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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

“संविधान बनाम कुरुक्षेत्र: राजनीति का अतिवाद और संसद की नैतिक पराजय”

 

भारतीय संविधान और महाभारत को साथ रखकर आज की संसद और राजनीति का निर्भीक मूल्यांकन किया गया है। यह लेख आरोप नहीं, आइना है; भाषा तेज़ है, पर तर्क धर्मसम्मत है।

संविधान बनाम कुरुक्षेत्र : जब संसद धर्मसभा नहीं, दुर्योधन की सभा बनने लगे


महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है; वह धर्म और अधर्म के बीच विवेक का महाकाव्य है। उसी तरह भारतीय संविधान केवल कानूनों की पुस्तिका नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक धर्मग्रंथ है। प्रश्न यह नहीं कि आज संसद में शोर क्यों है—प्रश्न यह है कि क्या संसद अब भी धर्मसभा है, या वह कुरुक्षेत्र से भी नीचे गिर चुकी है?संविधान का अनुच्छेद 105 और सभा की मर्यादा ,भारतीय संविधान सांसदों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, पर यह स्वतंत्रता अनुशासन की हत्या का लाइसेंस नहीं है।अनुच्छेद 105 स्पष्ट करता है कि संसद में बोला गया शब्द कानूनी दायरे से ऊपर हो सकता है, पर नैतिक दायित्व से नहीं।

महाभारत में भी सभा में बोलने की स्वतंत्रता थी—शकुनि को भी मिली, विदुर को भी। अंतर यह था कि विदुर ने चेतावनी दी और शकुनि ने षड्यंत्र रचा। आज प्रश्न यह है कि हमारी संसद में विदुर कौन है और शकुनि कितने? प्रधानमंत्री को घेरना या व्यवस्था को गिराना?

महाभारत में अर्जुन ने भी युद्ध से पहले प्रश्न पूछे—पर वे प्रश्न दिशा खोजने के लिए थे, दृश्य रचने के लिए नहीं।आज यदि प्रधानमंत्री को घेरने की साजिश संसद के भीतर दृश्य-युद्ध में बदली जाए, तो यह प्रश्न उठता है—क्या विपक्ष अर्जुन है, या वह भीड़ है जिसे केवल शोर चाहिए?संविधान सरकार को जवाबदेह बनाता है, पर संसद को अराजक अखाड़ा नहीं बनाता। प्रधानमंत्री का मौन यदि अपराध है, तो विपक्ष की चीख़ भी कोई पुण्य नहीं।

लोकसभा अध्यक्ष : भीष्म पितामह या धृतराष्ट्र?महाभारत में भीष्म पितामह सत्ता के नहीं, मर्यादा के पक्षधर थे। धृतराष्ट्र सत्ता में थे, पर दृष्टिहीन।लोकसभा अध्यक्ष का पद भीष्म का है—धृतराष्ट्र का नहीं।यदि अध्यक्ष पर पक्षपात के आरोप लगें, तो आत्मचिंतन सत्ता को भी करना चाहिए और विपक्ष को भी।पर जब अध्यक्ष के आसन को घेर लिया जाए, नारे लगाए जाएँ, तो यह केवल अध्यक्ष का नहीं—संविधान का अपमान है।जो अध्यक्ष की कुर्सी को नहीं मानता, वह कल संविधान की कुर्सी भी नहीं मानेगा।

अतिवाद : राजनीति का कर्ण या अश्वत्थामा?राहुल–प्रियंका हों या अन्य नेता—जब राजनीति में भावुकता विवेक को कुचल दे, तब वह कर्ण नहीं रहती, वह अश्वत्थामा बन जाती है—जो अंधे क्रोध में भविष्य की हत्या कर देता है।सीसंविधान तर्क चाहता है, न कि उत्तेजना।महाभारत में कृष्ण ने युद्ध भी नीति से कराया; आज राजनीति रणनीति नहीं, रील-नीति पर चल रही है।

जब संसद कुरुक्षेत्र बन जाए,कुरुक्षेत्र में युद्ध धर्म के लिए हुआ था।आज संसद में जो युद्ध है, वह कैमरे के लिए हो रहा है।वहाँ शस्त्र उठे थे, यहाँ शब्द गिरे हैं।वहाँ मर्यादा टूटी तो पश्चाताप हुआ, यहाँ तालियाँ बजती हैं।

यदि संसद में बोले गए शब्द सुनकर संविधान भी लज्जित हो, तो उस सभा को संसद कहना स्वयं संसद का अपमान है।तो नाम क्या दें?ऐसी संसद को कहना होगा—“लोकतंत्र की धर्मसभा नहीं, दलतंत्र का कोलाहल”और ऐसे सांसद—“जनप्रतिनिधि नहीं, जन-उत्तेजक”संविधान और महाभारत दोनों की अंतिम चेतावनी

महाभारत कहता है—“जहाँ धर्म नहीं, वहाँ विजय भी पराजय है।”संविधान कहता है—“लोकतंत्र शोर से नहीं, सहमति से चलता है।”यदि संसद ने यह नहीं सीखा, तो इतिहास एक दिन यह लिखेगाभारत का संविधान तो अमर रहा, पर उसके प्रतिनिधि अपने ही शब्दों से हार गए।


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