वन्देमातरम श्रृंखला 80
वन्देमातरम् और ग्राम्य भारत!
मिट्टी की महक में राष्ट्र का स्वर!!
भारत को समझना हो तो उसे महानगरों की ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि गाँव की पगडंडियों से देखना होगा। भारत की असली धड़कन वहाँ बसती है जहाँ सुबह सूरज के साथ खेतों में हल चलता है, जहाँ शाम को धुएँ की महक के साथ रोटी पकती है, और जहाँ जीवन की लय प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर चलती है। यही ग्राम्य भारत है — और यही वह धरातल है जहाँ “वन्देमातरम्” केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन का अनुभव बन जाता है।“वन्देमातरम्” — यह उद्घोष मात्र राष्ट्रगीत का उच्चारण नहीं है। यह उस धरती के प्रति कृतज्ञता का भाव है, जो हमें अन्न देती है, जल देती है, और पहचान देती है। जब बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने मातृभूमि को “सुजलाम् सुफलाम्” कहा, तो उनका संकेत किसी अमूर्त कल्पना की ओर नहीं था — वह भारत के गाँवों की हरियाली, खेतों की उर्वरता और जल की शीतलता का ही वर्णन था। इसीलिए ग्राम्य भारत को समझे बिना “वन्देमातरम्” का अर्थ अधूरा है।
गाँव में राष्ट्र का विचार किसी राजनीतिक भाषण से जन्म नहीं लेता। वह खेतों में पसीना बहाते किसान की मेहनत से, तालाब के किनारे खेलते बच्चों की हँसी से, और चौपाल पर बुजुर्गों की सलाह से आकार लेता है। वहाँ राष्ट्र कोई दूर की अवधारणा नहीं — वह मिट्टी से जुड़ा हुआ सजीव अनुभव है। जब किसान बीज बोते समय धरती को प्रणाम करता है, तो वह उसी मातृभूमि को नमन कर रहा होता है, जिसे हम “वन्देमातरम्” कहकर पुकारते हैं।ग्राम्य भारत में संस्कृति और राष्ट्रभक्ति का रिश्ता सहज है। लोकगीतों में देशप्रेम की धुन छिपी होती है, त्यौहारों में सामूहिकता का भाव दिखाई देता है, और परंपराओं में पीढ़ियों का अनुभव संचित रहता है। होली, दीपावली, नवरात्र या छठ — ये केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना के उत्सव हैं। इन अवसरों पर गाँव का हर व्यक्ति, हर घर, एक सूत्र में बंध जाता है — यही एकता राष्ट्र की नींव बनाती है।
ग्राम्य स्त्री इस चेतना की मौन वाहक है। वह आँगन लीपती है, तुलसी को जल चढ़ाती है, परिवार को संस्कार देती है — और इन सबके माध्यम से वह आने वाली पीढ़ी को मातृभूमि के प्रति सम्मान सिखाती है। उसका श्रम और उसकी आस्था, दोनों मिलकर राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखते हैं। “वन्देमातरम्” का भाव केवल गीत में नहीं, बल्कि उसके दैनिक कर्म में झलकता है।
किन्तु समय के साथ ग्राम्य भारत बदल रहा है।सड़कें आई हैं, बिजली आई है, मोबाइल और इंटरनेट ने दूरी को मिटा दिया है। डिजिटल युग ने गाँव को दुनिया से जोड़ दिया है। यह परिवर्तन आवश्यक और स्वागतयोग्य है — क्योंकि विकास से ही जीवन की गुणवत्ता सुधरती है। परंतु इसके साथ एक प्रश्न भी खड़ा होता है — क्या इस परिवर्तन में हम अपनी जड़ों को सुरक्षित रख पा रहे हैं?
यदि गाँव केवल उपभोग और पलायन का केंद्र बनकर रह जाएँ, यदि लोकगीतों की जगह केवल शोर रह जाए, यदि चौपाल की जगह केवल अकेलापन रह जाए — तो “वन्देमातरम्” का भाव खोखला हो जाएगा। क्योंकि राष्ट्र केवल भूगोल से नहीं बनता, वह स्मृति, संस्कृति और सामूहिकता से बनता है।
महात्मा गांधी ने कहा था — भारत का भविष्य उसके गाँवों में बसता है। यह कथन आज भी उतना ही सत्य है। ग्राम स्वावलंबन, सामुदायिक सहयोग और प्रकृति के साथ संतुलन — यही वे तत्व हैं जो भारत को टिकाऊ शक्ति देते हैं। यदि ग्राम्य भारत सशक्त रहेगा, तो राष्ट्र का आत्मविश्वास भी सुदृढ़ रहेगा।इसलिए “वन्देमातरम्” कहना केवल एक राष्ट्रीय कर्तव्य नहीं — यह एक स्मरण है कि हमारी जड़ें कहाँ हैं। यह हमें याद दिलाता है कि मातृभूमि का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उसकी मिट्टी, उसके जल, उसके गाँव और उसके लोगों के संरक्षण में निहित है।
जब अगली बार हम “वन्देमातरम्” कहें — तो केवल स्वर न उठे, बल्कि मन में वह दृश्य उभरे —
हरी-भरी फसलें, कच्ची पगडंडियाँ, तालाब की शांति, और सामूहिक जीवन की गर्माहट।
यही ग्राम्य भारत है — और यही उस मातृभूमि का सजीव रूप है जिसे हम नमन करते हैं,भारतमाता ग्राम वासिनी, 🙏🙏
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