घाट पर छोड़ी गई माँ: सुविधा-संस्कृति में दम तोड़ती संवेदना
उत्तर प्रदेश के कानपुर से आई यह घटना किसी एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे समय का सार्वजनिक आईना है। 74 वर्षीय एक बुजुर्ग माँ को उनकी ही बेटी और दामाद बीमारी की हालत में काशी के मणिकर्णिका घाट पर लावारिस छोड़ आते हैं—व्हीलचेयर पर बैठाकर, बिना यह देखे कि वह चल-फिर भी नहीं सकतीं। तीन दिनों तक वह माँ घाट पर पड़ी रहती हैं। अंततः एक राहगीर का बनाया वीडियो वायरल होता है और तब जाकर प्रशासन व समाज की नींद खुलती है।
काशी, जहाँ मोक्ष की कामना की जाती है, वहीं एक जीवित माँ को परित्याग का दंड—यह दृश्य केवल अमानवीय नहीं, हमारी सामूहिक संवेदना की विफलता है। अस्पताल के लावारिस वार्ड में भर्ती उस माँ के शरीर पर चोटों के निशान मिलते हैं। यह आशंका जन्म लेती है कि उनके साथ मारपीट भी हुई होगी। वह अपना पता, पति का नाम बताती हैं—पर बेटी का ज़िक्र आते ही चुप हो जाती हैं, रो पड़ती हैं। यह चुप्पी चीख से भी अधिक भयावह है।
माँ के पास एक थैले में बस ज़रूरत भर की चीज़ें—एक ग्लास, कटोरी, चम्मच और कुछ कपड़े। उनके शब्दों में, “बेटी ने एक रुपया तक नहीं दिया।” यह वाक्य केवल आर्थिक अभाव नहीं बताता, यह सम्मान की मृत्यु का बयान है। मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि बेटी ने माँ को अपने साथ रखने से साफ़ इनकार कर दिया है।
यह घटना हमें उस सुविधा-संस्कृति से रूबरू कराती है, जहाँ रिश्ते भी उपयोगिता के तराजू पर तौले जाने लगे हैं। जब तक माता-पिता सक्षम हैं, तब तक स्वीकार्य; बीमारी और निर्भरता आते ही बोझ। भारतीय संस्कृति में वात्सल्य निःशर्त रहा है—माँ कभी यह नहीं पूछती कि बच्चा लाभ देगा या नहीं। फिर आज की संतति यह प्रश्न कैसे पूछ रही है?
कानून मौजूद हैं—वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण का प्रावधान है। पर क्या हर माँ अपने ही बच्चे पर मुकदमा करे? यह संकट कानूनी कम, नैतिक अधिक है। जहाँ करुणा सूख जाती है, वहाँ कानून मरहम तो बन सकता है, इलाज नहीं।
सबसे चिंताजनक प्रश्न भविष्य का है। आज के बच्चे यह दृश्य देख रहे हैं—वे सीख रहे हैं कि बूढ़े माता-पिता बोझ हैं, सुविधा सर्वोपरि है, त्याग एकतरफा होता है। संस्कृतियों का पतन तलवार से नहीं, अनुकरण से होता है। जो आज देखा जा रहा है, वही कल दोहराया जाएगा।
समाज की भूमिका भी कटघरे में है। यदि वीडियो वायरल न होता, तो क्या यह पीड़ा दिखाई देती? क्या हम बिना वायरल हुए किसी दुख को देखने-सुनने में असमर्थ हो चुके हैं? पड़ोस, रिश्तेदार, सामाजिक संस्थाएँ—सबकी चुप्पी भी इस अपराध में साझीदार है।
समाधान केवल दंड नहीं है; समाधान संस्कारों की पुनर्स्थापना है। परिवारों में बुजुर्गों की भूमिका को पुनः सम्मान देना होगा। बच्चों को “केयर” नहीं, कृतज्ञता सिखानी होगी। समाज को बुजुर्गों को बोझ नहीं, धरोहर मानना होगा। प्रशासनिक ढाँचे के साथ-साथ सामाजिक चेतना का पुनर्निर्माण आवश्यक है।
जिस उम्र में माँ को सहारे की सबसे अधिक ज़रूरत होती है, उसी उम्र में यदि उसे यूँ छोड़ दिया जाए—तो यह केवल अपराध नहीं, इंसानियत की हार है। सभ्यता का मूल्य गगनचुंबी इमारतों से नहीं, उसके सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ व्यवहार से आँका जाता है।
उस माँ की आँखों में शिकायत नहीं, केवल प्रश्न है—क्या मेरा वात्सल्य व्यर्थ था?
इस प्रश्न का उत्तर हम सबको अपने आचरण, अपनी संतति और अपनी संवेदना से देना होगा। यदि हम आज नहीं जागे, तो कल घाट पर केवल बुजुर्ग नहीं—हमारी सभ्यता पड़ी होगी।

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