डिजिटल इंडिया या डिजिटल आत्मसमर्पण?
जब डेटा बंदरगाह बन जाए, सर्वर गोदाम हों और एल्गोरिद्म नई सत्ता
राजेंद्र नाथ तिवारी
भारत आज गर्व से स्वयं को “डिजिटल इंडिया” कहता है। मोबाइल हाथ में है, इंटरनेट जेब में है, भुगतान उंगलियों पर है और दुनिया एक ऐप की दूरी पर। सरकारें इसे उपलब्धि मानती हैं, विज्ञापन इसे क्रांति बताते हैं और समाज इसे सुविधा समझकर अपनाता चला जा रहा है। लेकिन इतिहास सिखाता है कि हर सुविधा के पीछे सत्ता छिपी होती है, और हर सत्ता यह तय करती है कि लाभ किसे मिलेगा और कीमत कौन चुकाएगा।
सवाल यह नहीं है कि भारत डिजिटल हो रहा है या नहीं। सवाल यह है कि भारत डिजिटल किसके नियंत्रण में हो रहा है? व्यापार नहीं रहा, अब “डेटा-व्यापार” है,पुराने समय में व्यापार का अर्थ था—कच्चा माल, श्रम, पूंजी और बाज़ार।आज व्यापार का नया सूत्र है—डेटा + एल्गोरिद्म + सर्वर + नेटवर्क प्रभाव।जिस देश के पास डेटा है,उसके पास उपभोक्ता की आदतें हैं।जिसके पास आदतें हैं,उसके पास भविष्य है।भारत की 140 करोड़ की आबादी,दनिया का सबसे बड़ा डेटा-स्रोत है।
लेकिन यह डेटा—न भारत के सर्वरों में सुरक्षित है,न भारत के कानूनों के अधीन पूरी तरह नियंत्रित है,न भारत के एल्गोरिद्म से संचालित है।भारत डेटा पैदा करता है,लेकिन मुनाफा विदेशी कंपनियाँ कमाती हैं।यह व्यापार नहीं,डिजिटल कच्चे माल की लूट है।
डेटा बंदरगाह और सर्वर गोदाम: नया उपनिवेशवाद
अंग्रेज़ भारत से कपास ले जाते थे,कपड़ा बनाकर बेचते थे।आज बहुराष्ट्रीय डिजिटल कंपनियाँभारत से डेटा ले जाती हैं,एल्गोरिद्म बनाकर भारत को ही बेचती हैं।फर्क सिर्फ इतना है कितब लूट दिखाई देती थी,आज वह “फ्री सर्विस” के नाम पर मुस्कराकर होती है।डेटा बंदरगाह विदेश में हैं—जहाँ भारत का डिजिटल माल उतरता है।सर्वर गोदाम भी वहीं हैं—जहाँ भारत की सोच, रुचि, भय और आकांक्षा स्टोर की जाती है।और हम ताली बजाते हैं कि इंटरनेट सस्ता हो गया।
एल्गोरिद्म: अदृश्य शासक
आज किसी राजा या तानाशाह की ज़रूरत नहीं।एल्गोरिद्म तय करता है—आप क्या देखेंगेक्या नहीं देखेंगे,किससे प्रभावित होंगे,किससे घृणा करेंगे क्या “ट्रेंड” है,क्या “ग़ैरज़रूरी” हैयह,सत्ता अदृश्य है,,इसलिए खतरनाक है।क्योंकि इसके खिलाफन विरोध दर्ज होता है,न क्रांति।भारत का युवासमझता है कि वह “चुन” रहा है,लेकिन सच यह है किउसे चुने हुए विकल्प दिखाए जा रहे हैं।यह मानसिक स्वाधीनता पर सबसे बड़ा हमला है।
डिजिटल सैनिक और क्लाउड युद्ध
युद्ध अब सीमा पर नहीं लड़े जाते।युद्ध—सर्वरों पर-नेटवर्क पर-सूचना प्रवाह पर-नैरेटिव पर
लड़े जाते हैं।-क्लाउड आज की छावनी है।एल्गोरिद्म आज का जनरल।और भारत?भारत का डिजिटल बुनियादी ढांचा आज भी—विदेशी क्लाउड पर विदेशी सॉफ्टवेयर पर,विदेशी अपडेट परनिर्भर है।यह वही स्थिति है जैसे आपकी सेना का गोला-बारूद,दुश्मन के गोदाम में रखा हो।
डिजिटल गुलामी: बिना जंजीर, बिना कोड़े
