वन्दे मातरम और मुस्लिम समाज का दृष्टिकोण(7)) - कौटिल्य का भारत

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शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

वन्दे मातरम और मुस्लिम समाज का दृष्टिकोण(7))

सप्तम श्रृंखला

एक गीत जिसने राष्ट्र को गढ़ा!


 मुस्लिम दृष्टिकोण!

 राजेंद्र नाथ तिवारी 

“वन्दे मातरम्” केवल एक गीत नहीं — यह भारत की आत्मा का स्वर है। 1870 के दशक में जब अंग्रेज़ी सत्ता भारतीय समाज को तोड़ने, जाति-धर्म के नाम पर बाँटने और गुलामी के बंधन को स्थायी बनाने में लगी थी, तभी बंगाल की भूमि से यह अमर पुकार उठी — “वन्दे मातरम्”, अर्थात् “माता की वंदना हो”।बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत न केवल साहित्यिक सौन्दर्य का उदाहरण था, बल्कि भारतीय चेतना के पुनर्जागरण का उद्घोष भी था।परंतु, जैसे-जैसे यह गीत स्वतंत्रता का प्रतीक बना, एक वर्ग विशेष — विशेषकर तत्कालीन मुस्लिम नेतृत्व — ने इसके प्रति संशय और विरोध का स्वर भी उठाया। इस लेख में हम इसी विरोध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसके कारण, और उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का विवेचन करेंगे।

 बंकिमचन्द्र और वन्दे मातरम् का उद्भव,सन् 1872 में बंकिमचन्द्र बंगाल के एक सरकारी अधिकारी थे। उन्होंने देखा कि अंग्रेज़ी शासन भारतीयों में हीनभावना, भय और पराधीनता की मानसिकता उत्पन्न कर रहा है। उसी पृष्ठभूमि में उन्होंने संस्कृत और बांग्ला के मिश्रित रूप में ‘आनंदमठ’ नामक उपन्यास की रचना की, जिसके मध्य भाग में उन्होंने यह गीत रखा —

“वन्दे मातरम्, सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्।”

यह गीत माँ भारती की आराधना थी — खेतों, नदियों, पर्वतों, वनों और सागर के रूप में साकार “भारत माता” की। यहाँ न तो किसी संप्रदाय का उल्लेख था, न किसी देवी की मूर्ति का आग्रह। यह एक राष्ट्र-भावना का प्रतीक गीत था। तत्कालीन सामाजिक पृष्ठभूमि : बंगाल विभाजन की छाया,उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बंगाल भारतीय राष्ट्रवाद का केन्द्र बन चुका था। कलकत्ता, शान्तिनिकेतन, और सूरत जैसे केन्द्रों से नई चेतना फूट रही थी।इसी समय अंग्रेज़ सरकार ने 1905 में बंगाल विभाजन का निर्णय किया — जिसके तहत पूर्वी बंगाल (मुस्लिम-बहुल) को अलग कर दिया गया। अंग्रेज़ों की नीति स्पष्ट थी — “Divide and Rule”।विभाजन के विरोध में बंगाल के हर नगर और ग्राम में “वन्दे मातरम्” के नारे गूँजने लगे। यह गीत स्वदेशी आन्दोलन का घोष बन गया।किन्तु इसी समय अंग्रेज़ों ने इस गीत के विरोध को भड़काया — विशेषकर मुस्लिम समाज के भीतर यह प्रचार किया गया कि “वन्दे मातरम्” हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा का प्रतीक है, इसलिए मुसलमानों के लिए इसका गायन उचित नहीं।

 मुस्लिम समाज का दृष्टिकोण : विरोध के बीज,यह समझना आवश्यक है कि उस काल का मुस्लिम समाज एकरूप नहीं था।एक ओर — मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हसरत मोहानी, खान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान जैसे राष्ट्रवादी मुस्लिम थे, जिन्होंने “वन्दे मातरम्” को भारत की मातृभूमि के प्रति प्रेम का प्रतीक माना।दूसरी ओर — सर सैयद अहमद ख़ाँ, मुस्लिम लीग और अंग्रेज़ों के प्रभाव में रहने वाला एक अभिजात वर्ग था, जो इसे “धार्मिक प्रतीक” बताकर उससे दूर रहा।मुख्य आपत्ति इस पंक्ति पर केंद्रित की गई —

“त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी…”

