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सोमवार, 29 दिसंबर 2025


वन्देमातरम् – 51वीं श्रृंखला


क्या मुसलमान ‘माँ तुझे सलाम’ भी "हराम" करेगा?

(राष्ट्र, धर्म और उस असहज प्रश्न का विवेचन जिसे बार-बार दबाया गया)

भारत कोई भूगोल मात्र नहीं है।यह एक सभ्यता है—ऐसी सभ्यता, जिसने युद्ध देखे, आक्रमण सहे, शासन बदले, धर्म आए-गए, पर मिट्टी नहीं बदली। इसी मिट्टी को कभी आर्यावर्त कहा गया, कभी हिंदुस्तान, कभी इंडिया और कभी भारत। इसी मिट्टी को जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने “माँ” कहकर पुकारा—तो वह किसी देवी की स्थापना नहीं कर रहे थे, वे एक सभ्यतागत सत्य को शब्द दे रहे थे।लेकिन आज, स्वतंत्र भारत में,इसी शब्द “माँ” पर विवाद खड़ा कर दिया गया है। इसी वन्दना को संदेह के घेरे में डाल दिया गया है।

प्रश्न अब यह नहीं है कि वन्देमातरम् क्या है—

प्रश्न यह है कि क्या इस देश में राष्ट्र के प्रति भावनात्मक निष्ठा भी अब धर्म की कसौटी पर तय होगी? विवाद की जड़: वन्देमातरम् नहीं, राष्ट्र-बोध है ,जब कोई कहता है—

“मुझे वन्देमातरम् से आपत्ति है”तो वह वस्तुतः यह नहीं कह रहा कि उसे एक गीत से समस्या है।वह कह रहा है—“मुझे इस विचार से समस्या है कि यह भूमि मेरी माँ है।”और जब कोई आगे बढ़कर यह कहता है—

“माँ तुझे सलाम कहना हराम है”तो यह धार्मिक मत नहीं रह जाता—यह राजनीतिक वक्तव्य बन जाता है।यहाँ हराम शब्द का प्रयोग ईमानदारी से नहीं,बल्कि डर पैदा करने के लिए किया जाता है।इस्लाम और मातृभूमि: टकराव का मिथक,सबसे पहले इस भ्रम को तोड़ना आवश्यक है कि इस्लाम मातृभूमि की वंदना के खिलाफ है। इस्लाम में—वतन को छोड़ना पीड़ा माना गया है ,भूमि से प्रेम को स्वाभाविक भावना माना गया है “हिजरत” भी भूमि से जुड़ाव की पीड़ा का पमा पैगम्बर मोहमदﷺ का मक्का से प्रस्थान इस बात का साक्ष्य है कि

भूमि से प्रेम ईमान के विरुद्ध नहीं है।तो फिर भारत को माँ कहना कैसे शिर्क हो गया?

उत्तर स्पष्ट है—यह इस्लामी सिद्धांत नहीं, भारतीय राजनीति की देन है।माँ शब्द से डर क्यों?मुस्लिम समाज में—माँ की सेवा सर्वोच्च कर्तव्य है,माँ की दुआ सबसे बड़ी ताकत है

माँ के अपमान को अपराध माना जाता है

तो फिर राष्ट्र के संदर्भ में वही शब्द अपवित्र कैसे हो गया? क्या इसलिए कि— अगर भारत माँ बन गई, तो किसी और पहचान की सर्वोच्चता समाप्त हो जाएगी? यह डर धार्मिक नहीं है—यह पहचान का डर है।

