“वन्देमातरम् और रामण महर्षि, योगानंद, गोपीनाथ कविराज व अन्य”
विषय पर एक गंभीर, वैचारिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विमर्श है। वन्देमातरम् और भारतीय आत्मा:रामण महर्षि, परमहंस योगानंद, गोपीनाथ कविराज व भारतीय आध्यात्मिक राष्ट्रवाद, वन्देमातरम्: केवल गीत नहीं, चेतना का घोष‘वन्देमातरम्’ कोई साधारण राष्ट्रगीत नहीं है। यह भारत की आत्मिक स्मृति, सभ्यतागत संकल्प और सांस्कृतिक आत्मबोध का घोष है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत भारत को केवल भौगोलिक इकाई नहीं मानता, बल्कि उसे माता, देवी, चेतना और तपस्या की भूमि के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
वन्देमातरम् में भारत—भूमि नहीं, साधना–क्षेत्र है,राज्य नहीं, संस्कृति है,सत्ता नहीं, साक्षात्कार है,यही कारण है कि यह गीत भारत के आध्यात्मिक पुरुषों को भीतर तक स्पर्श करता है—चाहे वे किसी संप्रदाय, पंथ या संस्था से जुड़े हों या न हों।
रामण महर्षि: मौन का वन्देमातरम्,रामण महर्षि ने कभी मंच से ‘वन्देमातरम्’ नहीं गाया।उन्होंने कोई राजनीतिक भाषण नहीं दिया। फिर भी उनका सम्पूर्ण जीवन वन्देमातरम् का मौन–उच्चारण था। अरुणाचल पर्वत की गोद में बैठा वह महापुरुष भारत की उस परंपरा का प्रतिनिधि था जहाँ मौन भी राष्ट्रभक्ति होता है।रामण महर्षि के लिए—आत्मा की खोज ही राष्ट्र–सेवा थी,अहंकार का क्षय ही स्वतंत्रता थी‘मैं कौन हूँ?’ का प्रश्न ही औपनिवेशिक दासता का उत्तर था।ब्रिटिश सत्ता भारत को बाहर से शासित कर रही थी,लेकिन रामण महर्षि भारत को भीतर से मुक्त कर रहे थे।जिस भूमि पर आत्मज्ञान का दीप जलता है, वही भूमि वन्देमातरम् की अधिकारी होती है।
रामण महर्षि का साधना–मार्ग बताता है कि वन्देमातरम् केवल नारा नहीं, आत्मसाक्षात्कार की राष्ट्रीय प्रक्रिया है।
. परमहंस योगानंद: वन्देमातरम् का वैश्विक उच्चारण
यदि रामण महर्षि भारत की आत्मा के भीतर स्थित मौन थे,
तो परमहंस योगानंद उस आत्मा की वैश्विक वाणी थे।योगानंद अमेरिका और पश्चिम में भारत को इस रूप में ले गए—
रहस्यवाद नहीं, विज्ञान–संगत अध्यात्म,संन्यास नहीं, जीवन–योग,पलायन नहीं, आत्मिक राष्ट्रवाद,उनकी प्रसिद्ध कृति Autobiography of a Yogi वस्तुतः भारत का आध्यात्मिक घोषणापत्र है।योगानंद के लिए भारत—केवल जन्मभूमि नहीं, विश्व–गुरु हैकेवल अतीत नहीं, मानवता का भविष्य है
उन्होंने कहा—“India is the land of spiritual experiments.”यही तो वन्देमातरम् का मूल भाव है—
भारत को मानव–चेतना की प्रयोगशाला मानना।
जब योगानंद पश्चिमी सभ्यता को योग, ध्यान और आत्मानुशासन का मार्ग दिखाते हैं, तब वे बिना नारा लगाए वन्देमातरम् का अंतरराष्ट्रीय अनुवाद कर रहे होते हैं।
4. गोपीनाथ कविराज: दर्शन में राष्ट्र, राष्ट्र में दर्शन
आचार्य गोपीनाथ कविराज आधुनिक भारत के उन दुर्लभ मनीषियों में हैं,जिनके लिए दर्शन, राष्ट्र और संस्कृति—तीनों अलग–अलग विषय नहीं थे।
वे काशी के प्रज्ञा–पुरुष थे,,जहाँ राष्ट्रवाद तलवार से नहीं, तर्क और साधना से जन्म लेता है।कविराज के लिए—भारत एक दार्शनिक निरंतरता है,वन्देमातरम् एक तत्त्व–वाक्य है
स्वतंत्रता एक चेतनात्मक उपलब्धि है,उन्होंने भारतीय दर्शन को
औपनिवेशिक हीनता से मुक्त किया,पाश्चात्य दृष्टि के दासत्व से निकाला,और उसे आत्मगौरव से जोड़ा,गोपीनाथ कविराज के लेखन में वन्देमातरम्— गीत नहीं,,दर्शन का राष्ट्रगान है।