इस श्लोक में दुर्गा का उल्लेख था, जिसे कुछ मौलवियों ने मूर्तिपूजा का प्रतीक बताया। वे कहते थे कि इस गीत में “भारत” को एक देवी के रूप में चित्रित किया गया है, और इस्लाम में किसी भी देवी या मूर्ति की आराधना वर्जित है।इस तरह, एक साहित्यिक-राष्ट्रवादी प्रतीक को धार्मिक विवाद में बदल दिया गया।

कांग्रेस और वन्दे मातरम् विवाद,1886 में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ, तो वन्दे मातरम् को उद्घाटन गीत के रूप में गाया गया।1905 से 1910 तक यह कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन का अनिवार्य हिस्सा रहा।किन्तु 1906 के मुस्लिम लीग गठन के बाद अंग्रेज़ी शासन ने इस गीत को “हिन्दू राष्ट्रवाद” से जोड़ दिया।1909 में मिन्टो-मॉर्ले सुधारों के माध्यम से मुसलमानों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया गया — जिससे विभाजन की रेखाएँ और गहरी हुईं।कुछ मुस्लिम नेताओं ने इस गीत को “इस्लाम विरोधी” बताकर कांग्रेस से दूरी बनाई। कांग्रेस ने भी 1937 में यह निर्णय लिया कि गीत का केवल पहला पद — “वन्दे मातरम्, सुजलां सुफलां…” — ही आधिकारिक रूप से गाया जाएगा, क्योंकि उसमें कोई धार्मिक प्रतीक नहीं था।

. अबुल कलाम आज़ाद और राष्ट्रवादी मुस्लिम दृष्टि,मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे प्रबुद्ध मुस्लिम चिंतकों ने इस विवाद को एक भ्रम बताया।उन्होंने कहा —

“वन्दे मातरम् में जो भावना है, वह भूमि के प्रति प्रेम की भावना है। यह मूर्तिपूजा नहीं, मातृभूमि की वंदना है। इस्लाम में भी ‘वतन से मोहब्बत ईमान का हिस्सा’ कहा गया है।”

हसरत मोहानी — जो स्वयं एक मौलाना और कवि थे — “इंकलाब ज़िंदाबाद” के जनक भी थे, और उन्होंने खुले मंच से “वन्दे मातरम्” का समर्थन किया।उनका तर्क था कि धर्म और राष्ट्रप्रेम दो अलग विषय हैं — राष्ट्रगीत का विरोध करना अपने ही देश की अस्मिता का अपमान है।

मुस्लिम लीग और विभाजन की राजनीति,1910 के बाद, मुस्लिम लीग ने इस गीत को हिन्दू वर्चस्व के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया।1920 के दशक में जब खिलाफत आंदोलन चला, तब गांधीजी ने भी मुस्लिम समुदाय से सामंजस्य बनाए रखने के लिए वन्दे मातरम् के गायन पर बल नहीं दिया।लेकिन इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रवादी भावना पर धर्म का रंग चढ़ने लगा।मौलवी-मौलाना वर्ग ने इस गीत के प्रति जनता में भय और भ्रम फैलाया —

कि “यदि तुम वन्दे मातरम् कहोगे तो अल्लाह के सिवा किसी और की वंदना होगी।”

अंग्रेज़ों ने इसी विभाजन को गहराया। परिणामतः स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण तक यह गीत हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रतीक कहकर मुस्लिम लीग की सभाओं में निषिद्ध कर दिया गया।

विभाजन के बाद : पुनर्मूल्यांकन का समय,1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ और संविधान निर्माण का कार्य आरंभ हुआ, तब यह प्रश्न उठा कि “वन्दे मातरम्” को क्या राष्ट्रगान बनाया जाए?संविधान सभा में इस पर लंबी बहस हुई।रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा कि “वन्दे मातरम्” भारत की आत्मा है, परंतु ‘जन गण मन’ सार्वभौमिक दृष्टि से अधिक उपयुक्त होगा।

अंततः संविधान सभा ने निर्णय दिया —

“वन्दे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत (National Song) रहेगा, और जन गण मन राष्ट्रीय गान (National Anthem)।”

इस तरह, राष्ट्र की पहचान में दोनों गीतों को स्थान मिला — एक भावना का, दूसरा विधान का।