वन्देमातरम्: गीत नहीं, चेतना वन्देमातरम् किसी पूजा का आह्वान नहीं करता।

यह गीत—किसी मंदिर का निर्देश नहीं देता

किसी मस्जिद का विरोध नहीं करता किसी चर्च को नकारता नहीं,यह केवल यह कहता है—“यह भूमि मेरी माँ है, और मैं उसका ऋणी हूँ।”जो व्यक्ति इसे नहीं कह पाता,वह केवल शब्द नहीं टाल रहा—वह ऋण स्वीकारने से बच रहा है।संविधान की आड़ में पलता विरोधअ क्सर कहा जाता है— “संविधान हमें वन्देमातरम् कहने को मजबूर नहीं करता।”यह सत्य है। लेकिन संविधान यह भी नहीं कहता कि राष्ट्र के प्रतीकों को अपमानित करना अधिकार है।अनुच्छेद 51(A) स्पष्ट करता है— राष्ट्र की एकता, अखंडता और प्रतीकों का सम्मान नागरिक कर्तव्य है।

तो प्रश्न यह है—क्या कर्तव्य केवल किताबों में पढ़ने के लिए हैं?क्या राष्ट्र केवल सुविधाओं का प्रदाता है, भावना का केंद्र नहीं?तुष्टिकरण का सच वन्देमातरम् पर विवाद खड़ा करना— किसी धार्मिक अल्पसंख्यक की रक्षा नहीं करता। यह केवल उन नेताओं की रक्षा करता है— जो समुदाय को डर में रखकर सत्ता की खेती करते हैं। अगर सचमुच वन्देमातरम् इस्लाम विरोधी होता— तो आज़ादी की लड़ाई में शामिल मुस्लिम क्रांतिकारी इसे क्यों गाते?

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ, हसरत मोहानी,मौलाना आज़ाद—इनका इतिहास जानबूझकर पाठ्यक्रमों से हल्का कर दिया गया। क्योंकि ये सवाल पूछते हैं—“अगर हम मुसलमान होकर भारत माँ कह सकते हैं, तो आज की पीढ़ी क्यों नहीं?”माँ तुझे सलाम: किसे सलाम है?

यह सलाम—किसी पत्थर को नहीं,किसी मूर्ति को नहीं,किसी धर्म को नहीं,यह सलाम है— उस माँ को जिसने—बेटा सीमा पर खोया,बेटी दंगों में गंवाई,फिर भी तिरंगे को झुकने नहीं दिया।

क्या इस माँ को सलाम करना हराम है?अगर हाँ— तो फिर मानवता भी हराम होनी चाहिए।मुस्लिम समाज के भीतर का मौनस,बसे चिंताजनक तथ्य यह है— कि मुस्लिम समाज के भीतर ,इस प्रश्न पर खुली बहस नहीं होने दी जाती।जो कहता है— “वन्देमातरम् कहने में कोई बुराई नहीं”उसे चुप करा दिया जाता है।डर बनाया गया है— कि राष्ट्र से जुड़ाव कहीं मज़हब से बेदखली न बन जाए।यह डर पैदा किया गया है—और डर पैदा करना सबसे बड़ा पाप है।राष्ट्र बनाम मज़हबी राजनीति भारत में राष्ट्र कोई नया विचार नहीं है।यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृति है।लेकिन जब मज़हब को राष्ट्र से ऊपर रखा जाता है— तो समाज टूटता है। वन्देमातरम् इसीलिए खटकता है— क्योंकि यह याद दिलाता है कि इस देश की पहचान मज़हब से बड़ी है।

अंतिम प्रश्न: समस्या कहाँ है?तो अब प्रश्न साफ है—समस्या वन्देमातरम् में नहीं है। समस्या माँ शब्द में नहीं है।समस्या सलाम में नहीं है।समस्या है— उस सोच में, जो राष्ट्र को केवल एक प्रशासनिक इकाई मानती है, भावनात्मक इकाई नहीं।वन्देमातरम् एक निर्णय है ,वन्देमातरम् कोई बाध्यता नहीं।यह एक निर्णय है।यह तय करना कि—आप इस मिट्टी को अपना मानते हैं या नहीं।आप इस ऋण को स्वीकार करते हैं या नहीं,यह गीत तलवार नहीं—दर्पण है।जो इसमें खुद को नहीं देख पाता, वह अक्सर इसे तोड़ने की कोशिश करता है। वन्देमातरम्।यह नारा नहीं—यह भारत की आत्मस्वीकृति है।



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