अन्य साधक–चिंतक: एक मौन–परंपरा
भारत की विशेषता यह है कि यहाँ राष्ट्रभक्ति केवल आंदोलन नहीं,एक आंतरिक परंपरा है।स्वामी विवेकानंद ने कहा—
“मैं भारत को उसकी आत्मा में देखता हूँ।”श्री अरविंद ने वन्देमातरम् को,राजनीतिक संघर्ष से आध्यात्मिक साधना में रूपांतरित किया।महर्षि अरविंद के लिए भारत— शक्ति और चेतना दोनों था। इन सभी के लिए— वन्देमातरम् कोई धार्मिक नारा नहीं, बल्कि सभ्यतागत उत्तराधिकार था।
वन्देमातरम् बनाम औपनिवेशिक और वैचारिक दासता
ब्रिटिश शासन वन्देमातरम् से इसलिए डरता था
क्योंकि यह गीत तलवार से अधिक आत्मा को जगाता था।
आज भी— वन्देमातरम् से वही लोग असहज होते हैं
जो भारत को केवल संविधान की धाराओं में देखना चाहते हैं,
सभ्यता की चेतना में नहीं।रामण, योगानंद, कविराज—
तीनों बताते हैं कि—भारत पहले आत्मा है,बाद में राज्य।और जब आत्मा को नकारा जाता है,तो राष्ट्र केवल कागज़ बन जाता है।. आज के भारत के लिए संदेश ,आज जब भारत—तकनीक में आगे बढ़ रहा है ,राजनीति में मुखर है,वैश्विक मंच पर खड़ा है
तब सबसे बड़ा प्रश्न यही है— क्या भारत अपनी आत्मा से जुड़ा है?वन्देमातरम् का स्मरण—केवल समारोहों में नहीं,केवल औपचारिकताओं में नहीं बल्कि—शिक्षा में,चिंतन में
नीति में और आत्मानुशासन में होना चाहिए।रामण महर्षि हमें सिखाते हैं— मौन की शक्ति,योगानंद सिखाते हैं— विश्व–संवाद
कविराज सिखाते हैं— बौद्धिक स्वाधीनता ।इन तीनों का संयुक्त संदेश ही— आधुनिक भारत का वन्देमातरम् है।
वन्देमातरम् एक साधना है
वन्देमातरम्—न तो किसी पंथ का विरोधी है,न किसी समुदाय का शत्रु,यह तो— भारत की उस आत्मा का प्रणाम है
जिसने बुद्ध को जन्म दिया,शंकर को स्वर दिया,
रामण को मौन दिया और योगानंद को विश्व–वाणी।
जब भारत स्वयं को पहचानता है,तभी वन्देमातरम् पूर्ण होता है।
वन्देमातरम्—भारत का आत्म–नमस्कार है।
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वन्देमातरम् में भारत—भूमि नहीं, साधना–क्षेत्र है,राज्य नहीं, संस्कृति है,सत्ता नहीं, साक्षात्कार है,यही कारण है कि यह गीत भारत के आध्यात्मिक पुरुषों को भीतर तक स्पर्श करता है—चाहे वे किसी संप्रदाय, पंथ या संस्था से जुड़े हों या न हों।
रामण महर्षि: मौन का वन्देमातरम्,रामण महर्षि ने कभी मंच से ‘वन्देमातरम्’ नहीं गाया।उन्होंने कोई राजनीतिक भाषण नहीं दिया। फिर भी उनका सम्पूर्ण जीवन वन्देमातरम् का मौन–उच्चारण था। अरुणाचल पर्वत की गोद में बैठा वह महापुरुष भारत की उस परंपरा का प्रतिनिधि था जहाँ मौन भी राष्ट्रभक्ति होता है।रामण महर्षि के लिए—आत्मा की खोज ही राष्ट्र–सेवा थी,अहंकार का क्षय ही स्वतंत्रता थी‘मैं कौन हूँ?’ का प्रश्न ही औपनिवेशिक दासता का उत्तर था।ब्रिटिश सत्ता भारत को बाहर से शासित कर रही थी,लेकिन रामण महर्षि भारत को भीतर से मुक्त कर रहे थे।जिस भूमि पर आत्मज्ञान का दीप जलता है, वही भूमि वन्देमातरम् की अधिकारी होती है।
रामण महर्षि का साधना–मार्ग बताता है कि वन्देमातरम् केवल नारा नहीं, आत्मसाक्षात्कार की राष्ट्रीय प्रक्रिया है।
. परमहंस योगानंद: वन्देमातरम् का वैश्विक उच्चारण
यदि रामण महर्षि भारत की आत्मा के भीतर स्थित मौन थे,
तो परमहंस योगानंद उस आत्मा की वैश्विक वाणी थे।योगानंद अमेरिका और पश्चिम में भारत को इस रूप में ले गए—
