ओशो बनाम राष्ट्रवाद : ‘वंदे मातरम्’ को बचाने की लड़ाई
भारत आज एक अजीब विडंबना से गुजर रहा है। जिन शब्दों ने इस देश को आज़ादी के लिए खड़ा किया, वही शब्द आज राजनीतिक लाठी बना दिए गए हैं। ‘वंदे मातरम्’—जो कभी मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता का गीत था—आज निष्ठा की परीक्षा बना दिया गया है। और इसी मोड़ पर ओशो की चेतावनी अचानक असहज रूप से प्रासंगिक हो उठती है।ओशो राष्ट्र के विरोधी नहीं थे, वे राष्ट्र को देवता बना देने के विरोधी थे। उन्होंने साफ कहा था—जब राष्ट्र भगवान बनता है, तब सबसे पहले मनुष्य मरता है। आज यही हो रहा है। राष्ट्रप्रेम को नारे में, गीत को आदेश में और संस्कृति को सत्ता के उपकरण में बदला जा रहा है। ‘वंदे मातरम्’ अब प्रेम का स्वर नहीं, डर का प्रमाण-पत्र बनता जा रहा है।यह प्रश्न असहज है, पर अनिवार्य है—
क्या मातृभूमि से प्रेम जबरन कराया जा सकता है?क्या माँ के चरणों में सिर झुकाने के लिए पुलिस, अदालत या भीड़ की जरूरत पड़ती है?ओशो कहते थे—जिस प्रेम को थोपा जाए, वह प्रेम नहीं, दासता है।
और आज जो हो रहा है, वह ठीक यही है—दासता का उत्सव।विडंबना यह है कि जो लोग सबसे ऊँची आवाज़ में ‘वंदे मातरम्’ चिल्ला रहे हैं, वही लोग—नदियों को मरने दे रहे हैंजंगलों को काट रहे हैं,भाषा औरसंस्कृति को बाज़ार के हवाले कर रहे हैं यदि यही राष्ट्रभक्ति है, तो ओशो का विरोध बिल्कुल सही था।‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है—मैं नमन करता हूँ।नमन आदेश से नहीं होता,नमन डर से नहीं होता,नमन चेतना से होता है।
आज ‘वंदे मातरम्’ को सबसे ज़्यादा खतरा बाहरी आलोचकों से नहीं, बल्कि भीतरी उन्मादियों से है—जो इसे संस्कृति नहीं, सत्ता का हथियार बनाना चाहते हैं। जो यह नहीं समझते कि माँ का सम्मान तलवार से नहीं, संरक्षण से होता है।
ओशो की सबसे बड़ी सीख यही थी—
भीड़ से सावधान रहो।
भीड़ सोचती नहीं, कुचलती है।
जब ‘वंदे मातरम्’ भीड़ का नारा बनता है, तब वह जोड़ता नहीं, तोड़ता है। वह राष्ट्र नहीं बनाता, राष्ट्र-धर्म बनाता है—जहाँ सवाल पूछना पाप और असहमति देशद्रोह हो जाती है।
भारत को न तो ओशो-विरोधी राष्ट्रवाद चाहिए,
न ही राष्ट्रविरोधी बौद्धिकता।
भारत को चाहिए—
ओशो की चेतना, ताकि उन्माद रुके
और ‘वंदे मातरम्’ की स्मृति, ताकि जड़ें बचें
जो ओशो को राष्ट्र-विरोधी कहता है, वह भारत को नहीं समझता।
और जो ‘वंदे मातरम्’ को आदेश बनाता है, वह माँ को नहीं समझता।
सच्चा ‘वंदे मातरम्’ न अदालत से निकलता है,
न मंच से, न भीड़ से—
वह निकलता है उस व्यक्ति से
जो निडर होकर कह सके—
मैं अपनी धरती से प्रेम करता हूँ,
क्योंकि मैं जागरूक हूँ—डरपोक नहीं।
यही ओशो का भारत है।
और यही ‘वंदे मातरम्’ की असली रक्षा।
Tags
वन्देमातरम 75