वन्देमातरम द्वाचत्वारिंशत् श्रृंखला(42)
राष्ट्र की आत्मा पर हमला या वोट बैंक की सुनियोजित साज़िश?
जब कोई अपनी राजनीति चमकाने को राष्ट्र पर आघात पहुँचता है तो वह कई आराष्ट्रीय व्यक्तिगत पैदा करता है, यह आघात परमात्मा पर भी आघात है.जब कोई राष्ट्र अपने इतिहास, प्रतीकों और स्मृतियों पर ही शर्म करने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि संकट केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत है। भारत में वन्दे मातरम् को लेकर खड़ा किया गया विवाद ठीक ऐसा ही संकट है—जहाँ स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा को कटघरे में खड़ा कर दिया गया है और कठघरे में खड़े लोग वे हैं, जिनका स्वतंत्रता संग्राम से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं।वन्दे मातरम् पर सवाल उठाना केवल एक गीत पर प्रश्न नहीं है, यह भारत की राष्ट्रीय चेतना पर सीधा प्रहार है। यह प्रहार अनजाने में नहीं, बल्कि पूरी रणनीति, वैचारिक दुर्भावना और वोट बैंक के गणित के साथ किया गया है।
वन्दे मातरम् : जिसने गुलामी की नींव हिला दी-इतिहास गवाह है—अंग्रेजी सत्ता को “जन गण मन” से नहीं, बल्कि वन्दे मातरम् से सबसे अधिक भय लगता था। क्योंकि वन्दे मातरम् केवल शब्द नहीं था, वह विद्रोह था। वह आवाज़ थी, जो फांसी के तख्ते पर भी “भारत माता की जय” में बदल जाती थी।बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने जब वन्दे मातरम् लिखा, तब न संविधान था, न संसद, न सेक्युलरिज़्म की किताबें। तब था तो केवल एक गुलाम राष्ट्र और उसकी टूटी हुई आत्मा। वन्दे मातरम् उसी आत्मा की मरहम-पट्टी था।आज वही गीत उन लोगों को “खतरनाक” लगता है, जिनकी राजनीति आजादी के बाद पैदा हुई असुरक्षा पर टिकी है।
असली सवाल : समस्या गीत में है या नीयत में?अगर वन्दे मातरम् में सचमुच कोई सांप्रदायिकता होती,तो महात्मा गांधी इसे राष्ट्रगीत मानने की वकालत क्यों करते?रवींद्रनाथ ठाकुर इसका समर्थन क्यों करते?सुभाष चंद्र बोस इसे आज़ाद हिंद फौज का उद्घोष क्यों बनाते?सच यह है कि समस्या वन्दे मातरम् में नहीं, उस मानसिकता में है जो भारत को राष्ट्र नहीं, केवल भीड़ मानती है।धर्मनिरपेक्षता का नकाब, भीतर राष्ट्रविरोध-भारत में धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा अपराध यह रहा है कि उसे राष्ट्रविरोध का लाइसेंस बना दिया गया। जो वन्दे मातरम् बोले, वह “कट्टर”; जो उसे न बोले, वह “संवैधानिक”! यह कैसा पाखंड है?क्या अमेरिका में कोई “स्टार-स्पैंगल्ड बैनर” को यह कहकर नकार सकता है कि उसमें ईसाई प्रतीक हैं?क्या फ्रांस में कोई राष्ट्रध्वज से दूरी बनाकर खुद को देशभक्त कह सकता है?तो फिर भारत में ही क्यों राष्ट्रीय प्रतीकों से दूरी बनाकर भी “प्रगतिशील” होने का तमगा मिल जाता है?
राजनीति का गिरता स्तर : राष्ट्र बनाम वोट:वन्दे मातरम् को लेकर राजनीति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कुछ दलों के लिए राष्ट्र केवल सत्ता तक पहुँचने का सीढ़ी है। उन्हें न इतिहास से मतलब है, न संविधान की आत्मा से।जो दल खुलेआम कहते हैं कि “हम वन्दे मातरम् नहीं कहेंगे”—वे दरअसल यह संदेश देते हैं कि हम भारत को सांस्कृतिक राष्ट्र नहीं, केवल चुनावी क्षेत्र मानते हैं।यह वही सोच है जिसने देश को तुष्टिकरण की राजनीति में जकड़ दिया और राष्ट्रवादी चेतना को “अपराध” बना दिया।संविधान को ढाल बनाकर असंवैधानिक आचरण,संविधान का हवाला देकर वन्दे मातरम् से इंकार करने वालों से एक सीधा प्रश्न है—क्या संविधान केवल अधिकारों की सूची है या कर्तव्यों की भी?अनुच्छेद 51(क) स्पष्ट कहता है—“भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीकों का आदर करे।”वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत है—संवैधानिक मान्यता प्राप्त।उसका अपमान कानूनी भले न हो, नैतिक अपराध अवश्य है।
मुस्लिम समाज को मोहरा बनाना:सबसे खतरनाक पहलू यह है कि वन्दे मातरम् विरोध की राजनीति ने मुस्लिम समाज को जानबूझकर आगे किया। जबकि इतिहास गवाह है—मौलाना अबुल कलाम आज़ाद वन्दे मातरम् के समर्थक थे,हजारों मुसलमान क्रांतिकारियों ने इसी गीत के साथ फांसी पाईआज कुछ स्वयंभू नेता मुस्लिम समाज को यह यकीन दिलाने में लगे हैं कि वन्दे मातरम् कहना “धार्मिक खतरा” है। यह न केवल झूठ है, बल्कि सांस्कृतिक अपराध भी है।युवा पीढ़ी को भ्रमित करने का षड्यंत्रआज का युवा यह पूछने लगा है—“क्या वन्दे मातरम् कहना ज़रूरी है?”यह प्रश्न अपने आप में बताता है कि राष्ट्रबोध कमजोर किया जा रहा है। जब राष्ट्र के गीत पर सवाल उठने लगें, तब समझिए कि आने वाली पीढ़ी को जड़ों से काटने की साजिश सफल हो रही है।वन्दे मातरम् बनाम भारत माता की जय-यह कोई संयोग नहीं कि वन्दे मातरम् के साथ-साथ “भारत माता की जय” भी विवादित बनाया गया। क्योंकि दोनों का मूल भाव एक है—भारत केवल जमीन नहीं, माँ है।जो इस भाव को स्वीकार नहीं कर सकता, वह भारत को कभी समझ ही नहीं सकता।
अब स्पष्ट निर्णय का समय,देश अब इस दोहरेपन को और सहन नहीं कर सकता।या तो आप भारत को एक सांस्कृतिक राष्ट्र मानते हैं—या फिर उसे केवल संविधान की फाइल।बीच का रास्ता केवल भ्रम पैदा करता है। वन्दे मातरम् बोले बिना भी जी सकते हैं,पर वन्दे मातरम् को अपमानित करके भारत नहीं बचा सकतेवन्दे मातरम् किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए,लेकिन इसे नीचा दिखाने की राजनीति को कठोरता से खारिज किया जाना चाहिए।यह गीत न हिन्दू है, न मुस्लिम—यह भारतीय है।जो इसे समझे, वही राष्ट्रवादी।जो इसे नकारे, वह चाहे जितना भी संविधान पढ़ ले—भारत की आत्मा से दूर ही रहेगा।
वन्दे मातरम्।

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