सत्येंद्र सिंह भोलू
“दीवाली की मिठाइयाँ और अफसरशाही का स्वाद”
(कौटिल्य का भारत – विशेष व्यंग्य स्तंभ)
दीवाली का मौसम आते ही पूरा देश जैसे किसी अदृश्य मिठास के नशे में चला जाता है।
बाज़ारों में लाइटें टिमटिमा रही होती हैं, लोग बंधनवार लगा रहे होते हैं, और सरकारी दफ़्तरों में… मिठाइयों के डिब्बों का “ट्रैफिक जाम” लगा होता है। कहीं काजू कतली की गंध, कहीं बर्फी का स्वाद, और कहीं परोसी जा रही ‘शुभकामनाओं’ में घुला हुआ उद्देश्य। हर साल की तरह इस बार भी वही सवाल गूँजता है —“दीवाली पर इतनी मिठाइयाँ अधिकारियों को आती हैं, वे करते क्या हैं?”और जवाब में वही मुस्कुराहट — “अरे भाई, जनता का स्नेह है!”
स्नेह या रणनीति — मिठाई की भाषा कौन समझे? किसी सरकारी दफ़्तर में दीवाली के पहले हफ्ते जाइए।फाइलें वही होती हैं, लेकिन उनके ऊपर रखे बॉक्स बदल जाते हैं।हर मिठाई का अपना संदेश होता है:काजू कतली — “टेंडर पास कराने की शुभकामनाएँ। रसगुल्ला — “भविष्य के प्रमोशन की मीठी उम्मीद।” सोनपापड़ी — “याद रखिए, हम आपके आदमी हैं।”
मोटिचूर लड्डू — “थोड़ा ज़्यादा वजनदार काम है, ध्यान रखिए।”मिठाई के बॉक्स में न कोई रकम लिखी होती है, न कोई सबूत बचता है। बस इतना होता है कि कर्मचारी का विवेक धीरे-धीरे चीनी की चाशनी में गलने लगता है।
‘सॉफ्ट करप्शन’ का मीठा चेहरा
हमारे यहाँ रिश्वत को बुरा माना जाता है, पर मिठाई को नहीं। इसलिए अब रिश्वत “कन्वर्ट”होकर ‘शुभकामनाओं की मिठास’ में बदल गई है। कोई गिफ्ट नहीं देता, सब “शुभकामना बॉक्स” देते हैं।और अफसरशाही भी क्या करे —इतना स्नेह पाकर “ना” कहे तो असंवेदनशील,
स्वीकार करे तो संवेदनशील भ्रष्ट बन जाए! यह वह भ्रष्टाचार है जिसे “भावनात्मक घूस” कहा जा सकता है.न कोई दस्तावेज़, न कोई रिकॉर्ड — बस मिठाई की परतों में ढँका एक सौदा।
दीवाली की रोशनी में धुँधली होती नैतिकता दीवाली का अर्थ है अंधकार पर प्रकाश की विजय।
पर अफसरशाही में यह वाक्य उल्टा लागू होता है —“मिठास पर विवेक की हार।”
कई विभागों में तो यह रिवाज़ बन गया है कि त्योहार से पहले ‘सप्लायर्स’ और ‘ठेकेदारों’ की लिस्ट निकलती है —कौन मिठाई भेजेगा, कौन ड्राई फ्रूट,और किसके पैकेट में “काजू से अधिक काग़ज़” होंगे। कुछ ईमानदार अधिकारी भी हैं, जो इन सब से बचना चाहते हैं।
पर उनके घर के गेट पर लिखा होता है —“मिठाई वापस करना असभ्यता मानी जाएगी।”
ऐसी स्थिति में सत्यनिष्ठा भी “डायबिटिक रोगी” बन जाती है —क्योंकि मिठास से बचना असंभव है।
घर, दफ़्तर और मिठाई का भूगोल,अधिकारियों के घरों में दीवाली के दिनों में एक अलग दृश्य होता है। रसोई में जगह नहीं बचती, फ्रीज़ भरा होता है,और नौकरानी पूछती है — “साब, यह वाली मिठाई कल की थी या परसों की?”फिर शुरू होता है “मिठाई का वितरण तंत्र” —थोड़ी ड्राइवर को, थोड़ी चौकीदार को,थोड़ी सचिव के बच्चों के स्कूल में,और जो बच जाए वो अगले अफ़सर को ‘री-गिफ्ट’ कर दी जाती है।
इस प्रकार मिठाई का जीवन-चक्र पूरा होता है —भेजी एक ने, खाई दस ने, और गली का कुत्ता भी भाग्यशाली हो गया। ‘डिब्बों का लोकतंत्र’भारत में अब लोकतंत्र नहीं, “डिब्बातंत्र” चल रहा है।जहाँ नागरिकता की पहचान मतपत्र से नहीं, मिठाई के पैकेट से होती है।जिसके पास ज़्यादा बॉक्स हैं, वही बड़ा प्रभावशाली है। कुछ विभागों में तो मिठाई का ‘सीक्रेट ऑडिट’ भी होता है
“आपके पास इस साल कितने बॉक्स आए?”
