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शनिवार, 15 नवंबर 2025

महागठबंधन के यहाँ मरघट — कांग्रेस में अंत की ओर!



महागठबंधन के यहाँ मरघट — कांग्रेस में अंत की ओर!

कांग्रेस स्वत:अघोषित मौन संकट से निष्पराण की ओर!

भारत की राजनीति में गठबंधनों का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी यहाँ की विविधता। परंतु हर गठबंधन तभी टिकता है जब उसके सहयोगियों में विश्वास, नेतृत्व में दृढ़ता और रणनीति में पारदर्शिता हो। आज देश की विपक्षी राजनीति जिस मोड़ पर खड़ी है, वहाँ सबसे बड़ा प्रश्न केवल चुनावी जीत-हार का नहीं,बल्कि विश्वसनीयता के संकट का है। और इस संकट के केंद्र में है—महागठबंधन, तथा उसके भीतर वह दल जिसे कभी राष्ट्रीय राजनीति का मेरुदंड कहा जाता था—कांग्रेसआज महागठबंधन का पूरा ढाँचा जिस तरह बिखरता दिख रहा है, वह किसी स्वाभाविक राजनीतिक उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं, बल्कि स्पष्ट संकेत है कि कांग्रेस अब न तो नेतृत्व दे पा रही है, न ही साझेदारों की अपेक्षाओं पर खरा उतर रही है। गठबंधन की भाषा सिर्फ़ बयानबाज़ी रह गई है और उसके भीतर की सच्चाई किसी मरघट की खामोशी जैसी—जहाँ जीवन की बजाय केवल शून्यता का विस्तार है.

कांग्रेस: कभी धुरी, आज बोझ,सच्चाई यह है कि कांग्रेस की मौजूदा स्थिति उससे जुड़े सभी सहयोगियों को असहज करती है। जब कोई पार्टी अपनी वैचारिक दिशा खो दे, संगठन को जीवंत रखने में विफल हो जाए और नेतृत्व स्थायी भ्रम की स्थिति में हो, तो उसके साथ खड़े रहने का साहस भी धीरे-धीरे टूटने लगता है।महागठबंधन के कई घटक दलों ने अंदर ही अंदर कांग्रेस को अब “अप्रभावी साझेदार” मानना शुरू कर दिया है। चुनावी रणनीति में योगदान, सीटों को जीतने की क्षमता, मीडिया और जनभावना को प्रभावित करने का कौशल—इन सभी मोर्चों पर कांग्रेस कमजोर और सुस्त दिखती है।जहाँ पहले क्षेत्रीय दल कांग्रेस के साथ जुड़कर अपनी ताकत बढ़ाते थे, वहीं आज वही दल कांग्रेस के साथ सीट-साझेदारी को जोखिम की तरह देखते हैं। जिन राज्यों में कांग्रेस कभी सत्ता का विकल्प हुआ करती थी, वहां वह अब सहयोगियों के वोट-बैंक पर निर्भर होकर स्वयं को “राष्ट्रीय पार्टी” सिद्ध करने की कोशिश करती प्रतीत होती है।लेकिन राष्ट्र की राजनीति कागजी दावों से नहीं चलती—वह चलती है साख से, और कांग्रेस की साख अब लगातार ढलान पर है।महागठबंधन के भीतर जो तनाव दिखता नहीं, वही सबसे बड़ा सच है,महागठबंधन को यदि अंदर से देखा जाए, तो यह एक ऐसा घर है जहाँ हर कमरे में अलग-अलग सोच, अलग-अलग महत्वाकांक्षाएँ और अलग-अलग रणनीतियाँ पनप रही हैं। कोई भी दल दूसरे पर भरोसा नहीं कर पा रहा।कांग्रेस नेतृत्व के प्रति असंतोष लगभग सभी सहयोगी दलों में मौजूद है:उन्हें लगता है कि कांग्रेस, न निष्पक्ष समन्वय कर पाती है, सशक्त नेतृत्व दे पाती है,और न ही चुनावी गणित की असल समझ रखती है।महागठबंधन के भीतर कई दलों का मानना है कि कांग्रेस लगातार पुरानी राजनीतिक शैली, “महलनुमा सोच”, तथा चुनावी धरातल से कटे हुए नेतृत्व के सहारे राजनीति चलाना चाहती है।जबकि आज की राजनीति में जनता केवल ऐतिहासिक विरासत के नाम पर साथ नहीं देती—वह वर्तमान में परिणाम चाहती है, त्वरित प्रतिक्रिया चाहती है, दिशा स्पष्टता चाहती है।

