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गुरुवार, 1 जनवरी 2026

स्वतंत्र भारत का पहला नर संहार जों किसी को भी याद नहीं, मोदीजी उसकी भी सुध लीजिये


1948 : जब आज़ाद भारत ने ब्राह्मणों का रक्त चुपचाप बहने दिया

वेद प्रकाश सिँह






आज़ादी के जश्न के कुछ ही महीनों बाद भारत ने वह पाप किया, जिसे न संविधान भूल पाया, न इतिहास—बस सत्ता और तथाकथित नैतिक ठेकेदारों ने दबा दिया।1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में जो हुआ, वह कोई स्वतःस्फूर्त जनाक्रोश नहीं था, बल्कि जातिगत घृणा का सुनियोजित विस्फोट था—और उसका लक्ष्य था चितपावन ब्राह्मण समाज।यह सच असहज है, इसलिए पाठ्यपुस्तकों से गायब है।अपराध एक का, दंड पूरे समाज को नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या की—यह अपराध था, और दंड उसे मिलना चाहिए था।लेकिन सवाल यह है कि गोडसे के नाम पर पुणे, मुंबई, नागपुर, सतारा, कोल्हापुर और सैकड़ों गाँवों में ब्राह्मणों को क्यों मारा गया?

क्यों घर-घर जाकर गोत्र पूछे गए?क्यों स्त्रियों के साथ अमानवीयता हुई?क्यों बच्चों और बुज़ुर्गों को नहीं बख्शा गया?क्या भारत का संविधान तब केवल काग़ज़ था?यह भीड़ नहीं थी, यह व्यवस्था की चुप्पी थीयदि यह महज़ भीड़ होती, तो प्रशासन रोकता।यदि यह आकस्मिक होता, तो दोषी पकड़े जाते।लेकिन हुआ क्या?पुलिस मूकदर्शक बनी,शिकायतें दर्ज नहीं हुईं रिकॉर्ड “ग़ायब” कर दिए गएऔर सत्ता प्रतिष्ठान ने सुविधाजनक मौन ओढ़ लिया.यह मौन निर्दोषों के खून से ज़्यादा भयावह था।

सावरकर : विचारधारा से बदला:वीर सावरकर को गांधी-हत्या के आरोप से अदालत ने मुक्त किया।लेकिन भीड़ ने अदालत का फ़ैसला नहीं माना।उनके घर पर हमला हुआ, उनके भाई की हत्या हुई।यह स्पष्ट कर देता है कि हिंसा का कारण अपराध नहीं, विचारधारा थी।कितने मरे? — यही प्रश्न सत्ता को डराता है सरकारी आंकड़े नहीं हैं।क्योंकि यदि आंकड़े होंगे, तो जवाबदेही होगी।स्वतंत्र अध्ययनों में संख्या—सैकड़ों से लेकर हज़ारों (2000–8000) तक बताई जाती हैलेकिन—न कोई आयोग,नकोई मुआवज़ा,न कोई राष्ट्रीय शोक,न कोई स्मारक,क्या इसलिए कि मृतक “गलत जाति” के थे?चयनात्मक संवेदना का राष्ट्र,भारत में पीड़ा भी राजनीति देख कर तय होती है।कुछ नरसंहार इतिहास बन जाते हैं,कुछ “अफवाह” कह कर दफ़ना दिए जाते हैं।1948 का ब्राह्मण नरसंहार इसलिए स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि वह सुविधाजनक नहीं था।वह उस नैरेटिव को तोड़ता है, जिसमें कुछ समुदाय हमेशा अपराधी और कुछ हमेशा पीड़ित दिखाए जाते हैं।चेतावनी : इतिहास मौन से दोहराया जाता हैजो समाज अपने निर्दोष मृतकों को भूल जाता है,वह नए शिकार तैयार करता है।1948 पर चुप्पी.आज की घृणा को वैधता देती है।यह सम्पादकीय बदले की नहीं,न्याय और स्वीकार्यता की माँग है.

यह लेख किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं,बल्कि इतिहास की बेईमानी के विरुद्ध अभियोग है।निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों को शत्-शत् नमन 🙏सत्य दबाया जा सकता है,पर मिटाया नहीं जा सकता.

 क्या राहुल गांधी और उनकी प्रजातियों 8000 चित्र पवन ब्राह्मणों की हत्या का कोई जवाब दे सकती हैं नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या की सब ने निंदा किया नाथूराम की बिरादरी को नमस्ते नमूत करने के लिए किसने अधिकार दिया सावरकर को पानी पीकर के राहुल गाली देते हैं चित्र पवन ब्राह्मण होने के नाते सावरकर के भाई को पूछ कर कांग्रेसियों ने क्यों मार डाला क्या भारत सरकार हमेशा के लिए मौन रहेगी स्वतंत्र भारत के पहले नरसंहार पर श्वेत पत्र जारी नहीं हो सकता क्या लोकसभा और विधानसभा में बैठे हुए कर्ताधर्ता अपना दोनों हाथ और मुंह गांधी जी के तीनों बंदरों की तरह हैं न्याय की आवश्यकता है चित्र पवन ब्राह्मणों की करती आत्मा को भारत सरकार के न्याय के प्रधानमंत्री श्रद्धांजलि स्वरुप उनको याद करें और उनके सम्मान में देर से ही सही कोई आयोग जरूर गठित किया जाए.

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