माघ मेले की आस्था में टकराव:अभिमुक्तेश्वरानंद क्यों हर बार विवाद के केंद्र में?
माघ मेला—यह केवल स्नान, साधना और श्रद्धा का उत्सव नहीं है। यह सत्ता, प्रशासन, संसाधन और प्रभाव का वह विराट संगम है, जहाँ आस्था की आड़ में व्यवस्थाएँ खड़ी होती हैं और सवाल पूछने वालों को अक्सर अपराधी बना दिया जाता है। ऐसे ही मंच पर एक नाम बार-बार उभरता है—मुक्तेश्वर आनंद। प्रश्न यह नहीं कि वे विवादों में क्यों हैं, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या माघ मेला बिना विवाद के चल ही नहीं सकता?
अभिमुक्तेश्वर आनंद का हर माघ मेला के साथ विवाद में आना कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया का परिणाम है। जब भी मेला शुरू होता है, व्यवस्थाएँ सजती हैं, बजट जारी होता है और दावे किए जाते हैं—“सब कुछ सुचारु है।” लेकिन जैसे ही कोई व्यक्ति इन दावों पर उंगली रखता है, वही व्यक्ति विवादों का चेहरा बना दिया जाता है।
माघ मेला प्रशासन हमेशा “सब ठीक है” की मुद्रा में रहता है। किंतु अभिमुक्तेश्वर आनंद बार-बार उस परदे को हटाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। भूमि आवंटन, साधु-संतों की व्यवस्था, स्वच्छता, सुरक्षा, खर्च और पारदर्शिता—इन प्रश्नों पर बोलना प्रशासन को सहज नहीं लगता। यही असहजता धीरे-धीरे टकराव में बदल जाती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि विवाद केवल क्या कहा गया इस पर नहीं होते, बल्कि कैसे कहा गया इस पर भी होते हैं। मुक्तेश्वर आनंद की शैली सीधी, बेबाक और कई बार तीखी रही है। माघ मेला जैसे संवेदनशील धार्मिक आयोजन में यह तीखापन सत्ता और व्यवस्था को सीधा चुनौती देता है। नतीजा—आलोचना को “अशांति फैलाने” और सवाल को “विवाद” करार दे दिया जाता है।
लेकिन क्या हर विवाद का अर्थ यह है कि सवाल गलत हैं? इतिहास गवाह है कि बड़े सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में सुधार की शुरुआत हमेशा टकराव से हुई है। माघ मेला भी इससे अलग नहीं। यदि कोई व्यक्ति बार-बार अव्यवस्था की ओर संकेत कर रहा है, तो समस्या उस व्यक्ति में नहीं, बल्कि शायद उस व्यवस्था में है, जो सवालों से डरती है।
आज स्थिति यह है कि माघ मेला में चुप रहना ही सदाचार और बोलना अपराध समझा जाने लगा है।
अभिमुक्तेश्वर आनंद का विवादों में होना इस बात का प्रतीक है कि मेला केवल श्रद्धा का उत्सव नहीं, बल्कि सत्ता का किला भी बन चुका है, जहाँ हर सवाल घुसपैठ माना जाता है।अंततः प्रश्न अभिमुक्तेश्वर आनंद का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या माघ मेला में आस्था के साथ-साथ उत्तरदायित्व भी स्नान करेगा? या फिर हर वर्ष कोई न कोई “अभिमुक्तेश्वर आनंद” विवादों का बोझ उठाता रहेगा और व्यवस्था निर्विवाद बनी रहेगी?
यह टकराव व्यक्ति बनाम व्यवस्था का है। और जब तक व्यवस्था सवालों से भागती रहेगी, तब तक माघ मेला के साथ विवाद भी स्थायी तीर्थ बने रहेंगे।

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