रणनीति का संकट: कांग्रेस कहती एक है, करती कुछ और,कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह चुनावी राजनीति को पुराने चश्मे से देखती है। राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए आज तीन चीज़ें अत्यंत आवश्यक हैं:स्थिर नेतृत्व,मजबूत संगठन,सुस्पष्ट वैचारिक रेखा,कांग्रेस इन तीनों में ही लड़खड़ा रही है।एक ओर नेतृत्व की अस्पष्टता कार्यकर्ताओं को भ्रमित करती है,दूसरी ओर संगठन जमीनी स्तर पर निष्क्रिय और बिखरा हुआ दिखता है।और तीसरी ओर वैचारिक अस्पष्टता पार्टी को किसी भी मोर्चे पर निर्णायक आवाज नहीं बनने देती।यही कारण है कि महागठबंधन के भीतर कांग्रेस की बात अब “अनिवार्य” नहीं, बल्कि “औपचारिक” समझी जाने लगी  है

महागठबंधन: जहाँ हर दल अपने-अपने रास्ते खोज रहा है,गठबंधन राजनीति का सिद्धांत कहता है—एक दूसरे के पूरक बनो, प्रतिस्पर्धी नहींलेकिन महागठबंधन में इसके उलट हो रहा है।कई राज्यों में सहयोगी दल कांग्रेस के वोट-बैंक पर निगाहें गड़ाए हुए हैं।जहाँ सीटें बढ़ाने का मौका दिखता है, वहाँ सबसे पहले कांग्रेस को ही किनारे किया जाता है।कुछ राज्यों में गठबंधन के बावजूद सहयोगी दल कांग्रेस के विरुद्ध ही उम्मीदवार उतार देते हैं।सीटों के बंटवारे में कांग्रेस की “मांग” और “संचालन क्षमता” के बीच जमीन-आसमान का अंतर है।कांग्रेस जिस सीट को अपनी परंपरागत सीट बताती है, वहाँ भी सहयोगी दल उसकी जीत की क्षमता पर सवाल उठाते हैं।यानी महागठबंधन केवल नाम का संयुक्त मोर्चा है,वास्तव में यह प्रतिस्पर्धा का व्यापक मंच बन चुका है।चुनावी हार से उपजा अस्तित्व संकट: कांग्रेस की थकती हुई ऊर्जा,पिछले कई वर्षों में कांग्रेस की लगातार चुनावी हार ने महागठबंधन की संरचना पर गहरा प्रभाव डाला है।सहयोगी दल अब यह मानने लगे हैं कि—कांग्रेस जनता के बीच अब उतनी प्रभावशाली नहीं रही,न ही वह चुनाव अभियान में परिणाम देने की स्थिति में है,और न ही वह नेतृत्व को आधुनिक राजनीतिक भाषा दे पा रही है।महागठबंधन के स्तर पर यह बात सबसे ज्यादा खलती है कि— कांग्रेस के पास वह चुनावी निर्णय-क्षमता ही नहीं बची जो उसे “स्वाभाविक नेता” बना सके।नतीजा यह हुआ कि जहाँ कभी कांग्रेस के चारों तरफ सहयोगियों का समूह बनता था,आज वही सहयोगी दल कांग्रेस को “कमज़ोर कड़ी” के रूप में देखते हैं।

विचारधारा की खाई: कांग्रेस का अस्पष्ट चेहरा,महागठबंधन किन विचारों परआधारित है?इसका जवाब किसी के पास नहीं।कांग्रेस की विचारधारा आज भ्रमित और अस्पष्ट है:वह परंपरा और आधुनिकता के बीच भटक रही है,उदारवाद और वामपंथ की सीमा रेखा पर खड़ी है,राष्ट्रवाद पर उसका स्वर न तीखा है, न स्पष्ट,और विकास पर वह अब स्वतः विकल्प नहीं रही।इस वैचारिक अस्पष्टता का असर गठबंधन की हर बैठक, हर बयान और हर रणनीति पर साफ दिखता है।जब दल यह न समझ पाएँ कि नेतृत्व किस दिशा में ले जाना चाहता है,तो गठबंधन स्वतः ही कमजोर पड़ता है।

