वन्देमातरम एकषष्टिः श्रृंखला 61
वन्देमातरम् और लाल–बाल–पाल
"वन्देमातरम्" केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की घोषणा और राजनीतिक प्रतिरोध का उद्घोष है। इस उद्घोष को साहित्य की सीमाओं से निकालकर जन–आंदोलन की चेतना में बदलने का ऐतिहासिक कार्य जिस त्रिमूर्ति ने किया, वह थी — लाल–बाल–पाल: लाला लाजपत राय, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चन्द्र पाल। इन तीनों नेताओं ने वन्देमातरम् को भावनात्मक भक्ति से आगे बढ़ाकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध वैचारिक और राजनीतिक शस्त्र बनाया।यह लेख वन्देमातरम् और लाल–बाल–पाल के बीच उस गहरे वैचारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंध का विश्लेषण है, जिसने भारतीय राष्ट्रवाद को उग्र, आत्मसम्मानपूर्ण और जनोन्मुख बनाया।वन्देमातरम्: साहित्य से संघर्ष तक\nबंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वन्देमातरम् का प्रथम प्रकट रूप आनन्दमठ में मिलता है। यह गीत भारत को माता के रूप में देखता है — ऐसी माता जो वैभवशाली अतीत, पीड़ादायक वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य की प्रतीक है। वन्देमातरम् की शक्ति उसकी भाषा, प्रतीकों और भावनात्मक आवेग में निहित है।उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब भारतीय राजनीति याचिकाओं, प्रार्थनाओं और संवैधानिक सुधारों तक सीमित थी, तब वन्देमातरम् ने जनता के भीतर आत्मगौरव और प्रतिरोध की भावना को जन्म दिया। यही वह क्षण था जब यह गीत केवल काव्य न रहकर राजनीतिक घोषणा–पत्र बन गया। लाल–बाल–पाल: उग्र राष्ट्रवाद की त्रिमूर्ति लाल–बाल–पाल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के उस चरण का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे उग्र या क्रांतिकारी राष्ट्रवाद कहा जाता है। इनका मानना था कि स्वतंत्रता दया या याचिका से नहीं, बल्कि त्याग, संघर्ष और जनजागरण से प्राप्त होती है।वन्देमातरम् इन तीनों के लिए केवल एक गीत नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का स्वर था — ऐसा स्वर जो जनता को सोई हुई दासता से जगाता है। बाल गंगाधर तिलक: वन्देमातरम् और स्वराज्य का उद्घोष\nलोकमान्य तिलक का प्रसिद्ध कथन — "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" — वस्तुतः वन्देमातरम् की राजनीतिक व्याख्या है। तिलक के लिए मातृभूमि की वंदना का अर्थ था — उसे विदेशी शासन से मुक्त कराना। तिलक ने गणेशोत्सव और शिवाजी महोत्सव जैसे सार्वजनिक उत्सवों को राष्ट्रीय चेतना के मंच में परिवर्तित किया। इन आयोजनों में वन्देमातरम् सामूहिक रूप से गाया जाता था, जिससे राष्ट्रवाद घर–घर और गली–गली तक पहुँचा। ब्रिटिश सत्ता को यह सांस्कृतिक–राजनीतिक संगम अत्यंत खतरनाक प्रतीत हुआ।तिलक पर देशद्रोह के मुकदमे चले, उन्हें कारावास दिया गया, पर वन्देमातरम् उनके संघर्ष का स्थायी
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