यह “ईमानदारी रेटिंग” का सूचक बन गया है।
पर अफसरशाही में यह वाक्य उल्टा लागू होता है —“मिठास पर विवेक की हार।”
कई विभागों में तो यह रिवाज़ बन गया है कि त्योहार से पहले ‘सप्लायर्स’ और ‘ठेकेदारों’ की लिस्ट निकलती है —कौन मिठाई भेजेगा, कौन ड्राई फ्रूट,और किसके पैकेट में “काजू से अधिक काग़ज़” होंगे। कुछ ईमानदार अधिकारी भी हैं, जो इन सब से बचना चाहते हैं।
पर उनके घर के गेट पर लिखा होता है —“मिठाई वापस करना असभ्यता मानी जाएगी।”
ऐसी स्थिति में सत्यनिष्ठा भी “डायबिटिक रोगी” बन जाती है —क्योंकि मिठास से बचना असंभव है।
घर, दफ़्तर और मिठाई का भूगोल,अधिकारियों के घरों में दीवाली के दिनों में एक अलग दृश्य होता है। रसोई में जगह नहीं बचती, फ्रीज़ भरा होता है,और नौकरानी पूछती है — “साब, यह वाली मिठाई कल की थी या परसों की?”फिर शुरू होता है “मिठाई का वितरण तंत्र” —थोड़ी ड्राइवर को, थोड़ी चौकीदार को,थोड़ी सचिव के बच्चों के स्कूल में,और जो बच जाए वो अगले अफ़सर को ‘री-गिफ्ट’ कर दी जाती है।
इस प्रकार मिठाई का जीवन-चक्र पूरा होता है —भेजी एक ने, खाई दस ने, और गली का कुत्ता भी भाग्यशाली हो गया। ‘डिब्बों का लोकतंत्र’भारत में अब लोकतंत्र नहीं, “डिब्बातंत्र” चल रहा है।जहाँ नागरिकता की पहचान मतपत्र से नहीं, मिठाई के पैकेट से होती है।जिसके पास ज़्यादा बॉक्स हैं, वही बड़ा प्रभावशाली है। कुछ विभागों में तो मिठाई का ‘सीक्रेट ऑडिट’ भी होता है
“आपके पास इस साल कितने बॉक्स आए?”
