न्याय के नाम पर धंधा: पेशेवर जमानतदारों की मौज
– संपादकीय टिप्पणी
भारतीय न्याय व्यवस्था, जो कभी दुनिया के सबसे मजबूत लोकतांत्रिक स्तंभों में से एक मानी जाती थी, आज अपनी ही नींव में सड़न का शिकार हो रही है। अदालतों के गलियारों में घूमते हुए वे चेहरे, जो न अपराधी हैं, न पीड़ित, न वकील और न ही न्यायाधीश, लेकिन हर मुकदमे में किसी न किसी रूप में मौजूद रहते हैं—वे हैं 'पेशेवर जमानतदार'। ये वे लोग हैं जो न्याय की प्रक्रिया को एक लाभकारी धंधे में बदल चुके हैं। कचहरी के बाहर खड़े होकर वे इंतजार करते हैं—किसी आरोपी की जमानत के लिए, किसी मुकदमे की फाइल को आगे बढ़ाने के लिए, या बस एक कमीशन के लिए। यह कोई नई कहानी नहीं है; यह एक पुरानी बीमारी है जो अब महामारी का रूप ले चुकी है। लेकिन सवाल यह है कि इस बीमारी का इलाज क्यों नहीं हो रहा? क्यों न्यायपालिका, जो संविधान की रक्षा का दावा करती है, अपनी ही व्यवस्था के इन कीड़ों को कुचलने से कतराती है?
पेशेवर जमानतदारों का यह खेल कितना पुराना है? चलिए, इतिहास की कुछ परतें उधेड़ते हैं। ब्रिटिश काल से ही भारतीय अदालतों में जमानत की प्रथा रही है, लेकिन तब यह सामाजिक विश्वास पर आधारित थी। आरोपी के परिवार या मित्र जमानत देते थे, ताकि वह फरार न हो। लेकिन आज? आज यह एक संगठित रैकेट है। दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट से लेकर मुंबई की सेशंस कोर्ट तक, और लखनऊ की जिला अदालतों से लेकर कोलकाता की हाई कोर्ट तक—हर जगह इन जमानतदारों का बाजार लगा हुआ है। ये लोग फर्जी दस्तावेजों के साथ खड़े होते हैं: आधार कार्ड, राशन कार्ड, बैंक स्टेटमेंट—सब कुछ तैयार। एक जमानत के लिए 5,000 से 50,000 रुपये तक का कमीशन, और अगले दिन फिर वही चेहरा किसी दूसरे आरोपी के लिए। क्या यह न्याय है? नहीं, यह तो न्याय के नाम पर लूट है।
कल्पना कीजिए एक आम आदमी की। मान लीजिए आपका कोई रिश्तेदार छोटे-मोटे अपराध में फंस जाता है—शायद ट्रैफिक उल्लंघन या कोई झगड़ा। पुलिस गिरफ्तार करती है, और अदालत में जमानत की बात आती है। आपके पास कोई विश्वसनीय जमानतदार नहीं है? कोई बात नहीं, वकील साहब आपको 'व्यवस्था' से जोड़ देंगे। एक फोन कॉल, और आ जाता है वह पेशेवर जमानतदार—जिसने पिछले महीने में ही दर्जनों जमानतें दी होंगी। अदालत में सब कुछ 'नियमसम्मत' लगता है: दस्तावेज सत्यापित, हलफनामा तैयार। लेकिन क्या कोई पूछता है कि यह व्यक्ति कितनी जमानतों में पहले से शामिल है? क्या उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वह वाकई जमानत की जिम्मेदारी उठा सकता है? जवाब है—नहीं। क्योंकि अगर पूछा गया, तो पूरी व्यवस्था ही रुक जाएगी।
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