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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

मनोरमा की पुकार बनाम प्रशासनिक खामोशी — अब सड़क पर उतरा जनसंकल्प!

 मनोरमा की पुकार बनाम प्रशासनिक खामोशी , अब सड़क पर उतरा जनसंकल्प!


बस्ती।  वशिष्ठ नगर 

वी के तिवारी

पाँच दिनों से चल रहा मनोरमा नदी सफाई अभियान अब केवल सफाई का कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ जनआक्रोश का प्रतीक बन चुका है। नदी को अविरल और निर्मल बनाने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह अभियान अपने अंतिम चरण में पहुँचते-पहुँचते एक बड़े जनांदोलन का रूप लेता दिखाई दे रहा है। समाजसेवी चन्द्रमणि पाण्डेय ‘सुदामा’ के नेतृत्व में सैकड़ों युवाओं ने जिस तरह बिना संसाधन, बिना सरकारी सहायता और बिना मशीनरी के श्रमदान किया, उसने प्रशासन की निष्क्रियता को खुली चुनौती दे दी है।

चार दिनों से लगातार क्लाइमेक्स कोचिंग सेंटर के संचालक ऋषभ सिंह सहित क्षेत्र के नवयुवक नदी में उतरकर जलकुंभी, प्लास्टिक कचरा, गाद और मल-जल से जूझते रहे। कीचड़ और दुर्गंध के बीच काम कर रहे युवाओं का कहना है कि यह केवल सफाई नहीं, बल्कि अपनी जीवनरेखा को बचाने का संघर्ष है।

जनता मैदान में, प्रशासन गायब

अभियान के दौरान सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि जब आम नागरिक अपने दम पर नदी बचाने उतर सकते हैं तो सरकारी तंत्र आखिर क्यों मौन है? मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार—

जलकुंभी हटाने के लिए कोई मशीन उपलब्ध नहीं कराई गई

कचरा उठाने के लिए ट्रैक्टर या ट्रॉली तक नहीं भेजी गई

सिंचाई विभाग और नगर निकाय के बीच कोई समन्वय नहीं दिखा

एक भी जिम्मेदार अधिकारी निरीक्षण करने नहीं पहुँचा

यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी से पलायन का उदाहरण मानी जा रही है।

“जनभावना से नदी नहीं बचेगी, नीति चाहिए”

भाजपा नेता एवं समाजसेवी चन्द्रमणि पाण्डेय ने प्रशासन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि केवल प्रतीकात्मक प्रयासों से मनोरमा नदी को बचाया नहीं जा सकता। उनके अनुसार सरकार के पास संसाधन, मशीनरी और विभागीय संरचना होने के बावजूद ठोस कार्ययोजना का अभाव प्रशासनिक विफलता को उजागर करता है।

उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि प्रशासन अब भी नहीं जागा तो आंदोलन सड़क से कार्यालय तक पहुँचेगा।

नदी नहीं, क्षेत्र की जीवनरेखा

अभियान में शामिल युवा अमन मिश्र, रबी पाण्डेय, अखिलेश पाण्डेय, विक्रांत पाण्डेय और गौरीशंकर यादव ने बताया कि नदी की दुर्दशा अब स्वास्थ्य संकट में बदल रही है। दुर्गंध, मच्छरों की बढ़ती संख्या और जलजनित रोगों का खतरा ग्रामीणों को परेशान कर रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि मनोरमा केवल जलधारा नहीं बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान है — खेतों की सिंचाई, भूजल संतुलन और स्थानीय जीवनशैली इससे जुड़ी हुई है। यदि नदी मरती है तो पूरा क्षेत्र पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ेगा।

मांगें साफ, चेतावनी भी स्पष्ट

अभियान से जुड़े समाजसेवियों ने प्रशासन के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं—

तत्काल सरकारी मशीनरी और संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ

स्थायी एवं समयबद्ध सफाई योजना बनाई जाए

नदी में गिर रहे नालों को ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए

स्थानीय युवाओं और सामाजिक संगठनों को आधिकारिक रूप से अभियान में शामिल किया जाए

5 मार्च को घेराव, बेमियादी धरने का ऐलान

जनप्रतिनिधियों और समाजसेवियों ने साफ घोषणा की है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो 5 मार्च को जिलाधिकारी कार्यालय का घेराव किया जाएगा और बेमियादी धरना शुरू होगा। आंदोलनकारियों का कहना है कि अब यह लड़ाई नदी की नहीं, प्रशासनिक जवाबदेही की है।

सवाल जो प्रशासन से जवाब मांग रहा

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी आपदा का इंतजार कर रहा है? जब जनता स्वयं नदी बचाने के लिए उतर चुकी है, तब सरकारी तंत्र की चुप्पी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

मनोरमा आज केवल गंदगी से नहीं जूझ रही — वह व्यवस्था की उदासीनता से लड़ रही है। और यदि समय रहते निर्णय नहीं हुआ, तो यह सफाई अभियान आने वाले दिनों में एक बड़े जनांदोलन की भूमिका लिख सकता है।

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