मौका परस्त राजनीति और महागठबंधन की ढलती हुई चमक,महागठबंधन के कई घटक दल अवसर देखते ही अपना रुख बदल देते हैं।राजनीति में अवसरवाद कोई नई बात नहीं,परंतु जब यह अवसरवाद साझेदारों के विश्वास पर आघात करने लगे,तब गठबंधन टूटते हुए ज्यादा समय नहीं लेता।कांग्रेस की कमजोरी ने इस “अवसरवाद” को और अधिक शक्ति दी है।जब किसी घर में मुखिया कमजोर हो जाए,तो हर सदस्य अपनी-अपनी राह खोजने लगता है।गठबंधन के भीतर यही हो रहा है।

कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी: अब विकल्प भी बन रहे हैं और प्रतिस्पर्धी भी,सहयोगी दल जानते हैं कि कांग्रेस के चलते उनका भी जनाधार सीमित हो सकता है।इसलिए कई दल अब दोहरी रणनीति अपना रहे हैं—कांग्रेस के साथ भी, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष मजबूत दिखे।कांग्रेस के बिना भी, ताकि राज्य स्तर पर उनकी स्वतंत्र पहचान और अस्तित्व सुरक्षित रहे।यह दोहरी रणनीति गठबंधन की आत्मा को भीतर ही भीतर खोखला कर रही है।महागठबंधन दिखता तो बड़ा है,मगर भीतर से बिखरा हुआ—एक मरघट की तरह जहाँ सामूहिक ऊर्जा का कोई स्रोत नहीं बचा।कांग्रेस के सामने अब क्या विकल्प हैं?कांग्रेस के सामने अब दो ही रास्ते हैंपहला—संगठन और नेतृत्व में पूर्ण सुधार,राष्ट्रीय नेतृत्व की स्पष्ट स्थापना,राज्यों में स्वायत्त, प्रभावी नेतृत्व,नये चेहरों को आगे लाना,जमीनी कार्यकर्ताओं को पुनर्जीवित करना,विचारधारा को स्पष्ट और सशक्त बनाना

दूसरा—गठबंधन में 'नेता' नहीं, 'साझेदार' बनने की नीति,कांग्रेस को यह मान लेना होगा कि अब वह महागठबंधन की स्वाभाविक धुरी नहीं रही।आज उसे एक जिम्मेदार साझेदार की तरह काम करना होगा—न कि हर निर्णय में नेतृत्व की भूमिका का दावा करना।

अंतिम सत्य: महागठबंधन का भविष्य कांग्रेस के पुनर्जीवन पर निर्भरमहागठबंधन का वर्तमान रूप किसी राजनीतिक ऊर्जा का नहीं,बल्कि एक धीमी मौत का प्रतीक है।जब तक कांग्रेस अपनी भूमिका को स्पष्ट, मजबूत और आधुनिक नहीं बनाती,तब तक गठबंधन केवल चुनावों के आसपास सक्रिय रहने वाला,धीरे-धीरे मिटता हुआ एक ढांचा मात्र रहेगा।आज स्थिति यह है कि महागठबंधन की कमजोरी का भार सबसे अधिक कांग्रेस ही उठा रही है—और उसकी कमजोर होती स्थिति से पूरा गठबंधन मरघट जैसा शांत, निष्प्राण और दिशाहीन दिखने लगा है।

कांग्रेस यदि खुद को नहीं बदलती,तो महागठबंधन की राजनीति उसका पुनरुत्थान नहीं करेगी।बल्कि यह ढांचा कांग्रेस को और अधिक कमजोर करेगा,और अंततः वह स्थिति आ सकती है जब सहयोगी दल,कांग्रेस को केवल एक “औपचारिक नाम” के रूप में देखते रह जाएँ।महागठबंधन के भीतर जो मौन संकट चल रहा है,

वह यही कहता है—कांग्रेस स्वयं के पुनर्जन्म के बिना गठबंधन राजनीति को न जीवन दे सकती है, न नेतृत्व।और यदि सुधार नहीं हुआ,तो मौजूदा स्वरूप में कांग्रेस अंत की ओर ही बढ़ेगी—महागठबंधन की उस खामोश राह में,जो सचमुच एक मरघट की तरह दिखाई देने लगी है.

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