राष्ट्र पहले, राजनीति बाद में — यही भारत की शाश्वत चेतना है!
(राष्ट्रवादी संपादकीय)
त्रयंबक त्रिपाठी
सम्पादक
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है। यह सीमाओं से बना हुआ राष्ट्र नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों से निर्मित एक जीवित सभ्यता है। यहाँ राष्ट्र की अवधारणा संविधान से पहले भी थी और सत्ता से ऊपर भी है। यही कारण है कि जब-जब भारत ने स्वयं को राष्ट्र के रूप में पहचाना, तब-तब वह विश्व का मार्गदर्शक बना; और जब-जब राजनीति राष्ट्र से बड़ी हो गई, तब-तब पतन और पराधीनता ने दरवाज़ा खटखटाया।आज भारत एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर वैश्विक मंच पर उभरती शक्ति का आत्मविश्वास है, तो दूसरी ओर भीतर ही भीतर चल रही वैचारिक खींचतान, राजनीतिक स्वार्थ और राष्ट्रीय हितों पर होने वाली बहसें हैं। प्रश्न यह नहीं है कि कौन सत्ता में है और कौन विपक्ष में; प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्र सर्वोपरि है या नहीं।
राष्ट्रवाद: पश्चिमी विचार नहीं, भारतीय जीवनदर्शन#भारत में राष्ट्रवाद कोई उधार लिया हुआ विचार नहीं है। यूरोप में राष्ट्रवाद राजनीतिक क्रांतियों से पैदा हुआ, लेकिन भारत में यह सांस्कृतिक चेतना से निकला। यहाँ “राष्ट्र” का अर्थ केवल राज्य नहीं, बल्कि साझा स्मृति, परंपरा, आस्था, भाषा विविधता और सभ्यतागत निरंतरता है।ऋग्वैदिक मंत्रों से लेकर “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” की भावना तक, भारत ने राष्ट्र को माता के रूप में देखा। यही भाव आगे चलकर “वंदे मातरम्” के स्वर में स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा बना। भारत का राष्ट्रवाद किसी के विरोध में नहीं, बल्कि अपनी पहचान के बोध में खड़ा हुआ विचार है।लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज राष्ट्रवाद को राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है। इसे कभी संकीर्ण बताया जाता है, कभी विभाजनकारी कहा जाता है। यह वही मानसिकता है जिसने लंबे समय तक भारत को अपनी ही सभ्यता से शर्मिंदा करने की कोशिश की।
स्वतंत्रता के बाद की सबसे बड़ी भूल#1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन मानसिक स्वतंत्रता अधूरी रह गई। शासन बदल गया, लेकिन विचारधारा का ढांचा औपनिवेशिक ही बना रहा। इतिहास लेखन से लेकर शिक्षा व्यवस्था तक, भारत को उसकी जड़ों से काटने का प्रयास हुआ।राष्ट्र की आत्मा को समझने के बजाय सत्ता ने राष्ट्र को केवल प्रशासनिक इकाई मान लिया। परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रीय पहचान की जगह क्षेत्रीय, जातीय और वोट बैंक आधारित राजनीति मजबूत होती गई। राष्ट्रहित अक्सर चुनावी गणित के आगे कमजोर पड़ गया।राष्ट्रवाद का अर्थ सत्ता से सवाल न पूछना नहीं होता, बल्कि राष्ट्रहित के आधार पर सत्ता का मूल्यांकन करना होता है। लेकिन दशकों तक राष्ट्रवाद को या तो दबाया गया या गलत रूप में प्रस्तुत किया गया।
राजनीति बनाम राष्ट्र — संघर्ष क्यों?#आज भारत में सबसे बड़ा संकट वैचारिक है। राजनीतिक दल राष्ट्र को अपने-अपने नजरिये से परिभाषित करना चाहते हैं। सत्ता अपने कार्यों को राष्ट्रहित बताती है, जबकि विपक्ष हर निर्णय को राष्ट्रविरोधी कहने में देर नहीं करता।यह प्रवृत्ति खतरनाक है। राष्ट्र किसी दल का नहीं होता। सरकारें बदलती हैं, लेकिन राष्ट्र स्थायी रहता है। जब राजनीतिक संघर्ष राष्ट्र की छवि को नुकसान पहुँचाने लगे, तब आत्ममंथन आवश्यक हो जाता है।अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को लेकर घरेलू राजनीति करना लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से यह गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। आलोचना आवश्यक है, परंतु ऐसी आलोचना जो शत्रु राष्ट्रों के नैरेटिव को मजबूत करे, वह आत्मघाती बन जाती है।
युवा पीढ़ी और राष्ट्र चेतना#भारत आज दुनिया का सबसे युवा राष्ट्र है। यह जनसांख्यिकीय शक्ति अवसर भी है और चुनौती भी। यदि युवा राष्ट्र से जुड़ा रहेगा तो भारत विश्व नेतृत्व करेगा; यदि वह केवल उपभोक्तावाद और निराशा में उलझ गया तो यह ऊर्जा संकट में बदल सकती है।आज का युवा रोजगार चाहता है, अवसर चाहता है, लेकिन उससे भी अधिक वह सम्मान चाहता है — अपनी पहचान का सम्मान। राष्ट्रवाद युवा को उद्देश्य देता है। यह उसे बताता है कि वह केवल नौकरी खोजने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सहभागी है।दुर्भाग्य से शिक्षा प्रणाली लंबे समय तक राष्ट्र चेतना से दूर रही। इतिहास को संघर्षों की बजाय पराजयों के रूप में पढ़ाया गया। नायकों की जगह विवादों को प्रमुखता दी गई। परिणामस्वरूप पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से अनजान होती गईं।
