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गुरुवार, 15 जनवरी 2026

“ड्राइविंग सीट सरकार की—हादसे की ज़िम्मेदारी भी उसी की! एसआईआर पर पंकज चौधरी की योगी को सीख,”


एसआईआर पर सत्ता बनाम संगठन: पंकज चौधरी का गुजराती संदेश और योगी सरकार की असहजता
मनोज श्रीवास्तव | लखनऊ









उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर भारतीय जनता पार्टी के भीतर जो उबाल सतह पर दिख रहा है, वह केवल प्रशासनिक असफलता का नहीं बल्कि सत्ता और संगठन के बीच गहरे अविश्वास का संकेत है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के बयानों ने इस टकराव को सार्वजनिक मंच पर ला दिया है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जहां लगभग चार करोड़ मतदाताओं के नाम कटने के लिए संगठन को जिम्मेदार ठहराया, वहीं प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में कार्यकर्ताओं के सामने साफ शब्दों में कहा—
“ड्राइविंग सीट पर सरकार है, एसआईआर सरकार की जिम्मेदारी है। संगठन सहयोग करेगा, दोषी नहीं बनेगा।”
यह बयान केवल प्रशासनिक स्पष्टीकरण नहीं, बल्कि राजनीतिक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
टीम गुजरात की चाल और यूपी की राजनीति
पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे ‘टीम गुजरात’ की रणनीति को लेकर पहले दिन से ही चर्चाएं थीं। अब उनके तेवर बता रहे हैं कि यह नियुक्ति केवल संगठनात्मक संतुलन नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की घेराबंदी का हिस्सा भी मानी जा रही है।
गोरखपुर से जुड़े नेताओं को लगातार राष्ट्रीय व संवैधानिक पदों पर आगे बढ़ाना—
डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को राज्यसभा और फिर राष्ट्रीय महामंत्री
शिव प्रताप शुक्ल को राज्यसभा से राज्यपाल
संगीता यादव को राज्यसभा
इन सबके बीच यह सवाल स्वाभाविक है कि कैडर आधारित पार्टी में संगठनात्मक अनुभव को दरकिनार क्यों किया गया?
एसआईआर: ज़मीन पर अव्यवस्था, ऊपर आरोप-प्रत्यारोप
11 जनवरी को चुनाव आयोग द्वारा सभी बूथों पर लगाए गए विशेष शिविरों की भाजपा को औपचारिक सूचना तक नहीं दी गई। परिणामस्वरूप—
बूथों पर भाजपा के बीएलए नहीं पहुंचे
जिलाध्यक्षों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए
एक ही परिवार के सदस्यों के नाम अलग-अलग बूथों में डाल दिए गए
प्रशासन तर्क दे रहा है कि “1200 मतदाता प्रति बूथ” की सीमा के कारण ऐसा हुआ, जबकि संगठन का सवाल सीधा है—
अगर एक परिवार एक साथ मतदान नहीं कर सकता, तो एसआईआर का औचित्य क्या है?
एएसडी (अनुपस्थित, शिफ्टेड, मृत) मतदाता सूची में भी भारी गड़बड़ियां सामने आई हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी अपनी पीठ थपथपा रहे हैं और दोष राजनीतिक दलों पर मढ़ा जा रहा है।
कार्यकर्ता का सवाल: सत्ता मिली, सम्मान क्यों नहीं?
जब मुख्यमंत्री संगठन को कटघरे में खड़ा करते हैं, तो जमीनी कार्यकर्ता पलटकर पूछ रहा है—
2017 और 2022 में सरकार बनाने के बाद भी
निगम, बोर्ड, समितियों में आज तक नियुक्तियां क्यों नहीं?
कार्यकर्ता सिर्फ डेटा भरने और कॉल सेंटर चलाने तक सीमित क्यों रह गया?
आज भी हजारों कार्यकर्ता सभासद, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष बनने की प्रतीक्षा में हैं, जबकि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग ज़मीन पर उतरे बिना “डाटा दुरुस्त” करने में व्यस्त रहे।
सूत्र बताते हैं कि इन्हीं तथ्यों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को सीधे मेल भेजे गए हैं, जिनमें यूपी के कुछ जिम्मेदार पदाधिकारियों की कार्यप्रणाली का विस्तार से उल्लेख है।
सबसे बड़ा सवाल: चार करोड़ आखिर गए कहाँ?
अब सबसे अहम और असहज प्रश्न—
अगर एसआईआर में कटे चार करोड़ मतदाता
न तो उत्तर प्रदेश से बाहर गए
न ही फर्जी साबित हुए
तो फिर यह संख्या क्या संकेत देती है?
“चार करोड़ तो भारत पर भारी हैं” — यह वाक्य राजनीतिक जुमला था या प्रशासनिक सच्चाई?
निष्कर्ष
एसआईआर केवल मतदाता सूची का सवाल नहीं रह गया है। यह अब योगी सरकार की प्रशासनिक क्षमता, संगठन की उपेक्षा, और भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन की कसौटी बन चुका है।
यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई, तो 2024 की तरह यह मुद्दा 2027 की राजनीति में भी भारी पड़ सकता है।

या सोशल मीडिया थ्रेड (X/Facebook) में भी रूपांतरित कर सकता हूँ। 

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