रहस्यवाद नहीं, विज्ञान–संगत अध्यात्म,संन्यास नहीं, जीवन–योग,पलायन नहीं, आत्मिक राष्ट्रवाद,उनकी प्रसिद्ध कृति Autobiography of a Yogi वस्तुतः भारत का आध्यात्मिक घोषणापत्र है।योगानंद के लिए भारत—केवल जन्मभूमि नहीं, विश्व–गुरु हैकेवल अतीत नहीं, मानवता का भविष्य है
उन्होंने कहा—“India is the land of spiritual experiments.”यही तो वन्देमातरम् का मूल भाव है—
भारत को मानव–चेतना की प्रयोगशाला मानना।
जब योगानंद पश्चिमी सभ्यता को योग, ध्यान और आत्मानुशासन का मार्ग दिखाते हैं, तब वे बिना नारा लगाए वन्देमातरम् का अंतरराष्ट्रीय अनुवाद कर रहे होते हैं।
4. गोपीनाथ कविराज: दर्शन में राष्ट्र, राष्ट्र में दर्शन
आचार्य गोपीनाथ कविराज आधुनिक भारत के उन दुर्लभ मनीषियों में हैं,जिनके लिए दर्शन, राष्ट्र और संस्कृति—तीनों अलग–अलग विषय नहीं थे।
वे काशी के प्रज्ञा–पुरुष थे,,जहाँ राष्ट्रवाद तलवार से नहीं, तर्क और साधना से जन्म लेता है।कविराज के लिए—भारत एक दार्शनिक निरंतरता है,वन्देमातरम् एक तत्त्व–वाक्य है
स्वतंत्रता एक चेतनात्मक उपलब्धि है,उन्होंने भारतीय दर्शन को
औपनिवेशिक हीनता से मुक्त किया,पाश्चात्य दृष्टि के दासत्व से निकाला,और उसे आत्मगौरव से जोड़ा,गोपीनाथ कविराज के लेखन में वन्देमातरम्— गीत नहीं,,दर्शन का राष्ट्रगान है।
अन्य साधक–चिंतक: एक मौन–परंपरा
भारत की विशेषता यह है कि यहाँ राष्ट्रभक्ति केवल आंदोलन नहीं,एक आंतरिक परंपरा है।स्वामी विवेकानंद ने कहा—
“मैं भारत को उसकी आत्मा में देखता हूँ।”श्री अरविंद ने वन्देमातरम् को,राजनीतिक संघर्ष से आध्यात्मिक साधना में रूपांतरित किया।महर्षि अरविंद के लिए भारत— शक्ति और चेतना दोनों था। इन सभी के लिए— वन्देमातरम् कोई धार्मिक नारा नहीं, बल्कि सभ्यतागत उत्तराधिकार था।
वन्देमातरम् बनाम औपनिवेशिक और वैचारिक दासता
ब्रिटिश शासन वन्देमातरम् से इसलिए डरता था
क्योंकि यह गीत तलवार से अधिक आत्मा को जगाता था।
आज भी— वन्देमातरम् से वही लोग असहज होते हैं
जो भारत को केवल संविधान की धाराओं में देखना चाहते हैं,
सभ्यता की चेतना में नहीं।रामण, योगानंद, कविराज—
तीनों बताते हैं कि—भारत पहले आत्मा है,बाद में राज्य।और जब आत्मा को नकारा जाता है,तो राष्ट्र केवल कागज़ बन जाता है।. आज के भारत के लिए संदेश ,आज जब भारत—तकनीक में आगे बढ़ रहा है ,राजनीति में मुखर है,वैश्विक मंच पर खड़ा है
तब सबसे बड़ा प्रश्न यही है— क्या भारत अपनी आत्मा से जुड़ा है?वन्देमातरम् का स्मरण—केवल समारोहों में नहीं,केवल औपचारिकताओं में नहीं बल्कि—शिक्षा में,चिंतन में
नीति में और आत्मानुशासन में होना चाहिए।रामण महर्षि हमें सिखाते हैं— मौन की शक्ति,योगानंद सिखाते हैं— विश्व–संवाद
कविराज सिखाते हैं— बौद्धिक स्वाधीनता ।इन तीनों का संयुक्त संदेश ही— आधुनिक भारत का वन्देमातरम् है।
वन्देमातरम् एक साधना है
वन्देमातरम्—न तो किसी पंथ का विरोधी है,न किसी समुदाय का शत्रु,यह तो— भारत की उस आत्मा का प्रणाम है
जिसने बुद्ध को जन्म दिया,शंकर को स्वर दिया,
रामण को मौन दिया और योगानंद को विश्व–वाणी।
जब भारत स्वयं को पहचानता है,तभी वन्देमातरम् पूर्ण होता है।
वन्देमातरम्—भारत का आत्म–नमस्कार है।
🙏
Bharat ka aatm namaskar
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