संस्कृति: राष्ट्र की असली सुरक्षा#किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल सेना से नहीं होती; उसकी संस्कृति ही उसकी सबसे बड़ी सुरक्षा होती है। भारत ने हजारों वर्षों के आक्रमण झेले, लेकिन समाप्त नहीं हुआ क्योंकि उसकी सांस्कृतिक आत्मा जीवित रही।आज सांस्कृतिक आत्मविश्वास का पुनर्जागरण दिखाई दे रहा है। लोग अपनी भाषा, परंपरा और सभ्यता पर गर्व व्यक्त कर रहे हैं। यह परिवर्तन केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक स्वतंत्रता का संकेत है।राष्ट्रवाद का अर्थ सांस्कृतिक श्रेष्ठता का अहंकार नहीं, बल्कि अपनी पहचान का सम्मान है। जब कोई राष्ट्र स्वयं को समझता है, तभी वह विश्व को कुछ देने की स्थिति में आता है।
वैश्विक राजनीति और भारत की भूमिका#21वीं सदी में विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है। शक्ति संतुलन पश्चिम से एशिया की ओर बढ़ रहा है। ऐसे समय में भारत केवल दर्शक नहीं रह सकता। उसे निर्णायक भूमिका निभानी होगी।भारत की विदेश नीति आज बहुध्रुवीय विश्व की वास्तविकता को स्वीकार कर रही है। यह न तो पूर्ण पश्चिमी निर्भरता है, न किसी एक ध्रुव की राजनीति। यह वही संतुलन है जो भारतीय कूटनीति की ऐतिहासिक पहचान रहा है।लेकिन वैश्विक शक्ति बनने के लिए आंतरिक एकता आवश्यक है। यदि देश के भीतर ही राष्ट्र की अवधारणा पर विवाद चलता रहेगा, तो बाहरी शक्ति का सपना अधूरा रह जाएगा।
मीडिया, बौद्धिक वर्ग और राष्ट्रीय दायित्व#लोकतंत्र में मीडिया चौथा स्तंभ माना जाता है। उसका दायित्व केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि सत्य को संतुलित रूप में प्रस्तुत करना भी है। दुर्भाग्य से आज मीडिया का एक हिस्सा विचारधारात्मक ध्रुवीकरण का शिकार दिखाई देता है।राष्ट्रवादी दृष्टिकोण का अर्थ सरकार समर्थक होना नहीं है। राष्ट्रवाद का अर्थ है — राष्ट्रहित को सर्वोच्च कसौटी मानना। जब मीडिया सनसनी को सत्य से ऊपर रखता है, तब समाज भ्रमित होता है।बौद्धिक वर्ग की भी जिम्मेदारी है कि वह राष्ट्र को केवल आलोचना का विषय न बनाए, बल्कि समाधान का मार्ग दिखाए। भारत की परंपरा वाद-विवाद की रही है, आत्मविनाश की नहीं।
लोकतंत्र में राष्ट्रवाद की सही परिभाषा#राष्ट्रवाद और लोकतंत्र विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। लोकतंत्र राष्ट्र को शक्ति देता है और राष्ट्रवाद लोकतंत्र को दिशा देता है। बिना राष्ट्र चेतना के लोकतंत्र भीड़तंत्र बन सकता है।सच्चा राष्ट्रवाद असहमति से डरता नहीं। वह आलोचना को स्वीकार करता है, लेकिन राष्ट्र के अस्तित्व और सम्मान पर समझौता नहीं करता। यह संतुलन ही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
चुनौती: विकास और विरासत का संतुलन#भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है — आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन। विकास आवश्यक है, लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं। तकनीक जरूरी है, लेकिन संस्कृति की कीमत पर नहीं।यदि भारत केवल आर्थिक शक्ति बनकर रह गया और अपनी सभ्यतागत आत्मा खो बैठा, तो वह पश्चिमी मॉडल की एक प्रतिकृति बन जाएगा। भारत की शक्ति उसकी विशिष्टता में है।
अंतिम सत्य#राजनीति अस्थायी है, राष्ट्र शाश्वत है। सरकारें आती हैं, जाती हैं; विचारधाराएँ बदलती हैं; लेकिन राष्ट्र बना रहता है। भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम राजनीति को राष्ट्र के अधीन रखते हैं या राष्ट्र को राजनीति के अधीन कर देते हैं।आज आवश्यकता है कि हम वैचारिक शोर से ऊपर उठकर स्वयं से एक प्रश्न पूछें — क्या हमारे निर्णय राष्ट्र को मजबूत कर रहे हैं या केवल राजनीतिक लाभ दे रहे हैं?यदि उत्तर राष्ट्र है, तो भारत का भविष्य उज्ज्वल है।यदि उत्तर राजनीति है, तो इतिहास चेतावनी दे चुका है।भारत की आत्मा आज भी वही कहती है —राष्ट्र पहले, बाकी सब बाद में।वन्देमातरम

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