कौटिल्य की दृष्टि से शिक्षक-भर्ती : राज्य, नीति और पतन
(कौटिल्य शैली में सम्पादकीय)
आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में स्पष्ट कहा है—“यथा राजा तथा प्रजा”।
आज उत्तर प्रदेश की प्राइमरी शिक्षक-भर्ती पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश इसी सूत्र की आधुनिक व्याख्या है। जब राज्य की नीति दूषित होती है, तो उसका प्रभाव सबसे पहले शिक्षा और न्याय पर पड़ता है—और वही हुआ।प्राथमिक शिक्षक राज्य का सामान्य कर्मचारी नहीं होता। वह राज्य का संस्कारवाहक होता है। यदि वही पद कपट, छल और फर्जी प्रमाणपत्रों से भरा जाए, तो यह केवल नियुक्ति-दोष नहीं, बल्कि राज्यद्रोह के समकक्ष अपराध है—क्योंकि इससे भविष्य की पीढ़ी कमजोर होती है।कपट से प्राप्त पद, राज्य के लिए विष,कौटिल्य चेतावनी देते हैं—“कपटेन प्राप्तं पदं राज्यस्य क्षयकारकम्।”(कपट से प्राप्त पद राज्य के क्षय का कारण बनता है)हाईकोर्ट द्वारा राज्य-व्यापी जांच का आदेश यह सिद्ध करता है कि शिक्षक-भर्ती में अनियमितता कोई अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्थित नीति-विचलन है। जब फर्जी दस्तावेजों से शिक्षक नियुक्त हों और प्रशासन आंख मूँदे रहे, तो दोष केवल नियुक्त व्यक्ति का नहीं रहता—वह प्रशासनिक संरक्षण का प्रमाण बन जाता है।अधिकारी जब लाभार्थी बन जाए!कौटिल्य ने सबसे कठोर शब्द अधिकारियों के लिए कहे हैं—“राजसेवकः यदि स्वार्थं सेवते, स राष्ट्रस्य शत्रुः।”(जो अधिकारी स्वार्थ के लिए सेवा करे, वह राष्ट्र का शत्रु है)
हाईकोर्ट का यह निर्देश कि दोषी अधिकारियों की भी भूमिका जांची जाए, दरअसल इसी कौटिल्य नीति का न्यायिक रूप है। क्योंकि बिना लेखपाल, बाबू, अधिकारी और राजनैतिक संरक्षण के हजारों फर्जी नियुक्तियाँ असंभव हैं।यदि राज्य केवल शिक्षकों को हटाकर संतोष कर ले और अधिकारियों को बचा ले, तो यह न्याय नहीं, प्रबंधित दिखावा होगा।ईमानदार अभ्यर्थी : राज्य का मौन शोषण,कौटिल्य लिखते हैं—“योग्यस्य अवहेलना राज्यस्य दुर्बलता।”(योग्य की उपेक्षा राज्य को कमजोर बनाती है)
लाखों योग्य युवाओं ने परीक्षा दी, वर्षों प्रतीक्षा की, लेकिन उन्हें या तो चयन से बाहर रखा गया या न्यायालयों की दहलीज़ पर धकेल दिया गया। यह स्थिति बताती है कि राज्य ने मेधा का नहीं, जोड़-तोड़ का संरक्षण किया।हाईकोर्ट का आदेश उन युवाओं के लिए आशा है, किंतु यह भी सत्य है कि विलंबित न्याय, आधा न्याय होता है।सरकार के लिए नीति-परीक्षाअब राज्य के सामने कौटिल्यीय अग्निपरीक्षा है।कौटिल्य स्पष्ट कहते हैं—“दोषं दृष्ट्वा यः मौनं धारयति, स दोषस्य भागी।”यदि सरकार निष्पक्ष जांच, समयबद्ध कार्रवाई और दोषियों पर कठोर दंड नहीं देती, तो यह आदेश इतिहास में एक और अवहेलित चेतावनी बन जाएगा। शिक्षा में अधर्म, राज्य में पतन,इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश केवल कानूनी निर्देश नहीं, बल्कि राज्य के लिए नीति-संदेश है—शिक्षा में अधर्म होगा तो राज्य निर्बल होगाफ.र्जी योग्यता से राज्य का भविष्य नहीं बनता और जब न्यायालय चेतावनी दे, तो शासन का मौन अपराध बन जाता है.
कौटिल्य के शब्दों में—“धर्मे स्थितं राज्यं चिरस्थायी भवति।”
अब देखना यह है कि राज्य इस आदेश को धर्म का अवसर मानता है या सत्ता की असुविधा। साथ ही शिक्षक ही बलि चढ़ते हैं या जिम्मेदार अधिकारी भी.
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