वंदेमातरम :सामाजिक समरसता का सूत्र 78 - कौटिल्य का भारत

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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

वंदेमातरम :सामाजिक समरसता का सूत्र 78

वन्देमातरम 78 श्रृंखला

सामाजिक समरसता का सूत्र : वन्देमातरम्

 एक गीत नहीं, एक सभ्यता का घोष


“वन्देमातरम्” केवल दो शब्दों का उद्घोष नहीं है। यह भारत की आत्मा का उच्चारण है, उस मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का सार्वजनिक स्वीकार है, जिसने विविधताओं के बीच भी एकता का सूत्र थामे रखा। यह उद्घोष तब भी गूँजा जब देश पराधीन था, और आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जब देश स्वतंत्र होकर भी सामाजिक विघटन, वैचारिक ध्रुवीकरण और सांस्कृतिक विस्मृति के संकट से जूझ रहा है।सामाजिक समरसता—अर्थात समाज के सभी घटकों के बीच सम्मान, सहभागिता और सहअस्तित्व—आज केवल एक नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुकी है। प्रश्न यह है कि क्या हमारे पास ऐसा कोई सांस्कृतिक-वैचारिक सूत्र है, जो जाति, वर्ग, भाषा, पंथ, क्षेत्र और विचारधाराओं से ऊपर उठकर समाज को जोड़ सके? उत्तर एक ही है—वन्देमातरम्।

वन्देमातरम् : उद्गम और भावार्थ:बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित “वन्देमातरम्” पहली बार आनंदमठ में प्रकट हुआ। यह गीत किसी संकीर्ण धार्मिक प्रतीक का नहीं, बल्कि मातृभूमि को देवी के रूप में देखने की भारतीय दृष्टि का प्रतिफल है। यहाँ ‘माता’ का अर्थ केवल जन्मदायिनी नहीं, बल्कि पालनकर्ता, संस्कारदाता और रक्षक है।

वन्देमातरम् में भूमि को माता कहा गया—जो सबको अन्न देती है,जो सबको आश्रय देती है,जो सबको समान रूप से पालती है।यही भाव सामाजिक समरसता की जड़ है। जब धरती किसी से भेद नहीं करती, तो समाज क्यों करे?

भारतीय समाज : विविधता और विखंडन का द्वंद्व:भारत की विशेषता उसकी विविधता रही है—भाषा, खान-पान, वेश-भूषा, पूजा-पद्धति, लोकाचार। किंतु यही विविधता जब संवाद के अभाव में खड़ी होती है, तो विखंडन का कारण बन जाती है। जातिवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद और वैचारिक कट्टरता—ये सभी सामाजिक समरसता के शत्रु हैं।समस्या यह नहीं कि समाज में भिन्नताएँ हैं, समस्या यह है कि भिन्नताओं को श्रेष्ठ-हीन के तराजू पर तौला जाता है। वन्देमातरम् इस तराजू को तोड़ता है। वह कहता है—“तू ही मेरा गौरव है, तू ही मेरी पहचान।”यह ‘तू’ किसी एक वर्ग या जाति की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत माता की है।

वन्देमातरम् और जातिगत समरसता:जाति भारतीय समाज की एक ऐतिहासिक सच्चाई रही है, किंतु जब यह कर्म से हटकर जन्माधारित श्रेष्ठता का दावा करने लगी, तब सामाजिक असंतुलन उत्पन्न हुआ। वन्देमातरम् का दर्शन इस असंतुलन को स्वीकार नहीं करता।

माता के सामने—न ब्राह्मण बड़ा है,न शूद्र छोटा है,न राजा श्रेष्ठ है,न श्रमिक हीन।माता की गोद में सब समान हैं।सती अनुसूया और उनकी गोद के बालक उदाहरण हैं.स्वतंत्रता आंदोलन के समय जब विभिन्न जातियों, वर्गों और समुदायों के लोग “वन्देमातरम्” कहते हुए जेल गए, फाँसी पर चढ़े—तब यह सिद्ध हुआ कि राष्ट्रभाव जातिभाव से ऊपर है। यही सामाजिक समरसता का व्यावहारिक उदाहरण है।