यह “ईमानदारी रेटिंग” का सूचक बन गया है।
संवेदना या सौदेबाज़ी — सीमा कहाँ है,लोग कहते हैं — “त्योहार पर उपहार देना भारतीय संस्कृति है।”बिलकुल है, पर संस्कृति और संधि में फर्क होता है।जब मिठाई सिर्फ प्रेम से दी जाए तो वह संस्कृति है,और जब लाभ की आशा में दी जाए तो वह संधि (डील) बन जाती है। आज कई अधिकारी मिठाई देखकर यह नहीं सोचते कि स्वाद कैसा होगा,बल्कि यह सोचते हैं कि “भेजने वाला कौन है?”क्योंकि स्वाद ज़ुबान पर नहीं, फ़ाइल पर असर करता है।
मनोविज्ञान का मीठा खेल,मनोविज्ञान कहता है कि “मिठाई मानव मन में अपनापन जगाती है।”और यहीं से शुरू होती है ‘स्नेह आधारित भ्रष्टाचार’ की कथा। मिठाई रिश्वत नहीं लगती क्योंकि वह भावनाओं में लिपटी होती है। यह रिश्वत की सबसे सभ्य, सबसे सुंदर और सबसे खतरनाक रूप है।
परिणाम: मिठास से पिघलता राष्ट्र-चरित्र,जब कोई व्यवस्था इतनी भावनात्मक हो जाए कि उसे मिठाई से प्रभावित किया जा सके,तो समझिए, नैतिकता की नसें शुगर से जाम हो चुकी हैं।एक अधिकारी की कमजोर मिठाई-इच्छा
कभी-कभी करोड़ों की हानि में बदल जाती है —क्योंकि एक बार संबंध बन गया तो फ़ैसला भी उसी दिशा में झुकता है।
जनता की भूमिका: जो खिलाता है, वही मिटाता है,हम नागरिक भी कम दोषी नहीं हैं।हमने ही “शुभकामनाओं” के नाम पर रिश्वत देना सीख लिया है। हमने माना कि “साहब को मिठाई दे दो, काम अपने आप हो जाएगा।”और जब काम होता है, तो हम खुद को समझाते हैं —
“यह रिश्वत नहीं थी, यह परंपरा थी।”पर यह परंपरा नहीं, पराधीनता का मीठा रूप है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया था — “राजा यदि उपहार से प्रभावित हो जाए, तो प्रजा दास बन जाती है।”आज वही सत्य हमारे हर कार्यालय में प्रतिध्वनित हो रहा है।
: जब मिठाई कटे, तभी अंधकार हटे
दीवाली का अर्थ तभी सार्थक होगा जब,हम “दीप जलाने” से पहले “डिब्बे हटाने” का संकल्प लें। मिठाई बुरी नहीं है, पर उसके पीछे की मानसिकता विषैली है। त्योहार की मिठास तब तक पवित्र नहीं हो सकत जब तक वह लाभ, भय या अपेक्षा से रहित न हो। जो अधिकारी मिठाई लौटा दे, वह असभ्य नहीं — स्वाधीन है। और जो नागरिक मिठाई देना छोड़ दे, वही सच्चा भक्त है राष्ट्र का।
इस दीवाली हम सबको यह निश्चय करना चाहिए —कि रोशनी बाहर नहीं, भीतर जले।
और अगर मिठाई बांटना ही है तो वह सहयोगियों में नहीं, ज़रूरतमंदों में बाँटी जाए।
वरना आने वाले वर्षों में दीवाली सिर्फ़ त्योहार नहीं रहेगी,बल्कि “राष्ट्रीय मिठाई वितरण दिवस” बन जाएगी —जहाँ हर अधिकारी का ब्लड शुगर लेवल ही उसकी ईमानदारी का प्रमेय है.
दीवाली का अर्थ तभी सार्थक होगा जब,हम “दीप जलाने” से पहले “डिब्बे हटाने” का संकल्प लें। मिठाई बुरी नहीं है, पर उसके पीछे की मानसिकता विषैली है। त्योहार की मिठास तब तक पवित्र नहीं हो सकत जब तक वह लाभ, भय या अपेक्षा से रहित न हो। जो अधिकारी मिठाई लौटा दे, वह असभ्य नहीं — स्वाधीन है। और जो नागरिक मिठाई देना छोड़ दे, वही सच्चा भक्त है राष्ट्र का।
इस दीवाली हम सबको यह निश्चय करना चाहिए —कि रोशनी बाहर नहीं, भीतर जले।
और अगर मिठाई बांटना ही है तो वह सहयोगियों में नहीं, ज़रूरतमंदों में बाँटी जाए।
वरना आने वाले वर्षों में दीवाली सिर्फ़ त्योहार नहीं रहेगी,बल्कि “राष्ट्रीय मिठाई वितरण दिवस” बन जाएगी —जहाँ हर अधिकारी का ब्लड शुगर लेवल ही उसकी ईमानदारी का प्रमेय है.
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