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रविवार, 16 नवंबर 2025

“क्या कांग्रेस अब इतिहास बनने की कगार पर? — डगमगाती चूलें,, बिखरता नेतृत्व”

 

संपादकीय






क्या कांग्रेस के चारो चूलें  अब हिल गयी हैं? — क्या कांग्रेस अब इतिहास बनने की ओर बढ़ रही है?

भारतीय राजनीति के विशाल घराने में कांग्रेस कभी वह स्तम्भ थी, जिसके सहारे पूरा लोकतन्त्र खड़ा प्रतीत होता था। पर आज स्थिति यह है कि कई राज्यों में कांग्रेस के चूलें तक हिल गए हैं—नेतृत्व डगमगा चुका है, संगठन बिखर चुका है और वैचारिक आधार लगभग ध्वस्त हो चुका है। यह केवल चुनावी हार का नहीं, राजनीतिक अस्तित्व के संकट का संकेत है।

प्रश्न यह नहीं कि कांग्रेस कमजोर हुई है;
प्रश्न यह है कि—
क्या कांग्रेस अब धीरे-धीरे इतिहास बनने की ओर अग्रसर है?

नेतृत्वहीनता का गहरा अंधकारकांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या है—दिशाहीन नेतृत्व।राहुल गांधी कांग्रेस को आधुनिक नहीं बना सके;सोनिया गांधी संगठन को पुनर्जीवित न कर सकीं;और शेष दल केवल प्रतीक्षा में बैठे हैं कि अगला आदेश कब आएगा।ऐसे में आज की कांग्रेस एक जहाज़ की तरह है—जिसके पास पतवार नहीं, कप्तान नहीं, और दिशा का बोध नहीं।राज्यों में पायदान खिसक चुके हैंएक समय था जब कांग्रेस 20 से अधिक राज्यों में सत्ता साझा करती थी।आज स्थिति यह है कि कई राज्यों में पार्टी का संगठन “काग़ज़” पर है,जमीनी ढाँचा लगभग खत्म।मध्यप्रदेश में बिखराव,राजस्थान में आंतरिक युद्ध,हिमाचल में टूटन,पूर्वोत्तर में लगभग समाप्त,दक्षिण में भी पकड़ कमजोरइस गिरावट का सीधा अर्थ है—कांग्रेस अब राष्ट्रीय से क्षेत्रीय की ओर फिसल चुकी है. वैचारिक भ्रम — कांग्रेस खुद को समझ नहीं पा रही,भारत आज आत्मविश्वास, विकास और राष्ट्रवाद के रास्ते पर बढ़ रहा है।कांग्रेस का वैचारिक स्वरूप इस नए भारत से मेल नहीं खाता।एक ओर वह “उदारवाद” की बात करती है, दूसरी ओर “तुच्छ राजनीति” में फँस जाती है।एक दिन “भारत जोड़ो”, दूसरे दिन “भारत को दोष दो”—इस विरोधाभास ने जनता का विश्वास पूरी तरह तोड़ दिया है।राष्ट्रवादी दृष्टि से देखें तो कांग्रेस आजभारत की आत्मा के विपरीत दिशा में खड़ी दिखाई देती है। नेतृत्व के भीतर डर — और जनता के भीतर दूरी,कांग्रेस की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि उसके नेता लड़ना नहीं चाहते,खड़ा होना नहीं चाहते,और जनता को उत्साहित भी नहीं कर पाते।जब नेतृत्व स्वयं विचलित हो,तो जनता भरोसा कैसे करे?आज कांग्रेस जनता की नहीं,सिर्फ अपने परिवार की राजनीति में उलझी हुई पार्टी बनकर रह गई है।क्या कांग्रेस इतिहास बन जाएगी?भारत बदल चुका है।यह वह राष्ट्र नहीं जहाँ चुनाव वंश के नाम पर जीते जाते थे।यह नया भारत है जहाँ:रा,ष्ट्रवाद निर्णायक है,नेतृत्व मजबूत होना चाहिए,संगठन अनुशासित होना चाहिए,दृष्टि स्पष्ट होनी चाहिएऔर कांग्रेस इन सभी मानकों पर अनुपस्थित है।इसलिए राष्ट्रवादी दृष्टि से यह कथन अतिशयोक्ति नहीं होगा—

“कांग्रेस अब वर्तमान की नहीं, इतिहास की पार्टी बनती जा रही है।इसकी जड़ें हिल चुकी हैं, चूल्हे बुझ चुके हैं,और जनविश्वास का दीपक लगभग समाप्त है"


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