वन्देमातरम् और धार्मिक सहअस्तित्व:अक्सर वन्देमातरम् को धार्मिक चश्मे से देखने का प्रयास किया गया। यह दृष्टि संकुचित है। वन्देमातरम् किसी पूजा-पद्धति का आग्रह नहीं करता, वह भावनात्मक निष्ठा की बात करता है।भारत माता—मंदिर में भी बसती है,मस्जिद के आँगन में भी,गुरुद्वारे की सेवा में भी,चर्च की प्रार्थना में भी।जो भारत को माता मानता है, वह किसी अन्य आस्था का विरोधी नहीं हो सकता। सामाजिक समरसता का यही मूल मंत्र है—आस्था की स्वतंत्रता, राष्ट्र के प्रति निष्ठा के साथ।

स्वतंत्रता संग्राम : समरसता का जीवंत प्रयोग:1857 से 1947 तक का स्वतंत्रता संग्राम सामाजिक समरसता की प्रयोगशाला था। इसमें—किसान थे,मजदूर थे,संत थे,क्रांतिकारी थे,महिलाएँ थीं,आदिवासी थे।और सबके मुख पर एक ही उद्घोष— वन्देमातरम्।यह उद्घोष किसी राजनीतिक दल का नारा नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक संकल्प था, जिसने समाज के बिखरे तंतु जोड़े।

वन्देमातरम् और नारी-सम्मान:जब राष्ट्र को माता कहा जाता है, तो नारी स्वतः सम्मान के केंद्र में आ जाती है। वन्देमातरम् नारी को केवल सहानुभूति का पात्र नहीं, बल्कि शक्ति का स्रोत मानता है।भारत माता की संकल्पना—दुर्गा की शक्ति है,लक्ष्मी की समृद्धि है,सरस्वती का ज्ञान है।जहाँ नारी का सम्मान होगा, वहाँ सामाजिक समरसता स्वतः पुष्पित होगी। नारी अपमानित होगी, तो समाज खंडित होगा। वन्देमातरम् इस सत्य को मौन रूप से उद्घोषित करता है।

आधुनिक भारत और समरसता का संकट:आज का भारत तकनीकी रूप से आगे है, किंतु सामाजिक रूप से बेचैन। सोशल मीडिया, राजनीतिक बयानबाजी और तात्कालिक लाभ की राजनीति ने समाज को खाँचों में बाँट दिया है।ऐसे समय में वन्देमातरम्—हमें स्मरण कराता है कि हम पहले भारतीय हैं,फिर किसी विचारधारा, जाति या वर्ग के सदस्य।यह स्मरण ही समरसता का प्रथम चरण है।वन्देमातरम् : भविष्य का सामाजिक अनुशासन-वन्देमातरम् केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य का सामाजिक अनुशासन है। यह सिखाता है—अधिकार से पहले कर्तव्य,पहचान से पहले दायित्व,विरोध से पहले संवाद आवश्यक है।

यदि शिक्षा, राजनीति और समाज के केंद्र में वन्देमातरम् का भाव आ जाए, तो सामाजिक समरसता कोई नारा नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति बन सकती है। समरस भारत का संकल्प वन्देमातरम् वह सेतु है—जो इतिहास को वर्तमान से जोड़ता है,जो विविधता को एकता में ढालता है,जो व्यक्ति को समाज से, और समाज को राष्ट्र से बाँधता है।आज आवश्यकता है कि हम वन्देमातरम् को केवल समारोहों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे व्यवहार, शिक्षा और नीति का अंग बनाएँ।जब भारत का हर नागरिक—“वन्देमातरम्” कहेबिना किसी भेद, भय और संकोच के,तब समझिए कि सामाजिक समरसता का सूत्र जीवित है, और भारत सचमुच भारत माता बन चुका है।सर्व समाज का साथ वन्देमातरम क़ीअपरिहार्यता.


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