मातरम् : वर्तमान और भविष्य(19) - कौटिल्य का भारत

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मंगलवार, 25 नवंबर 2025

मातरम् : वर्तमान और भविष्य(19)

एकोनविंशतिः(19) श्रृंखला,

 वन्दे मातरम् : वर्तमान और भविष्य


“उठो जवानों! पुकारती तुम्हें भारत-जननी,नव विश्वास की रेख खींचो, लिखो नई कहानी.

गाओ मातृ-भक्ति का अमर मंत्र—वन्दे मातरम्,यह शौर्य-स्पंदन, यह राष्ट्र-धड़कन—वन्दे मातरम्।”

भारत के स्वाधीनता-संग्राम में “वन्दे मातरम्” मात्र एक गीत नहीं,बल्कि औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध भारतीय आत्मा का महागर्जन था। इससे प्रेरित होकर अनगिनत क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते फाँसी को चूमा—और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नींव हिल गई।परन्तु आज जब भारत स्वतंत्र है—तो प्रश्न उठता है:क्या वन्दे मातरम् का महत्त्व केवल इतिहास की स्मृतियों में सिमट गया है?नहीं!वन्दे मातरम् आज भी उतना ही प्रासंगिक है,बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण में यह और भी अत्यावश्यक है। वन्दे मातरम् : वर्तमान भारत की आत्मा: राष्ट्रवाद का सांस्कृतिक आधार समकालीन भारत में राष्ट्रवाद को लेकर अनेक वैचारिक संघर्ष हैं।ऐसे समय यह गीत—सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अपरिवर्तनीय आधारभूत स्तम्भ है।यह राष्ट्रीय एकता का मंत्र है—जो कहता है:“हम भिन्न हो सकते हैं, पर मातृभूमि एक है।”प्रत्येक भारतीय का साझा गर्व

आज वन्दे मातरम्—

क्षेत्रभूमिका
विद्यालय–महाविद्यालययुवा संवेदना में राष्ट्रचेतना का संचार
सैन्य-बलदेशभक्ति और बलिदान का प्रेरक मन्त्र
मीडिया व जनोत्सवसामूहिक गौरव का उद्घोष
प्रवासी भारतीय समाजसांस्कृतिक पहचानों के संरक्षण का आधार

जहाँ-जहाँ भारतीय हैं,वहाँ-वहाँ यह स्वर भारत-स्मृति जगाता है।

 वैचारिक भ्रमों का अंत:एक दौर में इसे धार्मिक-राजनीतिक कोण से विवादित बनाने का प्रयास हुआ,परंतु भारतीय समाज ने स्पष्ट कर दिया—यह किसी देवी की नहीं, भारत-जननी की वंदना है।डॉ. राधाकृष्णन के शब्दों में—“यह गीत भारतीय संस्कृति के सार्वभौमिक मूल्यों का प्रतिनिधि है।” वन्दे मातरम् : भविष्य की आवश्यकता

नवभारत की पीढ़ी के लिए नैतिक दिशा::भविष्य का भारत—युवा शक्ति के कंधों पर टिका है।उनकी चेतना अगर राष्ट्रीय लक्ष्य से विमुख हुई—तो उन्नति अधूरी रह जाएगी।वन्दे मातरम् उन्हें राष्ट्रभक्ति, अनुशासन, त्याग,और कर्तव्यपरायणता सिखाता है।यह भाव भरता है:“देश सर्वोपरि, मैं उसके लिए समर्पित।”

 विकसित भारत का वैचारिक घोष

भारत जब विश्वगुरु बनने की ओर बढ़ रहा है—तो उसकी आत्मा भी विश्व को दिशा दे—यह आवश्यक है।वन्दे मातरम्—

मूल्यभावार्थ
एकात्मता140 करोड़ भारतीय—एक स्वर
स्वाभिमानभारत अस्मिता का उदय
कर्तव्यदेशधर्म की सर्वोच्चता
शांति-संदेश“विश्व-कल्याण” भारतीय ध्येय

 राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए प्रेरक::सीमा हो या युद्धभूमि—सैनिक के लिए यह उद्घोष आत्मबल का स्रोत है“वन्दे मातरम्”—मृत्यु से नहीं, कर्तव्य से जुड़ने का आह्वान है।जिसका हृदय मातृभूमि के जयघोष से भरा हो—उसे कोई पराजित नहीं कर सकता।

 बौद्धिक युद्ध में वैचारिक कवच

भविष्य की लड़ाई बंदूकों की नहीं—नैरेटिव और विचारधाराओं की होगी।वन्दे मातरम्—भारत विरोधी विमर्शों के विरुद्ध अदम्य शक्ति है।यह युवाओं को सिखाता है—अपनी जड़ों पर गर्व करो।

 राष्ट्रनीति में इसके संवर्धन की अपेक्षा



नई शिक्षा नीतिवन्दे मातरम् का साहित्यिक व ऐतिहासिक पाठ
संस्कृति मंत्रालयकला–संगीत–नाटकr के माध्यम से जन-प्रसार
विदेश मंत्रालयदूतावासों में प्रतिमाह आयोजन
खिलाड़ी व सेनाप्रेरक उद्घोष के रूप में स्थायी स्थान
यह केवल अनुष्ठान नहीं—

राष्ट्रनिर्माण का संस्कार है।

दार्शनिक आधार : वन्दे मातरम् का भारतीयत्व

बंकिमचन्द्र ने इस गीत में—भूमि को माता स्वीकार किया।गंगा-यमुना, फसलें, वृक्ष—ये सब प्रकृति के उद्धरण मात्र नहीं—भारतीय जीवन का अलंकार हैं।

“त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणा…”राष्ट्र को शक्ति—प्रेरणा—समृद्धि का स्वरूप मानना
भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपरा है।
 

वन्दे मातरम् अतीत की स्मृति नहीं—वर्तमान की चेतना और भविष्य का संकल्प है।

यह गीत नहीं—भारत माता के प्रति अमर कृतज्ञता है।

जब तक गंगा बहेगी—जब तक हिमालय खड़ा रहेगा—
जब तक इस धरा पर एक भी भारतीय रक्त की बूँद धड़क रही होगी—

“वन्दे मातरम्”भारत की धड़कन बनकर गूँजता रहेगा।

 

अंतिम संकल्प पंक्तियाँ “आओ मिलकर प्रण करें,हम सबका बस इतना धर्म—मातृभूमि का हो कल्याण,य भारत! वन्दे मातरम्!!”🙏

राजेन्द्र नाथ तिवारी


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