पुरानी गुलामी में—मालिक दिखता था-को-ड़ा दिखता था-पीड़ा दिखती थी-नई गुलामी में—मालिक “यूज़र एग्रीमेंट” में छिपा है--कोड़ा “नोटिफिकेशन” है-पीड़ा “डोपामिन” में ढकी हुई है-लोग खुद को आज़ाद समझते हैं,क्योंकि उन्हें कुछ “मुफ़्त” मिल रहा है।लेकिन इतिहास गवाह है—सबसे खतरनाक गुलामी वही होती है जिसे गुलामी न कहा जाए।
भाषा, संस्कृति और चेतना पर हमला
डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल तकनीक नहीं होते,वे संस्कृति वाहक होते हैं।आज—भारतीय भाषाएँ एल्गोरिद्मिक रूप से हाशिये पर हैं,भारतीय संदर्भ “रीच” के नाम पर दबा दिए जाते हैं-भारतीय दृष्टिकोण “कम्युनिटी गाइडलाइन्स” में फँस जाता है-नैरेटिव तय होता है कि—क्या आधुनिक है-क्या पिछड़ा है-क्या स्वीकार्य है-क्या “आउटडेटेड”यह सांस्कृतिक उपनिवेशवाद है, बंदूक से नहीं,स्क्रीन से चलता है।
सरकारें भी भ्रम में, समाज भी-सरकारें गर्व से कहती हैं—डिजिटल भुगतान-डिजिटल पहचान-डिजिटल सेवाएँले किन यह शायद ही पूछा जाता है कि—इन सेवाओं का बैकएंड किसके हाथ में है?डेटा की अंतिम सत्ता किसके पास है?आपात स्थिति में स्विच कौन दबाएगा?समाज सुविधा के नशे में है।और सत्ता आत्ममुग्धता में।यह वही स्थिति है-जब ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के बहाने आई थी,और सत्ता लेकर चली गई।
डिजिटल आत्मनिर्भरता: क्यों जरूरी है-डिजिटल आत्मनिर्भरता कोई तकनीकी शौक नहीं,राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है।जब तक भारत के पास—अपना सर्च इंजन-अपना सोशल मीडिया-अपना क्लाउड-अपना ऑपरेटिंग सिस्टम-अपने एल्गोरिद्मन हीं होंगे,तब तक भारत केवल डिजिटल उपभोक्ता रहेगा,निर्माता नहीं।और उपभोक्ता राष्ट्र कभी संप्रभु नहीं होता।
“फ्री सर्विस” का भ्रम-अगर कोई सेवा सच में फ्री होती,तो उसका व्यापार मॉडल नहीं होता।
सच्चाई यह है—अगर आप पैसे नहीं दे रहे,तो आप ही उत्पाद हैं।भारत का नागरिक उत्पाद बन चुका है—विज्ञापन के लिए-राजनीतिक प्रयोगों के लिए-सामाजिक इंजीनियरिंग के लिएऔर यह सबउसकी सहमति से,लेकिन उसकी समझ के बिना।
समाधान: केवल भाषण नहीं, नीति और संकल्प-समाधान केवल“बहिष्कार” के नारे में नहीं।समाधान है—राष्ट्रीय डिजिटल नीति जो डेटा को संप्रभु संपत्ति माने-भारतीय क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चरओपन-सोर्स लेकिन भारतीय नियंत्रण-भारतीय भाषाओं के लिए एल्गोरिद्मिक प्राथमिकता-डिजिटल साक्षरता, सिर्फ उपयोग नहीं, समझ और सबसे ज़रूरी—राजनीतिक इच्छाशक्ति।विकास या आत्मसमर्पण?डिजिटल इंडिया तभी राष्ट्रनिर्माण है
जब—डेटा भारत में रहे-निर्णय भारत करे-एल्गोरिद्म भारत के हित में होंऔर तकनीक भारत की चेतना से संचालित हो अन्यथा यह विकास नहीं,डिजिटल आत्मसमर्पण है।आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह नहीं पूछेंगी कि इंटरनेट कितना तेज़ था,वे पूछेंगी—जब गुलामी डिजिटल रूप में लौट रही थी,तब आप चुप क्यों थे?”
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