 इस्लामिक दृष्टि और सांस्कृतिक समन्वय,इस्लामी शिक्षाओं में “शिर्क” अर्थात ईश्वर के साथ किसी अन्य की पूजा का विरोध है। परंतु यदि किसी गीत में भूमि या माता को राष्ट्र का प्रतीक माना जाए, न कि ईश्वर का, तो वह “पूजा” नहीं बल्कि “सम्मान” है।यही बात मौलाना आज़ाद, अली बंधुओं और मौलवी बशीर अहमद जैसे विद्वानों ने कही थी।भारत की संस्कृति में माता शब्द केवल धार्मिक नहीं, भावनात्मक है — मातृभूमि, मातृभाषा, मातृसंस्कृति जैसे शब्द किसी धर्म का नहीं, बल्कि एक गहरे मानवीय अनुभव का प्रतीक हैं।

“वन्दे मातरम्” इसी सार्वभौमिक भाव से जन्मा था।

. आधुनिक दृष्टिकोण : भारतीय मुस्लिम समाज में पुनर्विचार

स्वतंत्र भारत में भी समय-समय पर “वन्दे मातरम्” को लेकर विवाद उठते रहे —2006 में, 2016 में और हाल में भी कुछ कट्टर संगठनों ने इसका विरोध किया।परंतु अनेक मुस्लिम बुद्धिजीवियों — जैसे ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, इक़बाल अहमद, और इमरान खान (कवि) — ने इसे राष्ट्रप्रेम का गीत माना।
कलाम साहब ने कहा था —

“मैं जब वन्दे मातरम् सुनता हूँ, तो मुझे भारत की धरती, उसके खेत, उसके लोग याद आते हैं — यह किसी देवी का नहीं, मेरे देश का गीत है।”

आज का मुस्लिम समाज, जो शिक्षा, तकनीक और भारतीय संविधान से गहराई से जुड़ा है, वह इस गीत के सांस्कृतिक अर्थ को समझने लगा है।युवाओं की नई पीढ़ी “वन्दे मातरम्” को राष्ट्र की एकता और स्वतंत्रता की स्मृति के रूप में स्वीकार करती है।

 वन्दे मातरम् — धर्म नहीं, राष्ट्र का धर्म,वन्दे मातरम् का अर्थ है — “माँ, मैं तेरा वंदन करता हूँ।”यह मातृभूमि के प्रति समर्पण का गीत है, न कि किसी देवी की आराधना का आग्रह।बंकिमचन्द्र ने “भारत माता” को राष्ट्र के रूपक के रूप में देखा — जिसमें गंगा, यमुना, खेत, वन, पर्वत, सागर सब सम्मिलित हैं।तत्कालीन मुस्लिम समाज में जो विरोध उठा, वह धार्मिक नहीं, राजनीतिक था — अंग्रेज़ी नीति और मुस्लिम लीग की संकीर्ण दृष्टि का परिणाम।राष्ट्रवादी मुस्लिमों ने इस गीत को अपनाया, गाया और इसके अर्थ को सही रूप में समझाया।

आज आवश्यकता है कि हम “वन्दे मातरम्” को संकीर्ण दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि भारतीय एकता, मातृभूमि और मानवता के गीत के रूप में देखें।
यह गीत भारत की विविधता में एकता का शाश्वत प्रतीक है —

“वन्दे मातरम्” कहना किसी धर्म का नारा नहीं,
बल्कि यह कहना है — “हे भारत माता, मैं तेरा हूँ।

 

सक्षेप में : सारांश

पक्ष विवरण
रचनाकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय (1872–1876)
मुख्य विषय मातृभूमि की वंदना, प्रकृति का गौरव, स्वतंत्रता का संकल्प
विवाद का कारण “दुर्गा” रूपक को इस्लामी दृष्टि से मूर्तिपूजा समझा गया
मुस्लिम प्रतिक्रिया दो धाराएँ — राष्ट्रवादी समर्थन और कट्टर विरोध
संविधानिक स्थिति “राष्ट्रीय गीत” (National Song) का दर्जा
आधुनिक अर्थ धर्म से परे राष्ट्र के प्रति समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक
उपसंहार :“वन्दे मातरम्” आज भी भारत की आत्मा की धड़कन है। यह वह स्वर है जिसने लाखों लोगों को स्वतंत्रता संग्राम में मर-मिटने की प्रेरणा दी।यदि हम इसके अर्थ को केवल धर्म की दृष्टि से नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति प्रेम के रूप में देखें, तो यह गीत हर भारतीय का हो सकता है — चाहे वह किसी भी मज़हब का क्यों न हो।

“वन्दे मातरम्” — यह वह श्वास है, जो भारत के प्रत्येक कण में स्पंदित है।

क्रमशः:::अष्टम प्रसून 🙏 

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