया जाए, और भीतर से समाज जातीय संघर्ष में उलझा हो, तो यह विरोधाभास टिक नहीं पाएगा।

*समाधान की दिशा*वैचारिक स्पष्टता,हिंदुत्व को स्पष्ट रूप से घोषित करना होगा कि वह जातीय श्रेष्ठता का सिद्धांत नहीं है।*सामाजिक समरसता अभियान,केवल प्रतीकात्मक नहीं, वास्तविक सामाजिक संपर्क कार्यक्रम।

 शिक्षा में सांस्कृतिक समावेशन*भारतीय इतिहास और संस्कृति के समावेशी आयामों को पाठ्यक्रम में प्रमुखता।राजनीतिक संयम,जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति से दूरी।आध्यात्मिक पुनर्जागरण।जब तक आत्मा की एकता का बोध नहीं होगा, सामाजिक एकता टिकाऊ नहीं होगी।

 हिंदुत्व का भविष्य समरसता में है*हिंदुत्व यदि केवल राजनीतिक परियोजना बनकर रह गया, तो जातीय उन्माद उसे धीरे-धीरे विभाजित कर देगा।परंतु यदि वह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण की दिशा में बढ़ा —यदि वह जाति से ऊपर उठकर सांस्कृतिक एकात्मता का संदेश दे —यदि वह सामाजिक न्याय को प्रतिशोध नहीं, पुनरुत्थान का माध्यम बनाए —तो जातीय उन्माद स्वयं क्षीण हो जाएगा।भारत की आत्मा जाति में नहीं बँधी है;वह संस्कृति में बसी है।और संस्कृति का स्वभाव है — जोड़ना, न कि तोड़ना।आज आवश्यकता है कि हिंदुत्व अपने भीतर झाँके,और स्वयं से प्रश्न करे —क्या हम एक सांस्कृतिक राष्ट्र बना रहे हैं,या केवल जातीय समीकरणों का गणित?उत्तर ही भविष्य तय करेगा।

आरएसएस शताब्दी वर्ष पर समरसता का प्रयास भी उद्बाहुरिव्वामन: प्रयास है।

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